…नहीं देखा

आंखो में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा,

कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा I

बेवक्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पडेंगे,

ईक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा I

जिस दिन से चला हूँ मेरी म्ंजिल पे नजर है,

आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा I

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,

तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा I

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,

मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा I

( बशीर बद्र )

One thought on “…नहीं देखा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *