लडकियां

By heenaparekh  

लडकियां अब और ईन्तजार नहीं करेंगी

वे घर की देहरी लांघकर

बाहर निकल आऍगी.

बेखौफ सडकों पर दौडेंगी

उछलेंगी, कूदेंगी, खेलेंगी

और मैदानों में गूंजेगीं उनकी आवाजें.

चूल्हा फूंकते, बर्तन मांजते और रोते रोते

थक चुकी हैं लडकियां

अब वे नहीं सहेंगी मार

नहीं सुनेंगी किसी की झिडकी और फटकार.

वो जमाना गया जब लडकियां

चूल्हों में सुलगती थीं

चावलों में उबलती थीं

और लुढकी रहती थीं कोनों में

गठरियां वनकर.

अब नहीं सुनाई देगी

किवाड के पीछे उनकी सिसकियां

फुसफुसाहटें और भुनभुनाहटें

और अब तकिए भी नहीं भीगेंगे.

( देवमणि पांडेय )

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2 Comments

  1. hiteshbhai joshi
    Posted September 11, 2008 at 1:12 pm | Permalink | Reply

    very good post congrants

  2. chandra.
    Posted September 12, 2008 at 1:14 am | Permalink | Reply

    bahot achhi lagi ,dhanyawaad, Devmani Pandey
    ki kalam jo aapne bhejee.
    postedby:::
    Chandra.

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