Tag Archive | हिन्दी कविता

प्रेम को-नरेश गुर्जर

१)
प्रेम को
उसी तरह आना चाहिए
जैसे नींद आती है
नवजात बच्चे को।
२)
प्रेम को
उतनी ही देर ठहरना चाहिए
जितनी देर ठहरती है
तितली फूल पर।
३)
प्रेम को
उसी तरह लौटना चाहिए
जैसे लौटती है आवाज
कहीं से टकरा कर।
( नरेश गुर्जर ‘नील’ )

ग्रीष्म की तपती धरा-डॉ. सुमन शर्मा

ग्रीष्म की तपती धरा पर,
गगन जब अगन बरसाये,
गरम हवाओं के झोंकों से,
सारा आलम झुलसा जाये,
तब…
चटक लाल खिलें गुलमोहर,
देखें गगन ओर,मुसकायें।
संग धरा वह करें तपस्या,
अवनी को ढाढ़स बँधवायें।
खिलें अमलतास पूरी बहार से,
खिलकर वंदनवार सजायें।
सूरजमुखी अपने रंगों से
देखें,हँसे और हरषायें।
तब..
देख तपस्या अवनी की
अश्रु भर आयेंगे गगन नयन,
अमीरस बरसेगा, तृप्त धरा,
मिट्टी की सौंधी महक से
खिल उठेंगे मन आँगन,
हे मानव, तुम हर पीड़ा में
अन्तर्मन से ज़िंदा रहना,
दिन बदलेंगे,हल निकलेंगे,
धरा,गगन,प्रकृति सिखाये।


( डॉ. सुमन शर्मा )

गर तुम्हारा नाम होता-गुलज़ार

“गुलमोहर” ‘गर तुम्हारा नाम होता
“गुलमोहर” ‘गर तुम्हारा नाम होता
मौसम-ए-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता
“गुलमोहर” ‘गर तुम्हारा नाम होता

आएँगी बहारें तो अब के उन्हें कहना ज़रा इतना सुने
आएँगी बहारें तो अब के उन्हें कहना ज़रा इतना सुने
हो, “मेरे गुल बिना कहाँ उनका ‘बहार’ नाम होता”

“गुलमोहर” ‘गर तुम्हारा नाम होता
मौसम-ए-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता
“गुलमोहर” ‘गर तुम्हारा नाम होता

शाम के गुलाबी से आँचल में एक दीया जला है चाँद का
शाम के…

( गुलज़ार )

माँ कबीर की साखी जैसी-जगदीश व्योम

माँ कबीर की साखी जैसी
तुलसी की चौपाई-सी
माँ मीरा की पदावली-सी
माँ है ललित रुबाई-सी।
.
माँ वेदों की मूल चेतना
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सूक्त-सी
लोकोक्तर कल्याणी-सी।
.
माँ द्वारे की तुलसी जैसी
माँ बरगद की छाया-सी
माँ कविता की सहज वेदना
महाकाव्य की काया-सी।
.
माँ अषाढ़ की पहली वर्षा
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी।
.
माँ यमुना की स्याम लहर-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी।
.
माँ ममता का मानसरोवर
हिमगिरि-सा विश्वास है
माँ श्रद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है।
.
माँ धरती की हरी दूब-सी
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है।
.
माँ धरती के धैर्य सरीखी
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।
.
( जगदीश व्योम )

