यात्रा

मैं नहीं जानती-

कि ‘आज’ की नाव कैसी है

नहीं जानती-

कि ‘कल’ का द्वीप क्या होगा

पर जानती हूँ-

कि ईश्क एक यात्री है

और ईश्क को अकेले

ईस नाव में जाना है…

अन्तर के पानी से-

एक लहर उठी है

और लहर के पैंरो से

यात्रा बंधी है

एक किरन रोज आती है

कहती है-

आओ मेरे साथ आओ!

हमें सूरज के घर में जाना है…

में नहीं जानती-

कि ‘आज’ की नाव कैसी है…

( अमृता प्रीतम )

4 thoughts on “यात्रा

  1. hame suraj ke ghar mei jaana he….

    mei nahi jaanti –
    kee ‘aaj ki naav kaisei he…..

    aap ki kalam me jaadu hai,,,bahot paand aai.

  2. wah aaj ek pyase ko pani pila diya hay aap ne is kavita ke jariye.. me in sab kavita ke liye bahut pyasa rahta tha.. aap ne muje ye bhej ke pyaas buja di.. tnx a lot… hardik-001

  3. एक किरन रोज आती है

    कहती है-

    आओ मेरे साथ आओ!

    हमें सूरज के घर में जाना है…

    VAH VAH…

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