आखिरी खत

By heenaparekh  

कई साल पहले

किसी ने अगर कोई रास्ता चुना हो

और उस रास्ते पर

अँधेरे उजालों से लडता रहा हो

कभी सख्त चट्टान सा जम गया हो

कभी आँधियों में घिरे पेड जैसा…उखडता रहा हो

मगर फिर भी आगे ही बढता रहा हो

अगर चलते-चलते कभी बीच रस्ते में

उस राहरौ में ये ईहसास जागे

मेरा रास्ता ये नहीं दूसरा है

तो क्या हो-!

जो आगे बढे अब

अँधेरों को अपना मुकद्दर बनाये

अगर पीछे लौटे तो

साँसों की पूँजी जो आधी बची है उसे भी गँवाये

दुआओं का तालिब हूँ

फुर्सत मिले तो

मिरे हक में तुम भी दुआ करती रहना-

( निदा फाजली )

[राहरौ=पथिक, ईहसास=संवेदना, दुआओं=प्रार्थनाओं, तालिब=अभिलाषी]

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4 Comments

  1. hanif
    Posted May 23, 2009 at 10:52 am | Permalink | Reply

    સરસ રચના

  2. Kusum Rawal
    Posted May 24, 2009 at 7:11 pm | Permalink | Reply

    Aarth purna sunder kavita.

  3. Chandra
    Posted May 29, 2009 at 6:44 pm | Permalink | Reply

    bahot sundar kavita he,,,,
    aur bheja te rehana.

  4. Amit
    Posted May 29, 2009 at 8:28 pm | Permalink | Reply

    Very Very Deep Thought
    good
    i like very much

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