http://heenaparekh.com/2008/10/18/01-26/
चलो एक बार फिर से,
अजनबी बन जाए हमदोनों
न मैं तुमसे कोई उम्मीद
रखुं दिल नवाजी की,
न तुम मेरी तरफ देखो
गलत अंदाज नजरो से.
न मेरे दिल की धडकन,
लडखडाये मेरी बातों से.
न जाहीर हो तुम्हारी
कश्मकश का राझ नजरो से.
तआरुक रोग हो जाए
तो उसका भूलना बहेतर.
तआल्लुक बोज बन जाए
तो उसका तोडना अच्छा.
वो अफसाना जिसे अंजाम तक
लाना न हो मुमकीन,
उसे खुबसुरत मोड
देकर छोडना अच्छा.
( साहिर लुधियानवी )
[ तआरुक-પરિચય, तआल्लुक-સંબંધ]


