ख्वाब ईन आँखों का

By heenaparekh  

ख्वाब ईन आँखों का कोई चुराकर ले जाये
कब्र के सुखे हुए फूल उठाकर ले जाये


मुन्तजिर फूल में खुश्बू की तरहा हूँ कब से
कोई झोंके की तरह आये उडाकर ले जाये


ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी
जो हथेली पे रची मेहँदी छुडाकर ले जाये


मैं मोहब्ब्त से महकता हुआ खत हूँ मुझको
जिन्दगी अपनी किताबों में छुपाकर ले जाये


खाक ईन्साफ है ईन अन्धे बुतों के आगे
रात थाली में चरागों से सजाकर ले जाये


उनसे ये कहना मैं पैदल नहीं आने वाला
कोई बादल मुझे काँधे पे बिठाकर ले जाये


( बशीर बद्र )

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4 Comments

  1. Posted June 16, 2009 at 7:15 pm | Permalink | Reply

    मैं मोहब्ब्त से महकता हुआ खत हूँ मुझको
    जिन्दगी अपनी किताबों में छुपाकर ले जाये
    क्या बात है हीनाजी आपका तो जवाब नही..तखल्लुस अच्छा लगा और नया टाइटल..अब तो उर्दु भी सिखादो हमे कुछ शब्द उपरसे जाते है…

  2. pinke
    Posted June 17, 2009 at 1:13 pm | Permalink | Reply

    V.V. NICE.

  3. R. D. Saxena
    Posted June 17, 2009 at 7:23 pm | Permalink | Reply

    तुम्हारी ताज़ा प्रस्तुति में बशीर बद्र की इस ग़ज़ल ने बेसुध सा ही कर दिया … ब्लॉग देखा…बहुत प्यारा सेलेक्शन है…

  4. Prajapati Vishal
    Posted June 17, 2009 at 7:41 pm | Permalink | Reply

    wowwwwwwwwwwwww…………… thanks heenaben ………..

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