क्या रक्खा है-गोपाल चोपरा

क्या रक्खा है इस दुनिया में,

इस सहर–ओ–शाम की जद्दोजहत में,

यह डिग्रियां,

यह नौकरियां,

सैलरी चेक्स,

गाडियां,

सेल्फिया,

यह सारी ब्रांड्स,

क्या रक्खा है इनमें?

क्या है इस नाम–ओ–नक्श में?

क्या है सुखन–ओ–लफ्ज़ में?

क्या रक्खा है इन्सान होने में?

कुछ भी तो नहीं है।

दीवारों पर निकल आती आल्गी,

और सूखे पत्तों के शेष बचे अवशेष पर खिल आती मशरूम को कहां मालूम है यह,

की उनके खिलने के मौसमों को नाम दिए गए है,

उनके अस्तित्व को नाम दिए गए है,

वे अनजान है इन सारे पचड़ों से,

इन सारे इल्म से,

उन्हें कुछ नहीं मालूम,

उन्हें आता ही क्या है?

खिलना और सुख जाना।

वैसे इस इन्सानी दुनिया में भी तो यही सब होता है,

थोड़े अपडेटेड वर्जन के साथ,

मगर,

इन्सान होने का मेरा सबसे पसंदीदा गुण है,

गले मिलना,

मैं चाहूंगा,

और हमेशा से चाहता हूँ,

की कोई मुझे अपनी बाहों में इतने प्यार से पकड़े की मैं भूल जाऊं इल्म क्या होता है।

 

( गोपाल चोपरा )

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