डाकिये की घंटी

By heenaparekh  

डाकिए ने घंटी बजाई

और मैं दौड पडी दरवाजे पर

सोचते हुए मेरी चिठ्ठी आई है

मैंने चिठ्ठी ली

और ईश्वर का नाम लेकर

चिठ्ठी पर लिखा पता देखा

पता मेरे ही घर का था

पर चिठ्ठी मेरे नाम नहीं थी

मैं उदास कदमों से अन्दर आयी

और सोचने लगी

मैंने नहीं दिया कभी तुम्हें अपना पता

ना ही दिय अधिकार कुछ भेजने का

जब आकाश भर बातें करने वाले ही

मुजे चिठ्ठी नहीं लिखते

फिर तुमसे तो मैंने चंद लम्हों ही

की थी बात

कभी लगता है तुम नाराज हो

कभी लगता है अब अपनापन नहीं रहा

फिर मैं सोचती हूं

कहीं कोई स्थायी रिश्ता रहा हो तो

तब तो हो सम्बन्धो में गरमाहट

फिर लगता है

जब मैंने ही तुम्हारी खोज खबर

नहीं ली तो तुम क्यूं लोगे

यही सोचकर मैं निश्चय करती हूं

अब नहीं करुंगी मैं डाकिए का ईन्तजार

पर दूसरे दिन फिर

डाकिए की घंटी बजती है

और मैं दौड पडती हूं दरवाजे पर

( सुरभि )

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One Comment

  1. Posted November 11, 2008 at 8:15 am | Permalink | Reply

    Good One,

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