तितलीयां कौन उडाते है?-शिरीष मोहनलाल दवे

समाचार माध्यमोंके लिये अभी कई सारे ट्रोल विद्यमान (जिन्दा) है. खास करके बीजेपी-नरेन्द्र मोदी विरोधीयोंके लिये कई ट्रोल विद्यमान है. ट्रोलसे प्रयोजन है. समग्रतया दृष्टिसे देखा जाय तो कोई एक, जो वास्तवमें छोटा है, तथापि उसको बडा कर दो. और उसकी लगातार चर्चा किया करो. वह ट्रोल बन जाता है. ऐसी भी कई घटना घटती है जो वास्तवमें अधिक प्रभावशाली होती है किन्तु वह यदि हमारे निश्चित एजन्डाके लिये उचित नहीं है तो उनको अनदेखा करो.

ट्रोल चलाना नहेरुवीयन कोंग्रेसकी आदत है

ट्रोल चलाना वैसे तो राजकीय पक्षोंकी आदत है. लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष उनमें खास है. खास करके जब, प्रतिस्पर्धी पार्टीकी बुराई करनी होती है तो ऐसे सुसर्जित ट्रोल मददगार सिद्ध होते है, ऐसा ये लोग मानते है.

जैसे कि अखलाक एक ट्रोल था. नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्षके एक सहयोगी शासित राज्यमें “गौ-मांस” संबंधित घटनाको उछाला गया था. कन्हैया एक ट्रोल था जिसने जवाहर नहेरु युनीवर्सीटीमें देश विरोधी नारे लगवाये थे, खालेद एक ट्रोल था, जिसने अपने साथीयोंके साथ कन्हैयाके सहयोगसे उपरोक्त नारे लगाये थे. गुजरातके उना नामके गांवके समिप “गौ-मांस” संबंधित तथा कथित घटना को लगातार उछाला गया था. वह व्यक्ति दलित था और गांवमें घटी एक घटनाका पीडित था. उसको एक ट्रोल बना दिया था, कश्मिरमें सुरक्षा दलोंने, जीपके हुड पर बंधा हुआ पत्थरबाज व्यक्तिको ट्रोल बनाया गया था, एक लडकी थी, गुर महेर कौर, जिसने कहा “मेरे पिताजी जो सैनिक थे, उनको पाकिस्तानने नहीं मारा था, उनको तो गोलीने मारा था”, गौरी लंकेशको एक ट्रोल बनाया गया था. वह एक पत्रकार थी. और ऐसी हवा फैलायी गयी कि उसको बीजेपीने मारा. वह कर्नाटकमें थी और वहां भी नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है या तो उनके सहयोगी पक्ष/पक्षोंका शासन है तो, बीजेपी या बीजेपीके सहयोगी लोग उस राज्य में हिंसा फैलाते है ऐसी हवा फैलाना.

यदि बीजेपीका शासन है और ऐसे किसीका खून होता है तो ऐसी हवा फैलाना की शासक खुद ऐसी हिंसा फैलाता है. ऐसे सियासती खूनसे तो नहेरुवीयन कोंगी [नहेरुवीयन कोंग्रेस (ईन्दिरा) पक्ष] और उनके सहयोगी साम्यवादीयोंके हाथको खूनी पंजा भी कहा जाता है. केरलमें ऐसे सियासती खूनोंकी गिनती कर लो.

रा.गा. (राहुल गांधी) भी एक ट्रोल है

वैसे तो रा.गा. (राहुल गांधी) भी समाचार माध्यमोंके लिये एक ट्रोल है. लेकिन आज हम ट्रोलकी बातें नहीं करेंगे. आज हम तितलीयोंकी बाते करेंगे.

“तितलीयां उडाना” शायद हिन्दी भाषामें मूँहावरा नहीं है. अंग्रेजीमें “बटरफ्लाई” एक ऐसा शब्द प्रयोग है. यदि आपके पास किसीके निर्णयको क्षतिपूर्ण सिद्ध करना है, किन्तु आपके पास कोई तर्क नहीं है और फिर भी आपको उसकी मजाक करना है तो आप बटरफ्लाय जैसे सुशोभित शब्दोंका उपयोग करके लोगोंका ध्यान आकर्षित कर सकते हैं.

