आहट-उमा त्रिलोक

झील का किनारा
अल्साई लहरें
स्तब्ध खड़ा चांद
सोई हवा मौन
स्थिर पत्ते निश्चल
निर्जन वन
विदा हो चुकीं ख्वाहिशें
दफना दिए गए हादसे
कुछ भी न हो ; और
जो हो
वह भी न हो
रहे तो बस
एक टुकड़ा सन्नाटा
हो जिस में
एक आहट
किसी के पदचाप की
.
( उमा त्रिलोक )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.