http://heenaparekh.com/2011/11/13/diwaro-dar-se/
दीवारों-दर से उतर के परछाइंयाँ बोलती हैं
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं
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परदेस के रास्तों में रुकते कहाँ हैं मुसाफिर
हर पेड कहता है किस्सा, खामोशियाँ बोलती हैं
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मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को
जिस्मों से बाहर निकल के अंगडाइयाँ बोलती हैं
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इक बार तो जिन्दगी में मिलती है सबको हुकूमत
कुछ दिन तो हर आईने में, शहजादियाँ बोलती हैं
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सुनने की मुहलत मिले तो आवाज है पत्थरों में
उजडी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं
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( निदा फाजली )



One Comment
Good.