बटरफ्लाय मतलब तितली. तितली कैसी होती है?

तितली रंगबेरंगी होती है. फुलोंकी पत्तीयां जैसे उनके पंख होते हैं. या उससे भी अधिक सुंदर होते हैं. पंख ही उनकी पहेचान है. वास्तवमें तितलीयोंकी प्रजातियां कमजोर होती है. किन्तु कमज़ोर होना मुख्य बात नहीं है. उनकी सुंदरता ही आकर्षण है. लोग उनसे ईसी कारणसे प्रसन्न होते हैं. यदि हमारी बातसे लोग प्रसन्न है होते हैं तो वे शायद ज्यादा सोचेंगे नहीं और हमारी बातोंको स्विकृति दे देंगे.

यदि आपके पास तर्क नहीं है, फिर भी आप किसी नापसंद व्यक्तिकी बुराई करना चाहते हो, और उसको मजाकका पात्र बनाना चाहते हो, या तो उसने जो निर्णय लिये है उन निर्णयोंकी मजाक उडाना चाहते हो, तो आप तितलीयाँ जैसे खूबसुरत शब्दोंका चयन करें, और उनका प्रयोग करें. शब्दोंके प्रासमें सौंदर्य होता है. वैसे तो तितली-प्रयोगके पीछे एक विचार या तर्क भी होना चाहिये. लेकिन तर्क होना अनिवार्य नहीं है.

तितलीयां ही सिर्फ नहीं उडायी जाती, किटककी प्रजातिके ही अन्य इन्सेक्ट जैसे कोकरॉच, फुद्दा, मक्खीयां भी उडायी जा सकती हैं. मक्खीयोंका ज्यादा प्रचलन नहीं है, लेकिन जो लोग मक्खीयां मारते है वे तितलीयां और फुद्दे (फुद्दा एक ऐसा किटक प्रजातिका जीव है जो आकर्षक नहीं होता किन्तु आपको हानिकारक होनेकी भ्रमणा दे सकता है) भी उडाते है.

मान लिजीये आपको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं है.

आप क्यों नरेन्द्र मोदीको पसंद नहीं करते हैं उसके अनेकानेक कारण हो सकते हैं.

तितलीयां या और फुद्दे कब उडाये जाते हैं?

यदि आप नरेन्द्र मोदीको आपका प्रतिस्पर्धी मानते हो. तो आपको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं पड सकता है. क्यों कि आगे बढनेकी स्पर्धामें उसने आपको पीछे छोड दिया, या तो आपसे वह आगे निकल गया, या तो नरेन्द्र मोदीकी बातें आपको आपके डी.एन.ए. के कारण या तो कोई अन्य कारणसे स्विकार्य नहीं है तो आप तितलीयोंका सहारा ले सकते है.

तितलीयां उडाने वाले अपने पक्षके बाहर होते है ऐसा आवश्यक नहीं है.

बीजेपीकी केन्द्रीय कारोबारीने २०१४के लोकसभा चूनावके लिये, अडवाणीना पत्ता काट दिया तो अडवाणीने भी कई तितलियां उडाई थी कि “नंबर – १ चूनावप्रचारक धीर गंभीर होना चाहिये.”

अभी थोडे समय पूर्व ही भूतपूर्व मंत्री यशवंत सिंहाने कुछ तितलीयां उडायी थीं.

“पहेले इन्डिया को बनाओ, फिर इन्डियामे बनानेकी बात करो” (फर्स्ट मेक इन्डिया धेन टॉक ओफ मेक ईन इण्डिया).

भारतीय अर्थतंत्र घुमरी खाके गीर रहा है.

इसका अर्थ समज़ना जरुरी है. यदि आप गुरुत्वाकर्षणके सिद्धांतको जानते है तो गुरुत्वके क्षेत्रमें पदार्थ प्रवेगित गतिसे गीरता है. लेकिन यदि वह पदार्थ गतिमान है तो चक्राकार गोलगोल घुमता हुआ गिरता है. क्यों कि गुरुत्वके क्षेत्रमें अवकाश वक्रीभूत होता है. हमारा अर्थ तंत्र भी गोलगोल घुमता हूआ हर क्षण गीरनेके बढते हुए वेगसे गिर रहा है.

