મેરે ગુરુજીને-જયેન્દ્ર શેખડીવાળા

મેરે ગુરુજીને જ્ઞાન બતાયો
જલ મેં થલ  ઔર  થલમેં  જલ  દિખલાયો
મેરે ગુરુજીને જ્ઞાન બતાયો
અખિયાં મીંચ ગુરૂ ધ્યાન લગાયા તો ગુરૂ થા  દેખનહારા
સાગરમેં ગાગર,ગાગરમે સાગર જિસકા ન કોઈ કિનારા
મેરો ભરમ સાઘરો મિટાયો
મેરે ગુરુજીને જ્ઞાન બતાયો
ગુરુ નિરંગ અતિ રંગ ધરે હૈં,રૂપ ધરે જૈસે  મહાશૂન ધારા
ના ગોવિંદા,ના હૈ ગુરુ વો, મેરા ગુરૂ અકલ
સકલસે પારા
ખુદીગૂફામેં ધૂનોરિ લગાયો
મેરે ગુરુજીને જ્ઞાન બતાયો
(  જયેન્દ્ર શેખડીવાળા )

ગુરુ-દેવાયત ભમ્મર

ગાજતો મેઘ મારો ગુરુ છે.
ને ગહેંકતો મોર મારો ગુરુ છે.

ગગન ભેદી લડતાં શીખવે.
આ અષાઢી તોર મારો ગુરુ છે.

મને જે સપનાં સમેત ઉઠાડે.
એ ભરેલો ભોર મારો ગુરુ છે.

ઓછપમાં મારે કેમ ઉછરવું?
લે લીલેરો થોર મારો ગુરુ છે.

આફળી ઝબૂકે જ્ઞાન વિજળીયા,
ને ઘટા ઘનઘોર મારો ગુરુ છે.

સૂર્ય, ચંદ્ર, તારા, પવન, ગગન.
એક કૂંપળની કોર મારો ગુરુ છે.

ઉઠે અવાજ ભભૂકી અંદરથી,
એ આત્મ અઘોર મારો ગુરુ છે.

એક બાળક મને ટોકી શકે,
તો સ્નેહની ટકોર મારો ગુરુ છે.

કાળની થપાટ ન ડગાવી શકે.
સિંહણના નહોર મારો ગુરુ છે.

અભાવ છતાં ‘દેવ’થી ન યાચે,
એ સુદામો ગોર મારો ગુરુ છે.

તડકો,છાંયો,ભડકો,હો શાંતી,
સવાર,સાંજ બપોર મારો ગુરુ છે.

‘દેવ’ પોતે પોતાનો તો છે જ,
કૃષ્ણ આંઠે પહોર મારો ગુરુ છે.

( દેવાયત ભમ્મર )

જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે! વહાલમાં…-વિવેક ટેલર

જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે! વહાલમાં…

મારી આંખોની પાર નથી એક્કે કવિતા, મારી આંખોમાં આંખ તું પરોવ મા,
જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે ! વહાલમાં…

આંખોમાં આંખ અને હાથોમાં હાથ હવે લાગે છે થોડું આઉટડેટેડ,
વ્હૉટ્સએપ ને ફેસબુક છે લેટેસ્ટ ફેશન, બેબી ! એનાથી રહીયે કનેક્ટેડ.
વાઇબર કે સ્કાયપી પર મેસેજ કરીને નેક્સ્ટ મિટિંગ રાખીશું આજકાલમાં.
જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે ! વહાલમાં…

ડેઇલી મૉર્નિંગમાં હું સ્માઇલી મોકલાવીશ, તું બદલામાં કિસ મોકલાવજે,
‘લાસ્ટ સીન’ સ્ટેટસમાં અંચઈ નહીં કરવાની, એટલી ઑનેસ્ટી તું રાખજે.
તારી એક્કેક ટ્વિટ ફોલૉ કરું છું હુંય, એક-એક પિરિયડના દરમિયાનમાં.
જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે ! વહાલમાં…

