मुझी में खुदा था – निदा फाजली

By heenaparekh  

मुझे याद है

मेरी बस्ती के सब पेड

पर्वत

हवाएँ

परिन्दे

मेरे साथ रोते थे

हँसते थे

.

मेरे ही दुख में

दरिया किनारों पे सर पटकते थे

.

मेरी ही खुशियों में

फूलों पे

शबनम के मोती चमकते थे

.

यहीं

सात तारों के झुरमुट में

लाशक्ल सी

जो खुनक रोशनी थी

.

वही जुगनुओं की

चरागों की

बिल्ली की आँखों की ताबन्दगी थी

.

नदी मेरे अन्दर से होके गुजरती थी

आकाश…!

आँखों का धोका नहीं था

.

ये बात उन दिनों की है

जब ईस जमीं पर

ईबादत घरों की जरुरत नहीं थी

मुझी में

खुदा था…!

.

( निदा फाजली )

.

[ लाशक्ल = बिना शक्ल, खुनक = ठण्डी ]

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One Comment

  1. क्रिश्ना
    Posted May 16, 2011 at 4:20 pm | Permalink | Reply

    तू ना जाने आस पास है खुदा…जिनको किसीसे मोहब्बत है या जिनके दिलों में प्यार है खुदा आज भी वही बसते है…जैसे आप में है और जैसे हम में भी बसते ही है…

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