आहुति-उमा त्रिलोक

नहीं किसी ने खुशी में थाली पीटी
गली में नहीं बांटा गुड़
जब दाई ने कहा
” लक्ष्मी अाई है”

किसी ने नहीं दुलारा पुचकारा
मै होती रही बड़ी,
यूं ही,
रोती बिलखती किलकारती

शब्द सुना जो पहली बार
दादी ने कहा, ” कर्म जली ”
नहीं समझा जिसे,
लेकिन
थाली छीन ली जब यह कहकर,
” मत खा इतना, जल्दी बड़ी हो जाएगी ”
तो, मैं रो दी

मेंने सुना
बस चीखना मां का
” उठ, झाड़ू बुहारी सीख
चूल्हा चौका संभाल, तुझे जाना है अगले घर ”

छह साल की थी,
जब
मुन्ने को पकड़ा देती,
कहती,
” बर्तन मल कर रखना, कपड़े
सूखा देना
आती हूं मैं काम से घंटे भर में ”

न देखा बचपन मेंने
न देखी जवानी,
लेकिन
फिर भी
बड़ी हो गई

एक दिन खेत में पकड़ ली बांह
पिछवाड़े के कल्लू ने
खूब हुअा हंगामा
बहुत मचा शोर
गाव में
मारा पीटा दुत्कारा
फिर मैं
ब्याह दी
जल्दी में

सजा मिली
मुझे उस गुनाह की
जो मेंने किया ही नहीं

अब
हर बार सास बोल देती
मेरे उसको

” पेट में लड़की हुई तो गिरा देना
हमें तो बस पोता चाहिए ”

हुआ कई बार ऐसे ही

फिर तू अा गई
डाक्टरनी की भूल से

सुन
अगर तेरे जीवन में कुछ ऐसा हो
जो तुम्हे ना भाए
तो
तुम करना विरोध
दहाड़ना, दिखाना प्रतिरोध
जूझना
मत मानना

तुम बदल देना
रुख समय की धार का
सुने ना कोई
गर तेरी बात
तुम चीखना ज़ोर से
जो टकराए जाकर क्षितिज से
चीर दे जो सीना गगन का
तुम
लड़ना,झगड़ना
और
घसीट लाना समय को
परिवर्तन की ओर
चाहे खो जाए
तेरा सर्वस्व ही
क्यों कि
परिवर्तन मांगता है
आहुति

हां
आहुति

( उमा त्रिलोक )

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