जैसी है – निदा फाजली

ज़िन्दगी इंतजार जैसी है

दूर तक रहगुजार जैसी है

 .

चंद बेचेहरा आहटों के सिवा

सारी बस्ती मज़ार जैसी है

 .

रास्ते चल रहे हैं सदियों से

कोई मंजिल गुबार जैसी है

 .

कोई तन्हाई अब नहीं तन्हा

हर खामोशी पुकार जैसी है

 .

ज़िन्दगी रोज़ का हिसाब किताब

कीमती शै उधार जैसी है

 .

( निदा फाजली )

[ शै = वस्तु ]

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