Tag Archive | हिन्दी कविता

बोलते नयन-नक्श वाली-ईमरोज

कल रात सपने में
एक औरत देखी
जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था
पर मिलते ही लगा
कि ईस बोलते नयन-नक्श वाली औरत को
कहीं देखा भी हुआ है
हो न हो यह वही है
जो मेरी कल्पनाओं के बाग में
अक्सर आ कर
फूलों से खेलती दिखती रही
जहां मिले थे
वह जगह बहुत नई थी-
मेरे लिए
पर बहुत हरी भरी
फूलों से टहलते हुए
पता ही नहीं लगा
कब उसका घर आ गया

उसका घर भी
बोलते नयन-नक्श वाली की तरह
बोल रहा था-
गिनती की सिर्फ जरुरी चीजें
घर की सजावट भी थीं
और जरुरत भी
फालतू चीजें घर में कहीं भी
न होने के कारण
घर खुला-खुला लग रहा था-
खूबसूरत, दिलचस्प और सादा
अपनी तरफ का एक ही

बिल्कुल अपनी घर वाली जैसा
जहां सादगी खूबसूरती को बढा रही थी
और खूबसूरती सादगी को
अमीरी फकीरी दोनों उसके स्वभाव में दिख रही हैं
वह कविता लिखती है
लिखकर हवा के हवाले कर देती है

रात बीत गई है
पर सपना नहीं बीता
वह अभी भी बोलते नतन-नक्श वाली के साथ
कहीं चल रहा है…

( ईमरोज )

प्रचार-इमरोज़

मैं आपका कल का
प्रचार सुनकर आई हूं
कल आप ने कहा था
कि आपका ग्रंथ औरत की इज्जत करता है
पर आप के ग्रंथ को मानने वाले
हर रोज अपनी औरतों के साथ
हर तरह की बदतमीजियां किये जा रहे हैं
प्रचार और असलियत में इतना फासला ?
जिन्दगी ने प्रचारक के पास बैठकर
उसे कहा

प्रचारक का जिन्दगी के साथ
इस तरह का वास्ता नहीं पडा होगा
वह चुपचाप सुनता भी रहा और चुप भी रहा…

जिन्दगी ने फिर पूछा
अपने ग्रंथ में देख कर बताइये
कि इस में ये वाक्य कहीं है
कि औरत हमारी ईज्जत है…

प्रचारक ग्रंथ पर झुक कर
घंटो ग्रंथ को देखता रहा
पर वह वाक्य नहीं मिला उसे…
प्रचारक को चुप सा देख कर
जिन्दगी वहां से उठ आई…

औरत हमारी इज्जत है
ये वाक्य जिन्दगी के लिए
जिन्दगी में जरुरी है
किसी ग्रंथ के लिए नहीं…
( इमरोज़ )

मैं रहूं या ना रहूं-रश्मी विराज

मैं रहूं या ना रहूं
तुम मुज में कहीं बाकी रहेना…

मुजे नींद आये जो आखिरी
तुम ख्वाबों में आते रहेना
बस इतना है तुमसे कहेना…
मैं रहूं या ना रहूं
तुम मुज में कहीं बाकी रहेना…

किसी रोज बारिश जो आये
समज लेना बूंदो में मैं हूं
सुबह धूप तुमको सताये
समज लेना किरनों में मैं हूं
कुछ कहुं या ना कहुं
तुम मुजको सदा सुनते रहेना
बस इतना है तुमसे कहेना…

हवाओं में लिपटा हुआ मैं
गुजर जाउंगा तुमको छु के
अगर मन हो तो रोक लेना
ठहर जाउंगा इन लबों पे
मैं दिखुं या ना दिखुं
तुम मुजको महसूस करना
बस इतना है तुमसे कहेना…

मैं रहूं या ना रहूं
तुम मुज में कहीं बाकी रहेना

Video Album : Main Rahoo Ya Na Rahoo
Singer : Armaan Malik
Lyrics : Rashmi Virag
Music Label : T Series

દરેક પ્રેમ-ગગન ગિલ, અનુ. નલિની માડગાંવકર

દરેક પ્રેમ તમારે ઘરને ઉંબરે આવીને
સહુ પ્રથમ પૂછે છે કે
તું મારે ખાતર બારીમાંથી નીચે કૂદી શકીશ ?
પોતાની છાતી ચીરી શકીશ ?

દરેક પ્રેમ આમ જ પૂછે છે કે
તું તારા નાજુક બાહુથી
મારી જોડે ઊડી શકીશ ?
પ્રેમ તમારા ઘરને ઉંબરે આવતો હોય છે
ઉતાવળે પાછો ન ફરવા માટે
એને જવું હોય છે
એકાદ પર્વત કે ખીણની દિશામાં
સાગર કે નદીની દિશામાં
એ પૂર્વયોજના વગર
તમારા ઘરની દિશામાં આગળ વધે છે.
અને જાણવા ઈચ્છે છે કે
તમે એની સાથે ડૂબવા તૈયાર છો કે નહીં ?
પ્રેમ તમને સ્વેચ્છાએ મરવાની
પૂરેપૂરી સંમતિ આપે છે.