“जीडीपी में जो वृद्धि देखाई जाती है वह तो नयी फोर्म्युलाके मापदंड पर आधारित है. पहेलेकी फोर्म्युलाके मापदंडसे तो वह दो अंक और कम है. इसके लिये विमूद्रीकरण और जीएसटी कारणभूत है.” वैसे तो यशवंत सिंहाने कश्मिर पोलीसी, गौ हत्या बंधीके बारेमें “कुछ लोगोंका प्रशासनके नियमोंको अपने हाथमें लेना” ईन सभी पर अपने विचार प्रकट किये. यशवंत सिंहाने अपने शासनकालमें प्लानींग कमीशनके विरुद्ध और उसकी कमजोरीके बारेमें कठोर अभिप्राय दिया था. लेकिन जब नरेन्द्र मोदीने प्लानींग कमीशनको नष्ट किया तो उन्होनें उतनी ही कठोरतासे नरेन्द्र मोदीके निर्णय पर टीप्पणी की.

वित्तमंत्री अरुण जेटलीने जब यशवंत सिन्हाको अंकोके आधार पर सविस्तर उत्तर दिया तो यशवंत सिंहाने बोला कि “मैं अंकोमें विश्वास नहीं रखता”. एक व्यक्ति अंकोंके आधार पर अन्यकी बुराई करता है वही जब अंकोंके सहारे दिये गये तर्कका हवाई इन्कार करता है, इस व्यक्तिके लक्षणको संस्कृतभाषामें “वदतः व्याघात” कहेते है. इसका हिन्दी अर्थ है “अभी बोले अभी फोक”.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके युवराज तो तितलीयां ही उडाते है. क्यों कि वे समज़ते है कि यदि हम चूनाव बार बार हार जावें तोभी चूनाव जितनेका यही तरिका है. “लगे रहो पप्पुभाई” के सिवा इस युवराजको हम क्या कह सकते है?

जी.एस.टी.के बारेमें सरकारकी बुराई करना क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये योग्य है?

जी.एस.टी. किस पक्षके दिमागकी उपज है इस बातको जाने दो. जी.एस.टी.का पूर्वालेख (ड्राफ्ट) और प्रस्ताव नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी रक्खा था. वह पूर्वालेख क्षतिपूर्ण था. उसको लागु करनेकी प्रणालीयां भी क्षतिपूर्ण थीं. उतना ही नहीं किन्तु, नहेरुवीयन कोंग्रेसमें उतनी संकलन शक्ति भी नहीं थी कि वह सभी राज्योंकी ईच्छाओंका आकलन कर सके, जी.एस.टी.का कोई अर्थपूर्ण पूर्वालेख में संशोधन कर सके, और उसको कार्यान्वित करनेकी प्रणालीयोंमें संशोधन कर सके. बीजेपीके नेतृत्ववाली सरकारने यह सक्षमता दिखायी है, और उतना ही नहीं उसने, सभी राज्योंके प्रतिनिधियोंसे बनी, एक जी.एस.टी.-परिषद भी बनायी है, जो हर सत्रके अंतमें जी.एस.टी.में आवश्यक संशोधन करती रहती है. बीजेपीकी सरकारका जो जी.एस.टी.का प्रस्ताव था वह नहेरुवीयन कोंग्रेसका प्रतिबिंबित (कार्बन कॉपी) पूर्वालेख नहीं है. जिस जी.एस.टी.के प्रावधानोंको सभी पक्षोंने मान्य रक्खा है उसीका अंध विरोध करना तो कोई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंसे ही सिखें.

नहेरुवीयन कोंग्रेसकी उडाई हुई तितलीयां कैसी है?

“जी.एस.टी. तो गब्बर सिंह टेक्स है.” रा.गा. उवाच…

ईस तितली पर क्या हम चर्चा कर सकते हैं? क्या यह कोई तर्क है? यह खचित्‌ वाणी विलास है या तो अधिक कठोर शब्दोंमें कहें, तो वाणी पर दुष्कर्म है.

“जी.एस.टी. और नोट बंदीने सुनामी सर्जी है” रा.गा. उवाच.