કાગળ-પેન લઈ હું લખતો નથી કે આ છે કમ્પ્યૂટર-મોબાઇલનો યુગ,
ફૂલ અને ઝાકળ ને સાગર-શશી ને આ કવિતા-ફવિતા, માય ફૂટ !
સાથે રહી લઈશ પણ એક જ કન્ડિશન- તું તારા, હું મારા મોબાઇલમાં.
જરા ડિસ્ટન્સ તું રાખ, પ્રિયે ! વહાલમાં…

( વિવેક ટેલર )

सूनी सी ज़िन्दगी रही

बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
झोंका जो नींद का कभी, आता तो ख़ाब देखते
दिल के मलाल का भी हम, तुझसे सवाल पूछते
बैठे-बिठाए बेबसी का, झोंका जगा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
जाने कहाँ तू खो गया, इतने बड़े जहान में
हमको शिक़स्त दे गया,दिल के ही इम्तहान में
बैठे-बिठाए आँसुओं का तमग़ा दिला गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
यूँ कमनसीब हम न थे, यूँ बदनसीब हम न थे
इतनी तादात में कभी, हासिल तो रंज-ओ-ग़म न थे
बैठे-बिठाए बेरुख़ी का, आलम सजा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
ऐसा न हो कि हम यूँ ही, दिल से ही हार मान लें
परवरदिगार से कभी अपनी ही मौत माँग लें
बैठे -बिठाए फ़ासलों को यूँ ही बढ़ा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
 ( निर्मला त्रिवेदी )
दरिया- सागर, समुद्र, बड़ी नदी
मलाल- दुःख, अफ़सोस
शिक़स्त- मात, हराना
गमज़दी  – उदासी
तमग़ा- मैडल,
बेरुख़ी- चिढ, नाराज़गी, ख़ीज दिखाना
परवरदीगार – अल्ला, ईश्वर
फ़ासलों को- दूरियों को

आहुति-उमा त्रिलोक

नहीं किसी ने खुशी में थाली पीटी
गली में नहीं बांटा गुड़
जब दाई ने कहा
” लक्ष्मी अाई है”

किसी ने नहीं दुलारा पुचकारा
मै होती रही बड़ी,
यूं ही,
रोती बिलखती किलकारती

शब्द सुना जो पहली बार
दादी ने कहा, ” कर्म जली ”
नहीं समझा जिसे,
लेकिन
थाली छीन ली जब यह कहकर,
” मत खा इतना, जल्दी बड़ी हो जाएगी ”
तो, मैं रो दी

मेंने सुना
बस चीखना मां का
” उठ, झाड़ू बुहारी सीख
चूल्हा चौका संभाल, तुझे जाना है अगले घर ”

छह साल की थी,
जब
मुन्ने को पकड़ा देती,
कहती,
” बर्तन मल कर रखना, कपड़े
सूखा देना
आती हूं मैं काम से घंटे भर में ”

न देखा बचपन मेंने
न देखी जवानी,
लेकिन
फिर भी
बड़ी हो गई

एक दिन खेत में पकड़ ली बांह
पिछवाड़े के कल्लू ने
खूब हुअा हंगामा
बहुत मचा शोर
गाव में
मारा पीटा दुत्कारा
फिर मैं
ब्याह दी
जल्दी में

सजा मिली
मुझे उस गुनाह की
जो मेंने किया ही नहीं

अब
हर बार सास बोल देती
मेरे उसको

” पेट में लड़की हुई तो गिरा देना
हमें तो बस पोता चाहिए ”

हुआ कई बार ऐसे ही

फिर तू अा गई
डाक्टरनी की भूल से

सुन
अगर तेरे जीवन में कुछ ऐसा हो
जो तुम्हे ना भाए
तो
तुम करना विरोध
दहाड़ना, दिखाना प्रतिरोध
जूझना
मत मानना

तुम बदल देना
रुख समय की धार का
सुने ना कोई
गर तेरी बात
तुम चीखना ज़ोर से
जो टकराए जाकर क्षितिज से
चीर दे जो सीना गगन का
तुम
लड़ना,झगड़ना
और
घसीट लाना समय को
परिवर्तन की ओर
चाहे खो जाए
तेरा सर्वस्व ही
क्यों कि
परिवर्तन मांगता है
आहुति