माँ-विनोद विठ्ठल

[1]
माँ की अलमारी और वित्तमंत्री जी
माँ की अलमारी में
कुछ सुपारियाँ थी जो उन्हें मिलती थी
पीहर से विदाई के समय शुभाषीश के रूप में
कुछ मौली के गट्टे थे जो न जाने किन माँगलिक प्रसंगों के लिए लाए गए थे और बचे रह गए थे
आग़ामी माँगलिक प्रसंगों के लिए
कुछ पुराने सिक्के थे
जिन्हें संभाले वह बेख़बर थी उनके प्रचलन से बाहर हो जाने के तथ्य से
जैसे प्रचलन से बाहर हो जाती हैं
कुछ नैतिकताएँ, आस्थाएँ और भरोसे
कुछ नोट भी थे
जिन पर लगी होती थे कुमकुम की टीकी
कुछ रसीदें थी जो अस्ल में मियादी जमा रसीदें थी
कुछ इंदिरा विकास पत्र थे
कुछ किसान विकास पत्र और कुछ नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट
जिन्हें देखते मैं उदास हो जाता हूँ
क्योंकि इंदिरा बची नहीं है
किसानों ने आत्महत्याएँ शुरू कर दी हैं
और नेशन को कोई सेव नहीं कर रहा है
एफडीआर या मियादी रसीदें भी
अब कम घरों में दिखती हैं
तीन, पाँच या दस साल की गिनती
प्रधानमंत्री के भाषणों के सिवा अब किसी में नहीं होती
शादियाँ तक इतनी नहीं चलती
तीन महीने पहले अपने मेहदी भरे हाथों की तस्वीर फ़ेसबुक पर डालने वाली लड़की
रातोंरात अपना स्टेटस बदल कर सिंगल कर देती है
रिश्ते अचानक अनफ़्रेंड हो जाते हैं
ख़ूबियों से ज़्यादा ख़ामियाँ शेयर होती हैं
पुराने दिनों से लोग तेज़ी से लोगआउट कर जाते हैं
फेक आईडी के इस ज़माने में माँ की पुरानी मियादी रसीदें
बच्चे, बचत, भरोसा और वक़्त पर काम आने लायक धन के बहाने
जो रिश्ते की अनंत उपस्थिति का दर्शन थी
अब कितनी बचकानी हो गई हैं
कि माँ की मियादी रसीदों के मज़बूत प्लास्टिक के कवर को
नेट बैंकिंग करने वाली मेरी बेटी हैरत से देखती है
गोया ये भी कभी थे
गोया माँ भी कभी थी
कितना भयावह है यह
कि माँ और उसके साथ के अपने दिन
हम किसी चश्मदीद की तरह बच्चों को बताते हैं
और हमें संदेह के साथ सुना जाता है
वित्तमंत्री जी, भाड़ में जाए जीडीपी और डालर के मुक़ाबले हमारी हैसियत
बस बच्चों के सिलेबस में इतना डलवा दीजिए
कि कभी इंदिरा विकास पत्र, किसान विकास पत्र, नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट भी हुआ करते थे
और मियादी जमा की रसीदें
प्लास्टिक के जोड़े में होती थी!
(2)
माँ के बिना पिता की एक शाम
किसी एक रंग की कमी
या बिना झूलों के मेले की-सी स्थिति है यहाँ माँ
इस समय, जबकि दूज के इस एक ही चाँद को देखते
तुम हज़ारों मील दूर हो
गोया तुम माँ नहीं, चाँद हो घर की परात में हिलती, दिखती, हुड़काती
पिता अगर कविता लिखते तो ऐसी ही कुछ:
तुम्हारे बिना आधी है
रोटी की हंसी
नमक की मुस्कान
दरवाजों की प्रतीक्षा
सब-कुछ आधा है
मसलन चाँद, रात, सपने
सिरहाने का तकिया
पीठ की खाज
दाढ़ का दर्द
आज की कमाई
मुझे नहीं पता
तुम्हारे होने से
ज़िन्दगी की रस्सी पर नट की तरह नाचते पिता
तुम्हारा नहीं होना किसे कहते हैं
रात से, परींडे से, या तुम्हारी तम्बाकू की ख़ाली डिब्बी से
तुम्हारा वह नाम लेते हुए
जो मैंने कभी नहीं सुना
तुम्हें उस रूप में याद करते हुए
जब तुम पल्लू से वहीदा रहमान और हंसी से मधुबाला लगती थीं
और पिता, दादी से छिपा कर चमेली का गज़रा
आधी रात तुम्हारे बालों में रोपते थे
और थोड़े समय के लिए चाँद गुम हो जाता था
माँ; चौतरी जिस पर तुम बैठती हो
उदास है
घर के बुलावे पर भगवान् भी चले आते हैं
चली आओ तुम
नहीं तो पिता की डायरी में एक मौसम कम हो जाएगा
( विनोद विट्ठल )

