वह क्षण-उमा त्रिलोक

होते हुए भी नहीं होता
रहते हुए भी नहीं रहता
वह क्षण
फिर
अनायास ही दिखता है
नदी के कल कल में
पत्ती के उगने में
कली के खिलने में
ठहर जाता है कभी कभी
ओस की नन्ही बूंद में
उस क्षण भंगुर को मेंने
कभी देखा चांद किरन में
कभी रात के आंचल में
दिनकर से रूठा हो जैसे, फिर
छिप जाता वह चिलमन में
तत्व विलीन
वह क्षण
प्रश्न बना रह जाता
ढूड लिया जब अंदर बाहर
फिर मैने
अपने भीतर झांका
हां, अपने भीतर झांका
वहीं मिला, वह नटखट मुझ को
धीमे से मुस्काता
धीमे से मुस्काता

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( उमा त्रिलोक )

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