हो गई है पीर

हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए

ईस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज वह दिवार, परदों की तरह हिलने लगी

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सडक पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिये

सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सुरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

( दुष्यंतकुमार )


One thought on “हो गई है पीर

  1. આદણીય હીનાબહેન ૢ
    ૧૯૮૯ માં દુષ્યંતકુમારનો સંગ્રહ – સાયે મેં ધૂપ – વાંચ્યો હતો…અને સાચી વાત કહુ તો આટ્લો સુંદર મેં બીજો કોઈ કાવ્ય સંગ્રહ જોયો નથી…દરેક ગઝ્લ કંઈક નવું કહી જતી અદભૂત રચનાઓ છે…શક્ય હોય તો તેમની અન્ય રચનાઓ આ વિભાગમાં પોષ્ટ કરશો.

    કમલેશ પટેલ.

    ( http://kcpatel.wordpress.com )

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