मेरे खुदा मैं अपने खयालों को क्या करुं
अंधों के नगर में उजालों को क्या करुं
चलना ही है मुझे मेरी मंजिल है मीलों दूर
मुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करुं
दिल ही बहुत है मेरा ईबादत के वास्ते
मस्जिद को क्या करुं मैं शिवालों को क्या करुं
मैं जानता हूं सोचना अब एक जुर्म है
लेकिन मैं दिल में उठते सवालों का क्या करुं
जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करुं
( राजेश रेड्डी )



2 Comments
YA RELLY V. V. NICE NERY BY LIFE FAKT
saras…