खंडहर बचे हुए

By heenaparekh  

खंडहर बचे हुए हैं ईमारत नहीं रही

अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया

हम पर किसी खुदा की ईनायत नहीं रही

मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा

या युं कहो कि बर्क की दहशत नहीं रही

हमको पता नहीं था हमें अब पता चला

ईस मुल्क में हमारी हकूमत नहीं रही

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रही

कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही

हिम्मत से सच कहो तो बूरा मानते हैं लोग

रो रो के बात कहने की आदत नहीं रही

( दुष्यंतकुमार )

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One Comment

  1. raju kadam
    Posted August 20, 2008 at 4:20 pm | Permalink | Reply

    good

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