माँ-विनोद विठ्ठल

(1)
माँ एक पासवर्ड थी
खोल देती थी सभी को
माँ के बाद ये दुनिया
पासवर्ड खो चुका कम्प्यूटर हो चली है
(2)
माँ की हर चाबी पर होती थी
एक रंगीन फ़ीते की लीर
जिनसे माँ पहचानती थी उनके ताले
चीज़ों को उनके रंग से पहचानना
हम नहीं सीख पाए माँ से
(3)
माँ बड़े घर और अलमारी पर भी
लगाती थी छोटे ताले
कितना भरोसा था माँ के पास
(4)
कंदोरे के बावजूद
खो जाती थी माँ की चाबियाँ
कई बार वे खोल देती थी ताले
स्मृतियों और दुलार से भी
माँ नहीं है, घर है
लेकिन अब कोई चाबी नहीं खोती
सब बंद हो गए हैं
चाबी खोए तालों की तरह
(5)
माँ और गुम होता काजल
भले ही शुरू करते हैं स्मृति की वर्णमाला उससे
बाद के दिनों में किसी पर्फ़्यूम की तरह वह धीरे-धीरे उड़ती है
लेकिन दर्द के क्षणों में वह अचानक आ जाती है
जैसे लंच में अचार की गंध से खाने की इच्छा
कहीं भी हो उसकी आँखें हमें देख रही होती है
उसकी प्रार्थना और प्रतीक्षा में वैसे ही शामिल रहते हैं हम
जैसे उसके सपनों और डरों में
माँ बड़ियाँ बनाती है
बाजरे की खीर
और कुछ ऐसी सब्ज़ियाँ जिन्हें खाते हुए हम पूछते हैं उनके नाम
कुछ रिश्तेदारों के बारे में भी केवल वही जानती है
वैसे ही जैसे कुछ फूलों, फलों और फ़सलों के बारे में
बीमारियों, कीटों, जानवरों और उपचारों के बारे में
उसे सपनों के कूट अर्थ पता हैं
शगुन वह जानती है
बक़ौल उसी के :
कि जिस रात सपने में दिखेगी सूखी नाडी
अगली सुबह वह नहीं होगी
और हमारे स्वाद और ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा
उस काजल की तरह गुम होगा
जो वह मेरी बिटिया के रोज़ सुबह आँजती है
( विनोद विठ्ठल )

माँ-अज्ञात

लेती नहीं दवाई “माँ”,
जोड़े पाई-पाई “माँ”।
.
दुःख थे पर्वत, राई “माँ”,
हारी नहीं लड़ाई “माँ”।
.
इस दुनियां में सब मैले हैं,
किस दुनियां से आई “माँ”।
.
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे,
गरमागर्म रजाई “माँ” ।
.
जब भी कोई रिश्ता उधड़े,
करती है तुरपाई “माँ” ।
.
बाबू जी तनख़ा लाये बस,
लेकिन बरक़त लाई “माँ”।
.
बाबूजी थे सख्त मगर ,
माखन और मलाई “माँ”।
.
बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई “माँ”।
.
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे,
मां जी, मैया, माई, “माँ” ।
.
सभी साड़ियाँ छीज गई थीं,
मगर नहीं कह पाई  “माँ” ।
.
घर में चूल्हे मत बाँटो रे,
देती रही दुहाई “माँ”।
.
बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ-साथ मुरझाई “माँ” ।
.
रोती है लेकिन छुप-छुप कर,
बड़े सब्र की जाई “माँ”।
.
लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई “माँ” ।
.
बेटी रहे ससुराल में खुश,
सब ज़ेवर दे आई “माँ”।
.
“माँ” से घर, घर लगता है,
घर में घुली, समाई “माँ” ।
.
बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई “माँ” ।
.
दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई “माँ”।
.
घर के शगुन सभी “माँ” से,
है घर की शहनाई “माँ”।
.
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई “माँ” ।
.
( अज्ञात )

