लगते हैं – राजेश रेड्डी

मिलते ही हमको समझाने लगते हैं

दीवानों को हम दीवाने लगते हैं

 .

किस पर तीर चलाऊँ किसको छोडूँ मैं

दुश्मन सब जाने-पहेचाने लगते हैं

 .

दिन भर जो ढोते हैं बोझ खामोशी का

नींदों में अकसर चिल्लाने लगते हैं

 .

झूठ को फैलने में लगते हैं बस कुछ पल

लेकिन सच को कई जमाने लगते हैं

 .

हम भी कितने नादाँ हैं, इक वादे पर

कैसे-कैसे ख्वाब सजाने लगते हैं

 .

तौबा तो करते हैं रोज गुनाहों से

रोज मगर उनको दोहराने लगते हैं

हाल अजब होता है दिल का गुरबत में

सीधे-सादे बोल भी ताने लगते हैं

 .

( राजेश रेड्डी )

2 thoughts on “लगते हैं – राजेश रेड्डी

  1. કવિશ્રી રાજેશ રેડ્ડીને રાજકોટ એક કાર્યક્રમમાં રૂબરૂ મળવાનું થયેલું ત્યારે એમની કવિતાઓ એમના જ આગવા અંદાઝમાં સાંભળવાનો લ્હાવો મળેલો.
    બહુજ સશક્ત અભિવ્યક્તિના ધની છે રેડ્ડીજી…
    આજે અહીં એમની ગઝલિયતથી ભરપૂર રચના માણવા મળી
    આભાર આપનો.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.