स्त्रियाँ खेलती हैं होली

 

स्त्रियाँ खेलती हैं होली
नज़रें झुकाएं
पल्लू में आँचल सहेजती
भयाकुल हिरनी-सी होली के दिन
वे हो जाती हैं रंगों में विलीन
जैसे रंग होते हैं पुष्पों में
वे बन जाती हैं सुगन्ध
और बहने लगती हैं बयार के साथ
वे जानती हैं अपना दायरा
और पुरुषों का मिजाज़
साल में एक बार ही सही
स्त्रियाँ देती हैं परीक्षाएं सीता की तरह होली खेलते हुए।

स्त्रियाँ खेलती हैं होली
जैसे ब्रह्मांड में घूमती है धरती
साल दर साल सूरज की परिक्रमा करती हुई
करते हुए सृष्टि का भरण

टूटते हैं तारे
पास से निकल जाते हैं कितने ही उल्का पिंड
झाँक लेता है सूरज पैनी निगाह से
बर्फ जमें तुम्हारे उत्तुंग ध्रुवों पर
घूमती रहती है धरती

थोड़ा तिरछा होने पर भी
धरती जानती है अपना अनुशासन
और सूरज का उत्ताप
उसके आँचल में भी उबलता है लावा
आते हैं भूचाल
उछाल भरता है
हृदय का जल आकाश की ओर

पल्लू में बाँध कर सारा झंझावात
धरती खेल रही है होली
सूर्य, चन्द्र और सभी नक्षत्रों के बीच
किसी स्त्री की तरह

जैसे स्त्रियाँ खेलती हैं होली
होली के दिन भी !!

(  राजेश्वर वशिष्ठ )

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