प्रात-मुकुलित – हरिवंशराय बच्चन

ठीक है मैंने कभी देखा अँधेरा,

किन्तु अब तो हो गया फिर से सबेरा,

भाग्य-किरणों ने छुआ संसार मेरा;

 प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

तप्त आँसू से कभी मुख म्लान होता,

किन्तु अब तो शीत जल में स्नान होता,

राग-रस-कण से घुला संसार मेरा,

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

आह से मेरी कभी थे पत्र झुलसे,

किन्तु मेरी साँस पाकर आज हुलसे,

स्नेह-सौरभ से बसा संसार मेरा;

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

एक दिन मुझमें हुई थी मूर्त जडता,

किन्तु बरबस आज मैं झरता, बिखरता,

है निछावर प्रेम पर संसार मेरा;

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

( हरिवंशराय बच्चन )

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