http://heenaparekh.com/2012/02/15/jaisi-hai/

ज़िन्दगी इंतजार जैसी है
दूर तक रहगुजार जैसी है
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चंद बेचेहरा आहटों के सिवा
सारी बस्ती मज़ार जैसी है
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रास्ते चल रहे हैं सदियों से
कोई मंजिल गुबार जैसी है
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कोई तन्हाई अब नहीं तन्हा
हर खामोशी पुकार जैसी है
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ज़िन्दगी रोज़ का हिसाब किताब
कीमती शै उधार जैसी है
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( निदा फाजली )
[ शै = वस्तु ]



One Comment
सुन्दर ग़ज़ल और अशआर है…