बेटी-सूफी सुरेंद्र चतुर्वेदी

 

नसीबों को शाख़ों पे खिलती हैं बेटी,
मुक़द्दर भला हो तो मिलती हैं बेटी.
.
कभी बनके मैना, कभी बनके कोयल,
घरों आंगनों में उछलती हैं बेटी.
.
जमा करती सर्दी में, बारिश में बहतीं,
अगर गर्मियां हो पिघलती हैं बेटी.
.
जलें ना जलें, हैं चरागाँ तो बेटे,
मगर हो अँधेरा तो जलती हैं बेटी.
.
नहीं आग पीहर में लगती किसी के,
पति के ही घर में क्यूँ जलती हैं बेटी.
.
ज़मीं छोड़ देती, जड़ें साथ लातीं,
पुरानी ज़मीं जब बदलती हैं बेटी.
.
जो रोया पिता उसको समझाया माँ ने,
कहाँ उम्र भर साथ चलती हैं बेटी.
.
( सूफी सुरेंद्र चतुर्वेदी )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.