रात की काली चादर – जावेद अख्तर

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रात की काली चादर ओढे

मुंह को लपेटे

सोइ है कब से

रुठ के सबसे

सुबह की गोरी

आँख न खोले

मुंह से न बोले

जब से कीसीने

कर ली है सूरज की चोरी

आओ

चल के सूरज ढूंढे

और न मिले तो

किरन किरन फिर जमा करें हम

और इक सूरज नया बनाये

सोई है कब से

रुठ के सब से

सुबह की गोरी

उसे जगायें

उसे मनायें

 .

( जावेद अख्तर )

One thought on “रात की काली चादर – जावेद अख्तर

  1. मुझसे वादा करो मुझे रुलाओगे नहीं,
    हालात जो भी हो मुझे भुलाओगे नहीं,
    छुपाके रखोगे अपनी आँखों में मुझको,
    दुनिया में किसी और को दिखाओगे नहीं…!!!

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