हां
आहुति

( उमा त्रिलोक )

खिड़कियाँ खोलो-कुँअर बेचैन

दिलों की साँकलें और ज़हन की ये कुंडियाँ खोलो
बड़ी भारी घुटन है घर की सारी खिड़कियाँ खोलो
कसी मुट्ठी को लेकर आये हो,  गुस्से में हो शायद
मिलाना है   जो हमसे हाथ तो ये मुट्ठियाँ    खोलो
नचाने को हमें   जो उँगलियों में   बाँध रक्खी   हैं
न कठपुतली बनेंगे हम, सुनो, ये  डोरियाँ   खोलो
तुम्हारे घर की रौनक   ने जो   बाँधी  हैं अँगोछे में
चलो, बैठो, पसीना पोंछो, और ये रोटियाँ   खोलो
तुम्हारे दोस्त ही    बैठे हैं  हाथों  में नमक   लेकर
किसी से कह न देना घाव  की ये पट्टियाँ   खोलो
तुम्हारे हर तरफ़ थी आग और तुम फूस के घर थे
तो फिर किसने कहा अंधे कुओं की आँधियाँ खोलो
किसी भी ज़ुल्म के आगे रहोगे मौन यूँ  कब तक
ज़ुबाँ जो बाँध रक्खी है उसे अब तो  मियाँ, खोलो
तुम्हारे ही सरों पर गर ये बारिश में  रहीं तो  क्या
मज़ा तो तब है जब औरों की ख़ातिर छतरियाँ खोलो
सुनो, ये खुदकशी भी बुज़दिली है, खुद को समझाकर
तुम अपने हाथ से अपने गले  की   रस्सियां  खोलो
अजब उलझन में हूँ उसने लिफ़ाफ़े पर लिखा है ये
कसम है ऐ कुँअर, जो तुम ये मेरी चिट्ठियाँ  खोलो
 ( कुँअर बेचैन )

भिक्षा पात्र-उमा त्रिलोक

अचानक
उस ने  सुना
” भिक्षा देहि, भिक्षा देहि “
पहचान लिया
उसने वह स्वर
मुठ्ठी भर अन्न के लिए
उसने पुकारा था
किसी अन्नपूर्णा को
वह सहमी खड़ी रही
सोचती, कि
इस घर में तो उसका
कुछ भी नहीं
एक दाना अन्न भी नहीं
यही बताने
वह  पहुंची द्वार पर
मगर
नहीं देख पाई हीर
अपने रांझा को
पड़ा था
केवल
देहरी पर
एक
भिक्षा पात्र
जिसे
भर दिया उसने
अपने व्हिविल
स्वप्न से
( उमा त्रिलोक )

