माँ-विनोद विठ्ठल

(1)
माँ एक पासवर्ड थी
खोल देती थी सभी को
माँ के बाद ये दुनिया
पासवर्ड खो चुका कम्प्यूटर हो चली है
(2)
माँ की हर चाबी पर होती थी
एक रंगीन फ़ीते की लीर
जिनसे माँ पहचानती थी उनके ताले
चीज़ों को उनके रंग से पहचानना
हम नहीं सीख पाए माँ से
(3)
माँ बड़े घर और अलमारी पर भी
लगाती थी छोटे ताले
कितना भरोसा था माँ के पास
(4)
कंदोरे के बावजूद
खो जाती थी माँ की चाबियाँ
कई बार वे खोल देती थी ताले
स्मृतियों और दुलार से भी
माँ नहीं है, घर है
लेकिन अब कोई चाबी नहीं खोती
सब बंद हो गए हैं
चाबी खोए तालों की तरह
(5)
माँ और गुम होता काजल
भले ही शुरू करते हैं स्मृति की वर्णमाला उससे
बाद के दिनों में किसी पर्फ़्यूम की तरह वह धीरे-धीरे उड़ती है
लेकिन दर्द के क्षणों में वह अचानक आ जाती है
जैसे लंच में अचार की गंध से खाने की इच्छा
कहीं भी हो उसकी आँखें हमें देख रही होती है
उसकी प्रार्थना और प्रतीक्षा में वैसे ही शामिल रहते हैं हम
जैसे उसके सपनों और डरों में
माँ बड़ियाँ बनाती है
बाजरे की खीर
और कुछ ऐसी सब्ज़ियाँ जिन्हें खाते हुए हम पूछते हैं उनके नाम
कुछ रिश्तेदारों के बारे में भी केवल वही जानती है
वैसे ही जैसे कुछ फूलों, फलों और फ़सलों के बारे में
बीमारियों, कीटों, जानवरों और उपचारों के बारे में
उसे सपनों के कूट अर्थ पता हैं
शगुन वह जानती है
बक़ौल उसी के :
कि जिस रात सपने में दिखेगी सूखी नाडी
अगली सुबह वह नहीं होगी
और हमारे स्वाद और ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा
उस काजल की तरह गुम होगा
जो वह मेरी बिटिया के रोज़ सुबह आँजती है
( विनोद विठ्ठल )

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