गुम हो गई एक चिठ्ठी-गोपाल सहर

कोई नहीं है कहीं मुन्तज़िर !

एक वो चिठ्ठी ही गुम नहीं हुई हैं।
बहुत कुछ गुम हो गया है चिठ्ठी के साथ-साथ।
ढूंढ़ता हूं यहां-वहां।
कुछ भी हाथ में नहीं आता है।
स्याही, कलम कहाँ चले गये हैं।
आंसू … झील-आँखें सूख गयी हैं….
पत्थर फेंकू….धूल उड़ेगी थोड़ी सी और बैठ जायेगी फिर से..
अब कोई बवण्डर भी नहीं उठता है हमारे अंदर।
सब जगह् राजनीति..
कदम दर कदम राजनीति….

( गोपाल सहर )

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