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प्रिय अमृता …-अंजलि काले

प्रिय अमृता …
तुम ,
जो अपने पीछे
इस दुनिया के लिए
छोड़ गयी हो ,
अपनी सुंगंधित कविताएँ
और पुरोगामी विचारधारा की
कितनी ही
उबलती  ..दहकती स्मृतियाँ ..
मैंने कोशिशन
सहेज रखी है
मेरी रचनाओं में
तुम्हारे स्मृतियों की
शब्द शब्द राख ..
तुम्हारे बाद की दुनिया से
तुम्हारी दी हुई कविता
और तमाम बग़ावत
ख़त्म होने से पहले
अपना वादा
” मैं तुझे फिर मिलूंगी “
निभाने के लिए आ जाओ
के मुझे यक़ीन है
तुम ककनूसी नस्ल की
वह रूहानी पैदाईश हो
जो मेरी कविताओं से
फिर से ज़िंदा हो सकती हो
आओ के मिल कर लिखें
इस पर बेलौस इश्क़ की इबारतें
________के  मैंने तुम्हारे बाद भी ढलने नही दिया है इक उफ़नता सूरज  ….!!
.
( अंजलि काले )

एक कोना-उमा त्रिलोक

एक कोना
जो हो रहा है ; और
जो हो चुका है
उसका क्या ?
जो होने वाला है
उसका भी क्या ?
ये तनाव खिंचाव, होहल्ला
शोरोगुल, मारधाड़
मेरे कारण तो नहीं है
फिर इनका भी क्या ?
तालियां, गालियां
उलाहने, अपेक्षायें
उम्मीदें, उत्सुकताएं
मेरे कारण हैं भी,
और नहीं भी
लेकिन
इनका भी क्या ?
सब कुछ
जो देखा, मिला, समझा
उसका भी क्या ?
अब
तलाशती है रूह
एक कोना
सुनसान, वीरान
एकाकी, मौन
.
( उमा त्रिलोक )

वह-उमा त्रिलोक

वह
ढूंडा है मैंने उसे
अपने आज में, अपने कल में
रास्तों में, घरों में
पगडंडियों पर
चलते में, रुकते में
वृक्ष पुंजों में
पतझड़ में,  वसंत में
नदियों में, झरनों में
सुनसान में, होहुल्लड़ में
उत्सव में, मातम में
हरियाली में, सूखे में
हंसी में, उदासी में
कहानी में, कविता में
और भी
यहां वहां
ढूंडा है उसे
जिसे मैं जानती नहीं
लेकिन
अगर ढूंढ लेती तो ज़रूर
पहचान लेती
मगर
कहीं ऐसा तो नहीं
कि
वह है ही नहीं
और
बस ढूंडना मात्र ही
एक सत्य है
.
( उमा त्रिलोक )

वर्षा ऋतु को समर्पित-उमा त्रिलोक

वर्षा ऋतु को समर्पित
संदली शाम
सूरज की लाली जब
सांवरी ज़रा भयी
घुमड़ घुमड़ बादल ने
टप टप बूंद बरसाई
छप छप छप छप पानी बरसा
धरती तब बौराई
आंख मूंद ली पत्तों ने, तब
टहनी, पूछ मुझे सकुचाई
आसमान की छत के नीचे
”  बैठी तू क्यों अकेली “
मैंने कहा,
” नहीं
मैं हूं कहां अकेली ?
देख नहीं पाई,
संग संग हैं हम दोनों
बाज रही  स्वर लहरी
बूंदों ने  थाप लगाई
नाच रहे हैं हम दोनों
हम ने  है रास रचाई
वह है मुझ में
मैं हूं उस में
रम गए इक दूजे में
सच मानो, प्रकृति ने
यह संदली शाम
हमरे लिए सजाई
हमरे लिए सजाई “
.
( उमा त्रिलोक )

आहट-उमा त्रिलोक

झील का किनारा
अल्साई लहरें
स्तब्ध खड़ा चांद
सोई हवा मौन
स्थिर पत्ते निश्चल
निर्जन वन
विदा हो चुकीं ख्वाहिशें
दफना दिए गए हादसे
कुछ भी न हो ; और
जो हो
वह भी न हो
रहे तो बस
एक टुकड़ा सन्नाटा
हो जिस में
एक आहट
किसी के पदचाप की
.
( उमा त्रिलोक )

खोल दो खिड़की-उमा त्रिलोक

खोल दो खिड़की
जानती हूं
हवा के साथ साथ
आयेगी विकलता, और बेकसी
किसी मजलूम की
धुआं बन कर
आज
चाहती हूं
फूंक देना उसी धुएं में
एक चिनगारी
जो आग बन कर भभके
जला दे, खाक कर दे
सारे जुल्मों सितम
फिर
उसी खाक से उभरे
एक परिंदा
जो फैलाए पंख
नए दौर में
भरे ऊंची उड़ान
आसमान से छीन लाए
अपने हकूक
होने न दे हावी किसी को
हकपरसती पर
सुना दे फरमान ऐसा, कि
लहराये
परचम इन्कलाब का
खोल दो खिड़की

.

