प्रिय अमृता …-अंजलि काले

प्रिय अमृता …
तुम ,
जो अपने पीछे
इस दुनिया के लिए
छोड़ गयी हो ,
अपनी सुंगंधित कविताएँ
और पुरोगामी विचारधारा की
कितनी ही
उबलती  ..दहकती स्मृतियाँ ..
मैंने कोशिशन
सहेज रखी है
मेरी रचनाओं में
तुम्हारे स्मृतियों की
शब्द शब्द राख ..
तुम्हारे बाद की दुनिया से
तुम्हारी दी हुई कविता
और तमाम बग़ावत
ख़त्म होने से पहले
अपना वादा
” मैं तुझे फिर मिलूंगी “
निभाने के लिए आ जाओ
के मुझे यक़ीन है
तुम ककनूसी नस्ल की
वह रूहानी पैदाईश हो
जो मेरी कविताओं से
फिर से ज़िंदा हो सकती हो
आओ के मिल कर लिखें
इस पर बेलौस इश्क़ की इबारतें
________के  मैंने तुम्हारे बाद भी ढलने नही दिया है इक उफ़नता सूरज  ….!!
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( अंजलि काले )

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