क्या करुं…

By heenaparekh  

क्या करुं संवेंदना लेकर तुम्हारी?

क्या करुं?

मैं दुःखी जब-जब हुआ

संवेदना तुमने दिखाई,

मै कृतज्ञ हुआ हमेशा

रीति दोनों ने निभाई,

किन्तु ईस आभार का अब

हो उठा है बोझ भारी;

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करुं?

एक भी उच्छवास मेरा

हो सका किस दिन तुम्हारा?

उस नयन से बह सकी कब

ईस नयन की अश्रुधारा?

सत्य को मूंदे रहेगी

शब्द की कब तक पिटारी?

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करुं?

कौन है जो दूसरे को

दुःख अपना दे सकेगा?

कौन है जो दूसरे से

दुःख उसका ले सकेगा?

क्यों हमारे बीच धोखे

का रहे व्यापार जारी?

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करुं?

क्यों न हम लें मान हम हैं

चल रहे एसी डगर पर,

हर पथिक जिस पर अकेला

दुःख नहीं बंटते परस्पर,

दूसरों की वेदना में

वेदना जो है दिखाता,

वेदना से मुक्ति का निज

ह्षॅ केवल छिपाता;

तुम दुःखी हो तो दुःखी मैं

विश्व का अभिशाप भारी!

क्या करुं संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करुं?”

( श्री हरिवंशराय बच्चन )

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One Comment

  1. chandra
    Posted July 13, 2008 at 10:16 pm | Permalink | Reply

    Wah kya karun. uska to jawab nahi.

    By:Chandra

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