क्या करुं

By heenaparekh  


मेरे खुदा मैं अपने खयालों को क्या करुं
अंधों के नगर में उजालों को क्या करुं


चलना ही है मुझे मेरी मंजिल है मीलों दूर
मुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करुं


दिल ही बहुत है मेरा ईबादत के वास्ते
मस्जिद को क्या करुं मैं शिवालों को क्या करुं


मैं जानता हूं सोचना अब एक जुर्म है
लेकिन मैं दिल में उठते सवालों का क्या करुं


जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करुं


( राजेश रेड्डी )

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2 Comments

  1. pinke
    Posted May 18, 2009 at 4:30 pm | Permalink | Reply

    YA RELLY V. V. NICE NERY BY LIFE FAKT

  2. Posted May 18, 2009 at 6:25 pm | Permalink | Reply

    saras…

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