स्त्री-कुसुम शर्मा “अंतरा”

न मैं जानकी,न बैदेही और न ही अब सीता हूँ
आज मैं केवल एक स्त्री हूँ और अग्निपरीक्षा के अपमान का दंश सहने के लिए कदापि तैयार नहीं हूँ।
तुम जाओ और मर्यादा की बेड़ियों के पाश का मान बढ़ाओ…..
पर नहीं दूंगी मैं अब अग्निपरीक्षा,
मर्यादा के तराजू के एक पलड़े में समस्त अयोध्या संग बैठ जाओ तुम
और दूसरे पलड़े में केवल मैं बैठूंगी,
तुम सूर्य के समकक्ष पाओगे खुद को,
राजवंशी जो ठहरे……
और मेरा पलड़ा चूमेगा धरती को…..
धरती की पुत्री जो ठहरी……..
क्योंकि आज
न मैं जानकी, न वैदेही और न ही सीता हूँ,
केवल और केवल एक स्त्री हूँ…..
( कुसुम शर्मा “अंतरा” )

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