कुछ कविताएँ-नायिरा वहीद

१)
मैने तुम्हें प्यार किया
क्योंकि
यह
ख़ुद को प्यार करने से ज़्यादा
आसान था
२)
‘नही’
वह शब्द है
जो उन्हें गुस्से में भर देगा
और तुम्हें
आज़ादी देगा
३)
उदासी का
उसी तरह इन्तज़ार करो
जैसे तुम
इन्तज़ार करते हो बारिश का
दोनों ही
चमकाते हैं हमें
४)
तुम्हारा
मुझे न चाहना
मेरे लिए
ख़ुद को चाहने की शुरुआत थी
तुम्हारा शुक्रिया !
५)
मुझे
हर महीने
रक्तस्राव होता है
मैं तब भी नही मरती
मैं कैसे मान लूँ कि
मैं कोई जादू नही ?
६)
मैं
इस बात को तवज्जो नही देती
कि दुनिया ख़त्म हो रही है
मेरे लिए तो यह
कई बार
ख़त्म हुई
और अगली सुबह
शुरू भी हुई
कई बार
७)
मुझे ख़ुद से प्यार है
और यह
अब तक की
सबसे शान्त
सबसे सरल
सबसे ताक़तवर
क्रान्ति थी
८)
बेशक तुम्हें कोई चाहता होगा
पर इसका मतलब यह नही
कि वे तुम्हारी कदर भी करते होंगे
इसे एक बार फिर पढ़ें
और इन शब्दों को अपने दिमाग में गूँजने दें
 –
९)
ये कैसी
चौंका देने वाली कैमिस्ट्री है
कि आप मेरी बाँह छूते हैं
और लपटें
मेरे दिमाग में उठने लगती हैं
१०)
इच्छा
एक ऐसी शय है
जो तुम्हें खा जाती है
वहीँ तुम्हें
भूखा भी छोड़ जाती है
 –
११)
यह
अपने दर्द के बारे में
ईमानदार होना ही है
जो मुझे अजेय बनाता है
 –
१२)
उन पर
कभी भरोसा मत करना
जो कहते हैं
कि उन्हें रंग नज़र नही आते
इसका मतलब है
कि उनके लिए
तुम अदृश्य हो
१३)
अगर कोई मुझे चाहेगा नही
तो दुनिया ख़त्म नही हो जाएगी
पर अगर मैं ख़ुद को नही चाहूँगी
तो दुनिया ज़रूर ख़त्म हो जाएगी
 –
१४)
“फूल का काम
आसान नहीं
लपटों के बीच
नरम बने रहने में
वक़्त लगता है ।”
 –
१५)
मेरे पास
प्रेम के लिए
सात अलग-अलग लफ्ज़ थे
तुम्हारे पास
सिर्फ़ एक
मेरी बात में वज़न है
मानोगे!?
( नायिरा वहीद, अनुवाद :  नीता पोरवाल )

લો અમે તો આ ચાલ્યા-શૂન્ય પાલનપુરી

રાગ કેરી પ્યાલીમાં,  ત્યાગની સુરા પીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
જિંદગીની મસ્તીને  આત્મ-ભાન  આપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
બુદ્ધિ કેરી વીણા પર લાગણી  આલાપીને,  લો અમે તો આ ચાલ્યા !
દર્દહીન દુનિયામાં દિલનું મૂલ્ય સ્થાપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
સૃષ્ટિના કણેકણમાં  સૂર્ય  જેમ  વ્યાપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
જાન કેરા ગજ દ્વારા  કુલ  જહાન માપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
ધર્મના   તમાચાઓ,  બેડીઓ  પ્રલોભનની,  કોરડા   સમય   કેરા;
એક  મૂંગી  શ્રદ્ધાની  વેદનાઓ  માપીને,  લો અમે તો આ ચાલ્યા !
ધૈર્ય   કેરા   બુટ્ટાઓ,   પાંદડી   ક્ષમા   કેરી,   વેલ   છે કરુણાની,
પ્રાણના પટોળા પર, દિવ્ય ભાત છાપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
થાય  તે  કરે  ઈશ્વર !  ભાન  થઈ ગયું અમને, આપ-મુખ્ત્યારીનું !
દમ  વિનાના  શાસનની આજ્ઞા ઉથાપીને, લો અમે તો આ ચાલ્યા !
શૂન્યમાંથી  આવ્યા’તા,  શૂન્યમાં  ભળી  જાશું,  કોણ રોકનારું છે ?
નાશ  ને  અમરતાની  શૃંખલાઓ કાપીને લો અમે તો આ ચાલ્યા !
( શૂન્ય પાલનપુરી )

कहीं न जाए खो-उमा त्रिलोक

देखना कहीं न जाए, खो

गरीब की रोज़ी का प्रावधान
नन्ही बच्ची की मुस्कान

लाचार हृदय में बस्ती आस
मन का प्रमोद और उल्लास

लावण्य जीवन का, उगती प्यास
सपनों से भरा भरा उजास

मां की ममता का विश्वास
वृद्धा के आशीष का न्यास

देखना कहीं न जाए खो

अन्न धन न दे पाओ जो
दे देना तुम
आदर अवसर
साहस आभार
दिला देना सुविधा और न्याय
रह न जाए कोई बिना उपाय

दे आना तुम सांत्वना उनको
भर झोली सद्भावना उनको
यह भी न कर पायो जो
रख लेना तुम दुआओं में उनको
रख लेना तुम दुआओं में उनको

( उमा त्रिलोक )