लगता है कि रा.गा. को सुनामी शब्द पसंद पड गया है. क्यों कि नकल करना उसकी आदत है. “चाय पे चर्चा” के विरुद्ध उसने “खाट पे चर्चा”का आयोजन किया था. २०१४के संसदके चूनावमें बीजेपीके नेताओंने कहा था कि “मोदीका प्रवाह” नहीं लेकिन “मोदी नामकी सुनामी” है. तो रा.गा.जी को यह सुनामी शब्द पसंद पड गया लगता है. तो उन्होंने बोल दिया कि “जी.एस.टी.” और “नोट बंदी” तो सुनामी है.

फर्जी नोटोंका मुद्रण, उनका भारत-प्रवेश और उनका वितरण पाकिस्तानमेंसे होता था. यह समस्या इतनी व्यापक थी कि, राष्ट्रीय कृत बेंक-संचालित एटीएम यंत्रोंसे भी फर्जी नोटें निकलती थीं, नहेरुवीयन कोंग्रेसने और उनके अमेरिकी ग्रीनकार्ड होल्डर आर.बी.आई. के गवर्नरने कभी न तो इसका उपाय किया, न तो उपाय बताया. क्यों कि, या तो इसका उपाय, उनके दिमागसे परे था, या तो फर्जी नोटोंके कारोबारमें उनका स्वहित निहित था. उनका नोट-बंधीका विरोध तो केवल व्यंढ ही था और है.

“आर.एस.एस. की सभामें लडकियाँ शोर्ट्स क्यों नहीं पहनती?” रा.गा. उवाच …

रा.गा.जी समज़ते हैं कि यदि बीजेपीवाले मुस्लिमोंके बुर्केके विरोधमें है तो हिन्दु लडकियोंके “देशी-ड्रेस”का भी विरोध करना चाहिये. उनका तात्पर्य यह कि कुर्ता पायजामा, चणीया-चोली-ऑढणी, साडीयाँ, सभी देशी ड्रेस व मटीरीयल को अपनाना बुर्केको अपनानाके समकक्ष है. यदि आरएसएसवाले अपने को प्रगतिशील मानते हैं तो उनकी सभामें लडकियोंको शोर्ट्स परिधान करनेकी आदत डालनी चाहिये. तो हे मुसलमान लोग, आप हमें यानी कि नहेरुवीयन कोंग्रेसको समज़ो, कि हम आर.एस.एस. वालोंकी कैसे मजाक उडाते हैं.

“महात्मा गांधी, एन.आर.आई. थे.” रा.गा. उवाच.

आप रा.गा.के कथनोंका कहाँ कहाँ विश्लेषण करते रहोगे. वह वास्तवमें विश्लेषणके योग्य है ही नहीं. जैसे “मौतका सौदागर”जैसी मीथ्या और अपरिपक्व दिमागवाली उसकी मम्मी वैसा ही उसकी संतान (फरजंद).

तो क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसमें कोई उत्तर देने योग्य नेता बचा ही नहीं है?

अभी तक तो दूर दूर क्षितिजमें भी ऐसा नेता दिखाई नहीं देता.

अपने प्रमाणपत्रोंके आधारसे लब्धप्रतिष्ठ स्वपक्ष प्रमाणित मनमोहन सिंहको देख लो. उन्होंने एक नमूनेदार सीयासती नेता जैसा बयान दिया था कि मुस्लिमोंका इस देश पर ज्यादा अधिकार है.

यही कोंग्रेसके एक नेताने पाकिस्तानी टीवी चेनलके वार्तालापके अंतर्गत कहा कि “आपको मोदीको हटाना होगा तभी तो पाकिस्तान और भारतके बीच संबंध सुधर सकते है.” इस उक्तिके अनेक मतलब निकल सकते है.

“कश्मिरके हिन्दुओंकी हकालपट्टीकी घटना आरएसएसके एजन्डाके अनुसार थी.” शशि थरुर उवाच.

भारतके मुस्लिमोंकी वोटबेंक बनाये रखने के लिये एक नहेरुवीयन कोंग्रेसीने पाकिस्तानकी टीवी चेनल पर चलते वार्तालापमें अपना सूर पूराया था कि, “कश्मिरके हिन्दुओंकी हकालपट्टीकी घटना आरएसएसके एजन्डाके अनुसार थी.”