( ગગન ગિલ, અનુ. નલિની માડગાંવકર )

इन्तजार-ईमरोझ

एक खुदाई से
एक दीवार पर ये लिखा मिला
मैं एक कविता अकेली खडी
समय को कह रही हूं
कि अपने वजूद से मैं अपने आपको
जीने के लिए
एक जिन्दगी का
इन्तजार कर रही हूं –
सदियों से…

लिखने वाला तो मुझे लिख कर
भूल ही गया है
कि उसे मुझे जीना भी है
शायद ये उस के वजूद में ही ना हो

ये लेखन अब बहुत मद्धम
हो चूका है
पर कविता का इन्तजार और उसकी हसरत
वैसी की वैसी है –
अब भी गहरी की गहरी…

( ईमरोझ )

पेड-ईमरोझ

कल तक
जिन्दगी के पास एक पेड था
जिन्दा पेड
फूलों फलों और
महक से भरा…

और आज
जिन्दगी के पास
सिर्फ जिक्र है –
पर है जिन्दा जिक्र
उस पेड का…

पेड जो
अब बीज बन गया
और बीज
हवाओं के साथ
मिल कर
उड गया है
पता नहीं
किस धरती की
तलाश में…

( ईमरोझ )

रखजा-हनीफ साहिल

भूली बिसरी कहानीयां रखजा,
कुछ तो अपनी निशानीयां रखजा.

फिर न रक्से बहार याद आए,
झर्द शाखों पे तितलीयां रखजा.

कच्ची नींदों के ख्वाब की ताबीर,
आज पलकों के दरमियां रखजा.

हिज्र की ईन सियाह रातों में,
चांदनी की तजल्लीयां रखजा.

मेरे लफझों को शादमानी दे,
फिर गजल में रवानीयां रखजा.

तेरी मेरी शरारतें शिकवे,
अपनी बातें पुरानीयां रखजा.

आज दरिया भी है अकेला हनीफ,
ईस पे यादों की कश्तीयां रखजा.

( हनीफ साहिल )

धीरे बोल-खलील धनतेजवी

एक ने बोला जोर से बोलो,दूजा बोला धीरे बोल,
फिर मुजको समझाने आया पूरा टोला धीरे बोल.

रात का सन्नाटा केहता है परी उतरने वाली है,
हो सकता है यहीं पे उतरे उडनखटोला धीरे बोल.

आंधी भी कुछ दूर हवा का भेस बदल कर बैठी है,
तू क्या जाने, किस ने पेहना किस का चोला धीरे बोल.

देख हवा का झोंका है या सचमुच कोई आया है,
देख किसीने दरवाजे का जिस्म टटोला धीरे बोल.

धीरे से केहता हुं धीरे बोल, मगर सुनता ही नहीं,
आखिर में भी चिल्लाया और जोर से बोला धीरे बोल.

देख खलील अब ईस बस्ती को और परेशां मत करना,
खो बैठेगा यहीं पे तेरा झंडा झोला धीरे बोल.

( खलील धनतेजवी )

कभी हंसा के गया-खलील धनतेजवी

कभी हंसा के गया, फिर कभी रुला के गया,
गरज कि मुजको वो हर रुख से आजमा के गया.

मैं अपने मूंह से बडी बात तो नहीं करता,
यहां का जिल्लेइलाही भी घर पे आ के गया.

गजब तो ये कि उजालों की सल्तनत वाला,
मेरे चिराग से अपना दिया जला के गया.

जिसे बुला के अदब से बिठाया महेफिल में,
हमारे बीच बडे फित्ने वो जगा के गया.

खलील, आज वो हर शख्स याद आता है,
जो हम से पहेले यहां मेहफिलें सजा के गया.

( खलील धनतेजवी )

यूं भी कब-खलील धनतेजवी

यूं भी कब नींद से नजदीक भी होने देती,
तु न होता तो तेरी याद न सोने देती

राह में मेरी हर इक मोड पे इक दरिया है
कोई तो होती नदी, होंठ भीगोने देती

रात बच्चे की तरह दिल ने परेशान किया,
नींद आ जाती तो ख्वाबों के खिलोने देती

मछलियां घास पर जीने का इरादा करती
ओस अगर कतराभी दरिया में समोने देती

जिस को दुखदर्द में हसने को कहा जाता है,
काश दिनिया उसे जी खोल के रोने देती

घर पे आते ही मुझे नींद सुलाने आई,
कम से कम, वो मुझे मूंह हाथ तो धोने देती

जिन्दगी को खलील इतनी भी तो फुरसत कब भी,
वर्ना कुछ वक्त यूं ही मुझको न खोने देती

( खलील धनतेजवी )