( उमा त्रिलोक )

मुलाकात-उमा त्रिलोक

तुमने पूछा नहीं
मगर ऐसा लगा कि
पूछ लिया
कि,
कैसी हूं
मेंने भी
बिन बताए बता दिया
कि, कैसी हूं
मगर सुनो
यह तो बताओ
कि
वह प्रेम गीत
जो तुमने मेरे लिए
लिखा था
मुझे क्यों नहीं सुनाया
उसके बदले में
क्यों थमा दिया
एक सुरमई
वर्षा घन
जो गरजा भी नहीं
शायद इसलिए कि
तुम जानते हो
मुझे गरजते बादलों से डर लगता है
बादल बरसता रहा,और
मैं भीगती खड़ी रही
और
तुमने मुझे एक गीत
ओढ़ा दिया
जिसे ओढ़े हुए मैं आज भी
वहीं हूं
उसी मंदिर के अहाते में
यह मान कर कि
मुलाकात अभी बाकी है

.
( उमा त्रिलोक )

क्या करोगे पूछ कर-उमा त्रिलोक

क्यों बह जाती है
गरीब बच्ची की उम्मीदें
उसके आंसू बन कर
क्या बीतती है उस बालिका पर
जो ब्याह दी जाती है किसी अधेड़ से
क्या होता है जब प्रतिभा
दबा दी जाती है  बुर्के में
मिटा दी जाती हैं  संभावनाएं
उभरने, सितारा बनने की
क्यों गर्भपात करवा दिया जाता है उसका
जिसकी कोख में बच्ची होती है
क्या करोगे पूछ कर
क्यों नहीं बचते पैसे
बूढ़ी मां की दवाई के लिए
जब कि बच्चे तो पढ़ते है अंग्रेजी स्कूलों में
क्यों बजुर्ग बाऊ जी को
भिजवाया जाता है वृद्ध आश्रम
उन्हें, उन्ही के घर से बेदखल कर के
क्या करोगे पूछ कर
.
( उमा त्रिलोक )

बिसरी बातें-उमा त्रिलोक

इस घर की
दीवारों में अब दरारें हैं
खिड़कियों दरवाजों की रंगो रौनक उखड़ी सी है
वक्त की गुसैली नज़र पड़ी है इन पर
जो लगाई थी तस्वीरें
कील हिलने से अब गिरी गिरी  सी लगती हैं
तल्ख हवाओं ने अपने निशान छोड़े हैं
फर्श भी उखड़ा है,
क्या करोगे
पूछ के कि कैसे टूटा
मगर
मैं खुश हूं
कि अब भी सूरज की किरणे
बेखोफ़ बिछती है मेरे आंगन में,और
फूलों की महक भी आती जाती हैं
मगर
गर्दिशे बारिश में
छत का कुछ हिस्सा दब गया है
और पिछवाड़े में पानी भरा है
फिर भी
जब तुम आओगे
तो
अधखुली किताबों
से सुनना कहानी, और
चंद ग़ज़लें सुनना
साज़ो की ज़ुबानी
माना कि
सब साज़ो सामान बिखरा पड़ा है
फिर भी
बैठ सकते हैं हम
बगीचे के किसी कोने में
और
बिना बोले ही कर सकते हैं कुछ
बिसरी बातें
.
( उमा त्रिलोक )

वह क्षण-उमा त्रिलोक

होते हुए भी नहीं होता
रहते हुए भी नहीं रहता
वह क्षण
फिर
अनायास ही दिखता है
नदी के कल कल में
पत्ती के उगने में
कली के खिलने में
ठहर जाता है कभी कभी
ओस की नन्ही बूंद में
उस क्षण भंगुर को मेंने
कभी देखा चांद किरन में
कभी रात के आंचल में
दिनकर से रूठा हो जैसे, फिर
छिप जाता वह चिलमन में
तत्व विलीन
वह क्षण
प्रश्न बना रह जाता
ढूड लिया जब अंदर बाहर
फिर मैने
अपने भीतर झांका
हां, अपने भीतर झांका
वहीं मिला, वह नटखट मुझ को
धीमे से मुस्काता
धीमे से मुस्काता

.

( उमा त्रिलोक )