अभी आप यह देखिये कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके सुज्ञ और वैज्ञानिक (टेक्नीकल सलाहकार) जो स्वयं सफेद टोपी पहन सकते है वे क्या कहेते है.

“जीन्स पहेनके, स्कॉच (व्हीस्की) पीके भी आप गांधी विचारोंको अपना सकते हो.” पित्रोडा उवाच …

हाँ जी यह साम पित्रोडाजीका कथन है. ये पित्रोडाजी नहेरुवीयन कोंग्रेस और समाचार माध्यम द्वारा प्रमाणित दूरसंचार तकनिकीके स्थापक और प्रवर्तक है.

पहेले तो यह बात अवगत होनी चाहिये कि दूरसंचार तकनिकीकी स्थापना ये पित्रोडाजीने नहीं की थी. इसके बीज बोनेकी कल्पना या तो बीजका बोने वाला हेमवतीनंदन बहुगुणा था. १९७२में उन्होंने शरीन कमीटी बिठाई थी और बहुगुणाजीको अनुभूति हुई थी कि “दूर संचार समस्याका समाधान करना ही होगा”. उन्होंनें एड्वान्स लेवल टेलीकोम ट्रेनींग सेंटरका निर्माण करवाया था. किन्तु उनसे गलती यह हो गयी कि स्वयंके कार्योंका श्रेय वे स्वयं हि लेने लगे थे. यह बात इन्दिरा नहेरु-गांधी (इन्दिरा नहेरु-गांधी मतलब इन्दिरा गांधी) स्थापित प्रणालीके विरुद्ध थी. इन्दिराजी को बहुगुणा पसंद नहीं पडा. और उनको बरखास्त कर दिया था. कालक्रमसे इन्दिरा-कोंग्रेसकी १९७७में पराजय हुई. समाजवादी गांधीवादी नेता श्री ज्योर्ज फर्नान्डीस दूर संचार मंत्री बने थे तो उन्होने “डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक दूरसंचार प्रणालीके टेक्नोलोजी ट्रान्स्फरके साथ” वाला वैश्विक निविदा (टेन्डर) फ्लोट करवाया था. उनकी सरकार गिर गयी. इन्दिराकी सरकारने फ्रान्सकी अल्काटेल कंपनीके टेन्डरको मान्य रक्खा. और ओर्डर भी दिये. १९८२-८३में भारतसे चार टीम, इन्स्टोलेशन और मेन्टेनन्सके प्रशिक्षणके लिये फ्रान्स गयी थी. सर्वप्रथम २०००० टेलीफोन लाईनकी क्षमता वाले डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक्स टेलीफोन एक्सचेन्जके इन्स्टोलेशनका काम फ्रेन्च टीमने १९८३में ही शुरु कर दिया था. उसके बाद कफपरेड, कुपरेज, अंधेरी, घाटकोपर के डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक्स टेलीफोन एक्सचेन्जके इन्स्टोलेशनका काम भारतीय टीमने शुरु कर दिया था. उस समय साम पीत्रोडाजी दूर दूर क्षितिज पर भी दिखाई नहीं देते थे.

इन्दिरा गांधीकी मृत्युके बाद जब राजिव गांधीजीका राज्याभिषेक हुआ तब कुछ समयके बाद पित्रोडाजी भारत आये. अलबत्त, वे “सी-डॉट” नामका एक छोटा १२८ से ५१२ लाईनकी क्षमतावाला टेलीफोन एक्सचेन्ज बना रहे थे. ऐसे टेलीफोन एक्सचेन्जका भी भारतके ग्राम्य विस्तारके लिये महत्त्व तो था ही. लेकिन १९८६में परिस्थिति ऐसी थी कि टेलीफोन कनेक्सनकी प्रतिक्षा यादी १० सालकी थी उसको आगामी छह सालमें खतम करना था. यदि नरसिंह राव नामका नोन-नहेरुवंशी प्रधानमंत्री नहीं आता तो पता नहीं नहेरुवीयन कोंग्रेस प्रगतिका अर्थ समज़ती या नहीं. अभी अभी यह प्रश्न तो विद्यमान ही है.

