सूनी सी ज़िन्दगी रही

बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
झोंका जो नींद का कभी, आता तो ख़ाब देखते
दिल के मलाल का भी हम, तुझसे सवाल पूछते
बैठे-बिठाए बेबसी का, झोंका जगा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
जाने कहाँ तू खो गया, इतने बड़े जहान में
हमको शिक़स्त दे गया,दिल के ही इम्तहान में
बैठे-बिठाए आँसुओं का तमग़ा दिला गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
यूँ कमनसीब हम न थे, यूँ बदनसीब हम न थे
इतनी तादात में कभी, हासिल तो रंज-ओ-ग़म न थे
बैठे-बिठाए बेरुख़ी का, आलम सजा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
ऐसा न हो कि हम यूँ ही, दिल से ही हार मान लें
परवरदिगार से कभी अपनी ही मौत माँग लें
बैठे -बिठाए फ़ासलों को यूँ ही बढ़ा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
 ( निर्मला त्रिवेदी )
दरिया- सागर, समुद्र, बड़ी नदी
मलाल- दुःख, अफ़सोस
शिक़स्त- मात, हराना
गमज़दी  – उदासी
तमग़ा- मैडल,
बेरुख़ी- चिढ, नाराज़गी, ख़ीज दिखाना
परवरदीगार – अल्ला, ईश्वर
फ़ासलों को- दूरियों को

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