लॉक डॉउन में-उमा त्रिलोक

अब रोज सुबह पांच बजे
नहीं होती भागम भाग
बच्चे मीठी नीद सोते है
उन्हें जगा कर अप्राधिन्न नहीं बनती

खिड़की से देख लेती हूं
रात को धीरे धीरे भोर बनते
और सूरज को विलंबित गति से उगते
चिड़ियों के संग संग गुनगुना भी लेती हूं

वैसे तो रोज़
ऐसा वैसा ही जल्दी में पका कर
ठूंस देती थी
उनके टिफिन बक्सों में
लेकिन अब
सोच समझ कर
पकवान बनाती हूं
उनकी पसंद के
जगाती हूं फिर प्यार से
और रिझा रिझा कर खिलाती हूं
हंस बोल भी लेती हूं
उनके संग
उनकी चुटकेबाजियों पर

अब नहीं पूछती उस से
पहले की तरह

” कैसे हो, दिन कैसे गया”
और रख दिया करती थी
उसके आगे , गरम चाय का प्याला
और बिना उसका जवाब सुने ही
भागते दौड़ते जुट जाती थी
रात का खाना बनाने में
बच्चों का होमवर्क करवाने में

लेकिन अब

दिन में कई कई बार
लेकर हाथों में उसका हाथ
पूछती हूं

“कैसे हो….
कहती हूं
” चिंता मत करना
सब ठीक हो जाएगा
कुदरत जानती है
कैसे रखना है उसने हमारा ख्याल”

जगाती हूं
संभालती हूं , संजोती हूं
एक विश्वास
कि सब ठीक हो जाएगा

इस लॉक डॉउन के बाद
मालूम नहीं भविष्य का क्या होगा
लेकिन लगता है
कुछ भी पहला सा नहीं रहेगा
सब तौर तरीके बदल जाएंगे
नए केद्र बिंदु उभरेंगे
जैसे हवा, नदियां, आसमान
बदले बदले से दिखाई देते हैं
वैसे ही
जीवन, नए जीवन की सुध लेगा

अब सब काम लौंग डिस्टेंस
ओनलाइन ही होगा
अगर रहेंगे
तो,
वो नहीं रहेंगे
जो चूहों की दौड़ में भाग रहे थे
यह जाने बिना
कि कहां जा रहें हैं

( उमा त्रिलोक )

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