पिया, खोलो किवाड – हरिवंशराय बच्चन

By heenaparekh  

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पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

बगिया में मरमर,

दुनिया में जगहर,

उतरी किरन की कतारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

कलियों में गुन-गुन,

गलियों में रुन-झुन,

अम्बर से गाती बहारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

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पतझर को भूली,

हर डाली फूली,

बीती को हम भी बिसारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

गूंगी थीं घडियां,

गीतों की कडियां,

वीणा को फिर झनकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

माना कि दुख है,

बिधना विमुख है,

आओ उसे ललकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

( हरिवंशराय बच्चन )

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2 Comments

  1. Posted February 6, 2012 at 3:03 pm | Permalink | Reply

    जब बंध ही नहीं किए दरवाज़े तो किवाड़ क्या खोले?

  2. Posted February 10, 2012 at 8:43 pm | Permalink | Reply

    હરિવંશરાય રાયની આ સુંદર રચનામાં ખૂબજ સુંદર માર્મિક વાત કહી જાય છે.. પિયાને ક્યા કબાટના દરવાજા ખોલવાની વાત કહે છે ..! જે સમજવા જેવું છે…!

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