मूल विषय पर आवें तो पित्रोडाजीने गांधीजी को पढा नहीं है. गांधीजीने कहा था कि वे सरमुखत्यार बननेके पक्षमें नहीं है, लेकिन यदि उनको एक “मुद्रा-उछाल”समयके लिये सरमुखत्यार बनना भी पडे, तो वे उस समयमें शराब-बंदी कर दें. १९६०के दशकमें महाराष्ट्रमें नहेरुवीयन कोंग्रेसी मुख्य मंत्रीने शराब बंदीको नरम कर दिया. होटेल रेस्टोराँ वालोंको छूट देदी कि, वे विदेशीको शराब दे शकते है. रेस्टोरां वालेको ग्राहकको पूछनेका था कि आप विदेशी है? ग्राहक बोलेगा “हाँ”. “लो. ले जाओ शराब”. भला, ग्राहक कभी जूठ बोल सकता है?

यदि आपको शराब घरपे ले जाना है, तो डोक्टरका सर्टीफीकेट चाहिये. फिर आप शराब को घरपे ले जाके पी सकते है. महेफिल भी कर सकते हैं. पैसे फैंको सर्टीफीकेट लेलो … शराब लेलो … गांधीजीका कहेनेका था कि जब शराबकी बात आती है तो मैं उन गरीब कूटुंबोंको देखता हूँ जिनका पूरा घर तूट पडता है. खादी के बारेमें गांधीजीने कहा था कि जब मैं खादीकी बात करता हूँ तो मेरे सामने भारतकी गरीब जनता दिखाई देती है जिनको मैं क्या काम दे सकता हूँ.

“नियम बनाओ. लेकिन वे नियम सिर्फ सुशोभनकारी ही होना चाहिये. उन नियमोंके अमलकी बात मत करो.” ऐसी संस्कृति नहेरुवीयन कोंग्रेसके सत्ताकालमें पैदा हुई है, और उस समयसे ही सर्वव्यापक बनी. लेकिन हमारे पित्रोडाजी गरीब, गांधी, स्कॉच (व्हीस्की) का त्रीवेणी संगम करने की बात कर सकते है, यह नहेरुवीयन कोंग्रेसकी पहेचान है.

समाचार माध्यमवाले क्या तितलीयां उडाते हैं?

समाचार माध्यमोंके मालिकोंका तो यह धंधा है. उनसे तो शायद सियासती नेताओंने शिखा होगा. डीबीभाईके (दिव्य भास्कर भाईके) तंत्रीमंडलके सदस्य तो हमेशा यही चिंतामें रहते है कि हस्तस्थ घटनाको कैसे हृदयको अधिकसे अधिक चोट पहूँचावे ईस प्रकार संरचित करें.

डीबीभाईके एक कटारीया भाईने (कोलमीस्ट)ने लिखा की “गुजराती साहित्य परिषद”के प्रमुख पदके चूनावमें लाख प्रयत्न करने पर भी बीजेपी हार गया है. तीन नये युवानेताओंने बीजेपीकी विरुद्ध जो हवा बनायी है उसका प्रभाव हो सकता है.”

तो हमने उनको लिखाकी अब तो गुजरातके चूनावमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी जित सुनिश्चित है. गुजराती साहित्य परिषद साक्षरोंकी परिषद है. और गुजरातमें साक्षरता ८० प्रतिशत है.

वैसे तो यह कटारीयाभाई महात्मा गांधीके नाम या विचारमंचके निकटवर्ती माने जाते है लेकिन उन्होंने उपरोक्त तीन युवा नेताके बारेमें उनकी मांगकी यथार्थता और या योग्यताके बारेमें

कभी चर्चा करना अनिवार्य नहीं समज़ा. उपरोक्त ये युवानेता कौन है? ये युवा नेता, जातिवादको उकसाके पटेलोंके लिये और क्षत्रियोंके लिये आरक्षणका आंदोलन चला रहे हैं. समाचार माध्यम वाले ऐसे विभाजनवादी नेताओंके आंदोलनोंको फूंक मार मार के प्रज्वलित रक्खा करते है. और समाचार माध्यमके ये कटारीया भाईलोग भारतीय समाजके विभाजनवादी नेताओंको उत्साहित करते है. गुजरात साहित्य परिषदके प्रमुख पदके चूनावमें बीजेपीकी हारमें इन तीन नेताओंका योगदान रहा है. यदि गांधीजी जिन्दा होते तो वे एतद्‌ कथित अपने मानस पुत्रोंकी मानसिकतासे शायद आत्म हत्या कर लेते.

