तेरा शहर-उमा त्रिलोक

बहुत भीड़ है
तेरे शहर में
खूब सजे हैं बाज़ार
ठाठ बाठ है बहुत
भरी ऊंची दुकानों में
हो रही है जम कर
खरीददारी
सजी महिलाएं
रौबीले मर्द
हंसते खेलते बच्चे
मस्ती में हैं मस्त
कोई पैदल तो कोई
है स्कूटर पर सवार
लंबी लाइनों में रेंगती हैं
रंग बिरंगी कारें
यूं लगता है
समृद्धि ने अपने
सुनहरी पंख फैलाए हैं
मगर
कोने में एक बूढ़ी औरत
खड़ी है लिए कुछ
बेचने को गुब्बारे
रेड लाइट पर रुकती हैं जब कारें
भूख के हवाले से
बच्चे
पोछतें है शीशे कारों के
मांगते हैं पैसे
फुटपाथ पर बैठा है
बूट पालिश की पेटी लिए ; कोई
रोज़ी रोटी की आस में
ऐसा क्यों है कि
कोई है इतना समृद्ध ; तो कोई
इतना लाचार
प्रश्न चिन्ह
चस्पा है
निजाम के द्वार पर

.

( उमा त्रिलोक )

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