बिसरी बातें-उमा त्रिलोक

इस घर की
दीवारों में अब दरारें हैं
खिड़कियों दरवाजों की रंगो रौनक उखड़ी सी है
वक्त की गुसैली नज़र पड़ी है इन पर
जो लगाई थी तस्वीरें
कील हिलने से अब गिरी गिरी  सी लगती हैं
तल्ख हवाओं ने अपने निशान छोड़े हैं
फर्श भी उखड़ा है,
क्या करोगे
पूछ के कि कैसे टूटा
मगर
मैं खुश हूं
कि अब भी सूरज की किरणे
बेखोफ़ बिछती है मेरे आंगन में,और
फूलों की महक भी आती जाती हैं
मगर
गर्दिशे बारिश में
छत का कुछ हिस्सा दब गया है
और पिछवाड़े में पानी भरा है
फिर भी
जब तुम आओगे
तो
अधखुली किताबों
से सुनना कहानी, और
चंद ग़ज़लें सुनना
साज़ो की ज़ुबानी
माना कि
सब साज़ो सामान बिखरा पड़ा है
फिर भी
बैठ सकते हैं हम
बगीचे के किसी कोने में
और
बिना बोले ही कर सकते हैं कुछ
बिसरी बातें
.
( उमा त्रिलोक )

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