खोल दो खिड़की-उमा त्रिलोक

खोल दो खिड़की
जानती हूं
हवा के साथ साथ
आयेगी विकलता, और बेकसी
किसी मजलूम की
धुआं बन कर
आज
चाहती हूं
फूंक देना उसी धुएं में
एक चिनगारी
जो आग बन कर भभके
जला दे, खाक कर दे
सारे जुल्मों सितम
फिर
उसी खाक से उभरे
एक परिंदा
जो फैलाए पंख
नए दौर में
भरे ऊंची उड़ान
आसमान से छीन लाए
अपने हकूक
होने न दे हावी किसी को
हकपरसती पर
सुना दे फरमान ऐसा, कि
लहराये
परचम इन्कलाब का
खोल दो खिड़की

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( उमा त्रिलोक )

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