लगते हैं – राजेश रेड्डी

By heenaparekh  

मिलते ही हमको समझाने लगते हैं

दीवानों को हम दीवाने लगते हैं

 .

किस पर तीर चलाऊँ किसको छोडूँ मैं

दुश्मन सब जाने-पहेचाने लगते हैं

 .

दिन भर जो ढोते हैं बोझ खामोशी का

नींदों में अकसर चिल्लाने लगते हैं

 .

झूठ को फैलने में लगते हैं बस कुछ पल

लेकिन सच को कई जमाने लगते हैं

 .

हम भी कितने नादाँ हैं, इक वादे पर

कैसे-कैसे ख्वाब सजाने लगते हैं

 .

तौबा तो करते हैं रोज गुनाहों से

रोज मगर उनको दोहराने लगते हैं

हाल अजब होता है दिल का गुरबत में

सीधे-सादे बोल भी ताने लगते हैं

 .

( राजेश रेड्डी )

Share

2 Comments

  1. Posted August 24, 2011 at 2:31 am | Permalink | Reply

    કવિશ્રી રાજેશ રેડ્ડીને રાજકોટ એક કાર્યક્રમમાં રૂબરૂ મળવાનું થયેલું ત્યારે એમની કવિતાઓ એમના જ આગવા અંદાઝમાં સાંભળવાનો લ્હાવો મળેલો.
    બહુજ સશક્ત અભિવ્યક્તિના ધની છે રેડ્ડીજી…
    આજે અહીં એમની ગઝલિયતથી ભરપૂર રચના માણવા મળી
    આભાર આપનો.

  2. Posted August 26, 2011 at 1:40 pm | Permalink | Reply

    सीधे सादे बोल भी ताने लगते है…अति सुंदर.

Post a Comment

Your email is never shared. Required fields are marked *

*
*
Powered By Indic IME