ख्वाब ईन आँखों का

ख्वाब ईन आँखों का कोई चुराकर ले जाये
कब्र के सुखे हुए फूल उठाकर ले जाये


मुन्तजिर फूल में खुश्बू की तरहा हूँ कब से
कोई झोंके की तरह आये उडाकर ले जाये


ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी
जो हथेली पे रची मेहँदी छुडाकर ले जाये


मैं मोहब्ब्त से महकता हुआ खत हूँ मुझको
जिन्दगी अपनी किताबों में छुपाकर ले जाये


खाक ईन्साफ है ईन अन्धे बुतों के आगे
रात थाली में चरागों से सजाकर ले जाये


उनसे ये कहना मैं पैदल नहीं आने वाला
कोई बादल मुझे काँधे पे बिठाकर ले जाये


( बशीर बद्र )

4 thoughts on “ख्वाब ईन आँखों का

  1. मैं मोहब्ब्त से महकता हुआ खत हूँ मुझको
    जिन्दगी अपनी किताबों में छुपाकर ले जाये
    क्या बात है हीनाजी आपका तो जवाब नही..तखल्लुस अच्छा लगा और नया टाइटल..अब तो उर्दु भी सिखादो हमे कुछ शब्द उपरसे जाते है…

  2. तुम्हारी ताज़ा प्रस्तुति में बशीर बद्र की इस ग़ज़ल ने बेसुध सा ही कर दिया … ब्लॉग देखा…बहुत प्यारा सेलेक्शन है…

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