प्रेम-नरेश गुर्जर ‘नील’

१)
प्रेम
जैसे कोरे घड़े में भरे हुए
ठंडे पानी की महक।
२)
प्रेम
जैसे रेत के टिब्बों पर
हवा से बनी हुई लकीरें।
३)
प्रेम
जैसे नींद आने के ठीक पहले
अधखुली सी आंखें।
४)
प्रेम
जैसे गिलहरी के सूखी रोटी कुतरने से
उपजा संगीत।
५)
प्रेम
जैसे लिखने की प्यास को
परिभाषित करती कोई शब्दावली।
६)
प्रेम
जैसे जितना जान लिया हो
उससे और अधिक जानने का प्रयास।
( नरेश गुर्जर ‘नील’ )

कुछ कविताएँ

१)
एक दिन हम सब
अपनी-अपनी चुप्पियों को
लेकर मर जाएंगे!
और हमारा सबसे आख़िरी
ख़याल होगा
हमें बोलना चाहिए था
( हिमांशु मोहन )
.
२)
मैंने प्रेम
की कई व्याख्यायें पढ़ीं
और जाना सिर्फ़ इतना
कि मैं तुम्हें
बिना बताये भी
तुमसे प्रेम कर सकता हूँ
( हिमांशु मोहन )
.
३)
किसी का ना होना
उसका चले जाना नहीं
और किसी का होना
उसका रह जाना नहीं
जाने और रह जाने के बीच के फ़ासले में
कितनी यात्राएँ लिखी थी
तय भी यही था
हुआ भी यही
(अंजना टंडन )
.
४)
जग कहता है
समय निष्ठुर है
तुम कहते हो
निर्मोही भी
सहमत हूँ मैं
जानती भी हूँ
किंतु जग से ज़रा अधिक
मैं जानती हूँ ये भी
कि ये लाड़ और लोरीयां से वंचित रहा शिशु था
ईश्वर ने भी तो
समय के लिए
कोई पालना नहीं गढ़ा
( सोनपिया )
.
५)
संभालना था
सम्पूर्ण सृष्टि को
एक धागे में
ईश्वर ने गढ़ी स्त्री
और
यात्रा पर निकल गया!
( रुपाली टंडन )

स्त्री-कुसुम शर्मा “अंतरा”

न मैं जानकी,न बैदेही और न ही अब सीता हूँ
आज मैं केवल एक स्त्री हूँ और अग्निपरीक्षा के अपमान का दंश सहने के लिए कदापि तैयार नहीं हूँ।
तुम जाओ और मर्यादा की बेड़ियों के पाश का मान बढ़ाओ…..
पर नहीं दूंगी मैं अब अग्निपरीक्षा,
मर्यादा के तराजू के एक पलड़े में समस्त अयोध्या संग बैठ जाओ तुम
और दूसरे पलड़े में केवल मैं बैठूंगी,
तुम सूर्य के समकक्ष पाओगे खुद को,
राजवंशी जो ठहरे……
और मेरा पलड़ा चूमेगा धरती को…..
धरती की पुत्री जो ठहरी……..
क्योंकि आज
न मैं जानकी, न वैदेही और न ही सीता हूँ,
केवल और केवल एक स्त्री हूँ…..
( कुसुम शर्मा “अंतरा” )