वर्षा ऋतु को समर्पित-उमा त्रिलोक

वर्षा ऋतु को समर्पित
संदली शाम
सूरज की लाली जब
सांवरी ज़रा भयी
घुमड़ घुमड़ बादल ने
टप टप बूंद बरसाई
छप छप छप छप पानी बरसा
धरती तब बौराई
आंख मूंद ली पत्तों ने, तब
टहनी, पूछ मुझे सकुचाई
आसमान की छत के नीचे
”  बैठी तू क्यों अकेली “
मैंने कहा,
” नहीं
मैं हूं कहां अकेली ?
देख नहीं पाई,
संग संग हैं हम दोनों
बाज रही  स्वर लहरी
बूंदों ने  थाप लगाई
नाच रहे हैं हम दोनों
हम ने  है रास रचाई
वह है मुझ में
मैं हूं उस में
रम गए इक दूजे में
सच मानो, प्रकृति ने
यह संदली शाम
हमरे लिए सजाई
हमरे लिए सजाई “
.
( उमा त्रिलोक )

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.