चूनाव आयुक्तको भी लेखक महाशयने एक “पंच” (गुजराती-काठीयावाडीमें हम पंचको गोदा मारना कहेते हैं) मार दिया है कि, ६५ सालमें प्रथम ऐसी घटना घटी है कि, चूनाव आयुक्तने सरकारकी नीली झंडीकी प्रतिक्षा की. वैसे तो ये महाशय जब नहेरु और इन्दिरा गांधीका शासन था तब उस शासनकालमें पेराम्बुलेटर नहीं चला रहे थे. तो उनको याद होना चाहिये कि उनके जमानेमें तो चूनाव आयुक्तका स्थान चपरासीके बराबर ही था. चूनावके नियमोंको दृढतासे लागुकरनेका काम और चूनाव आयुक्तको नियम बद्ध कठोरतासे कैसे काम करना चाहिये इसका प्रारंभ तो शेषनने ही किया है.

उपरोक्त तीन युवा नेताओंको बीजेपीवाले बरसाती मेंढक मानते है.

“बरसाती मेंढक” या तो कोई “घटना” है, या कोई नेता बरसाती मेंढक बनके सामने आ जाता है, या तो समाचार माध्यम बरसाती मेंढककी खोज में रहेता है.

जबसे इन्दिरा गांधीने चूनावकी शीड्युलको छीन्नभीन्न कर दिया तबसे कोईन कोई राज्यमें बरसात होती ही है. और चूँकि, देश प्रजातंत्र है, पूरे देशमें बरसाती ऋतु है ऐसा लगता है.

विकासनो वरख

प्रगतिकी पन्नी (गुजरातीमें इन्होंनें “तितली शब्द प्रयोग” के लिये “विकासनो वरख” कहा है) यह तितली भी उडती है.

“विकास पागल हुआ है” इस तितलीमें अब दम नहीं रहा. क्यों कि बीजेपीने उत्तर दिया कि पागलका विकास तो देशने उनके कौभाण्डोसे देख ही लिया है. जैसे कि कोमनवेल्थ गेम स्केम, २-जी स्केम, कोलगेट स्केम, नहेरुवीयनोंके अनेकानेक स्केम जिसमें नहेरुवीयन्स स्वयं जमानत पर है.

याद करो महात्मा गांधी कई बार जेल गये लेकिन कभी उन्होने जमानत नहीं ली. ये नहेरुवीयन लोग, गांधीजीको अपनी धरोहर मानते है और जमानत पर भी जाते है.

वैसे तो डीबीभाईके सभी कटारीया लेखकगण ऐसे नहीं है. लेकिन ज्यादातर ऐसे ही है. क्यों कि यदि युद्धमें अन्य पक्ष बराबरीके स्थान पर न हो तो वह युध्धमें मज़ा कहाँ.

( शिरीष मोहनलाल दवे )

टेग्ज़ः
चमत्कृतिः
राहुल को पूछे गये प्रश्नोंका राहुल जवाब नहीं देता है. उसका चमच भनीस तीहारी या द्ग्गीदीन या सींघवी देता है.
(१) टमाटर फल है या सब्जी ?
(2) गुलाबजामुन में गुलाब के महत्व का वर्णन कीजिये |
(3) अनु मलिक और हिमेश रेशमिया, दोनों में से कौन बेहतरीन गायक हैं ?
(4) जस्टिन बाईबर क्या हैं –मर्द, औरत या गे ?
(5) दिग्विजय सिंह एक इंसानहैं , उदाहरण सहित साबित करे |
(6) पहले मुर्गी आई या अंडा ?
(7) काटजू साहब के हिसाब से 90% लोग मुर्खहैं , तो बाकी 10% कौन हैं – बुद्धिमान या महामूर्ख?
(8) Tsunami और psychology में “T” और “P” साइलेंट क्या होता हैं और जब इन्हें बोलनाही नहीं तो फिर लिखते क्यों हैं ?
(9) राहुल राय और राहुल महाजन , दोनों में से कौन ज्यादा टैलेंटेडहैं और क्यों ?
(10) राहुल गाँधी खुद की पांच विशेषता बतलाते हुए खुद को युवा साबित करे |

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