Tag Archive | हिन्दी कविता

तेरा शहर-उमा त्रिलोक

बहुत भीड़ है
तेरे शहर में
खूब सजे हैं बाज़ार
ठाठ बाठ है बहुत
भरी ऊंची दुकानों में
हो रही है जम कर
खरीददारी
सजी महिलाएं
रौबीले मर्द
हंसते खेलते बच्चे
मस्ती में हैं मस्त
कोई पैदल तो कोई
है स्कूटर पर सवार
लंबी लाइनों में रेंगती हैं
रंग बिरंगी कारें
यूं लगता है
समृद्धि ने अपने
सुनहरी पंख फैलाए हैं
मगर
कोने में एक बूढ़ी औरत
खड़ी है लिए कुछ
बेचने को गुब्बारे
रेड लाइट पर रुकती हैं जब कारें
भूख के हवाले से
बच्चे
पोछतें है शीशे कारों के
मांगते हैं पैसे
फुटपाथ पर बैठा है
बूट पालिश की पेटी लिए ; कोई
रोज़ी रोटी की आस में
ऐसा क्यों है कि
कोई है इतना समृद्ध ; तो कोई
इतना लाचार
प्रश्न चिन्ह
चस्पा है
निजाम के द्वार पर

.

( उमा त्रिलोक )

यह ज़रूरी तो नहीं-उमा त्रिलोक

यह ज़रूरी तो नहीं
गुफ्तगू हो
मुलाकातें हों, बातें हों
यह ज़रूरी तो नहीं
दो किनारे बन चलते रहें; और
डोलता रहे मौन हमारा
बस इतना ही बहुत है
एक खूबसूरत नज़्म बन
मुस्काना, हंसना, खिलखिलाना
यह ज़रूरी तो नहीं
एक बुक मार्क की तरह
उस की किताब में
बने रहना ही बहुत है
तुम उसका, और
वह तुम्हारा
ख्वाब बने
साथ रहने, बसने की आस बने
यह ज़रूरी तो नहीं
बस
उसके ख्वाबों में
तुम्हारा होना ही बहुत है
कोई बंदिशें, वादे
या इकरार हों
गिले, शिकवे या शिकायत हो
यह ज़रूरी तो नहीं
इक दूजे के लिए होना,
बस होना ही बहुत है
.
( उमा त्रिलोक )

मैं पत्ता हूं-उमा त्रिलोक

मैं पत्ता हूं
चलो माना
मैं फूल नहीं
पत्ता हूं
मगर
पत्ता ही तो
सजाता है फूल को
संग रह कर मान बड़ाता है
मुरझाने से बचाता है
पत्ता
ढाल है फूल की
साथी भी है सलोना
बन जाता है कभी
उसकी गोद
तो कभी पालना भी
पत्ता
जूझता हवाओं से
मिट्टी से जल, सूर्य से रोशनी बटोरता
गुप छुप गुप छुप
खाद बनाता, उसे खिलाता
रिझाता; यह पत्ता ही तो है
जो पालता है फूल को
मगर
फूल,
यूं ही इठलाता, मगरुर सा
भूल जाता कि
वह ऋणी है किसी और का
हक से ले लेता है
पोषण स्नेह अनुराग
सानिध्य और सत्कार भी
नहीं लौटाता
किसी अपने का प्यार भी
फूल मुरझा कर गिर जाता है
मिट्टी में मिल जाता है
पत्ता
फिर से बाट जोहता है
फूल की

.

( उमा त्रिलोक )

 

सड़क-उमा त्रिलोक

तुम
जब साथ चलती हो ; तो
सहेली सी लगती हो
मिलाती हो कितनो से
दिखते हैं कई चेहरे
हंसते, मुस्काते
थोड़े उखड़े, थोड़े बिखरे
उतेजित, तो कोई उदास
भावनाओं के दिखते हैं
कई रूप, कई रंग
चलती है कभी पुरवाई
कभी आंधी
तो कभी आती है बरसात
करके सभी को अनदेखा
कैसे चलती रहती हो अनवरत
यह जानकर भी कि
अभी रास्ता है तवील
छोड़ कर कई मील के पत्थर और पड़ाव
कैसे बढ़ जाती हो, निकल जाती हो
बन के बिंदास
मुझे वह मंत्र बता दो
मुझे भी चलना है तेरी ही तरह
यह जाने बिना कि कहां जाना है
हां
बस चलना है,
बिना जाने कि कहां जाना है
.
( उमा त्रिलोक )

प्रिय अमृता …-अंजलि काले

प्रिय अमृता …
तुम ,
जो अपने पीछे
इस दुनिया के लिए
छोड़ गयी हो ,
अपनी सुंगंधित कविताएँ
और पुरोगामी विचारधारा की
कितनी ही
उबलती  ..दहकती स्मृतियाँ ..
मैंने कोशिशन
सहेज रखी है
मेरी रचनाओं में
तुम्हारे स्मृतियों की
शब्द शब्द राख ..
तुम्हारे बाद की दुनिया से
तुम्हारी दी हुई कविता
और तमाम बग़ावत
ख़त्म होने से पहले
अपना वादा
” मैं तुझे फिर मिलूंगी “
निभाने के लिए आ जाओ
के मुझे यक़ीन है
तुम ककनूसी नस्ल की
वह रूहानी पैदाईश हो
जो मेरी कविताओं से
फिर से ज़िंदा हो सकती हो
आओ के मिल कर लिखें
इस पर बेलौस इश्क़ की इबारतें
________के  मैंने तुम्हारे बाद भी ढलने नही दिया है इक उफ़नता सूरज  ….!!
.
( अंजलि काले )

एक कोना-उमा त्रिलोक

एक कोना
जो हो रहा है ; और
जो हो चुका है
उसका क्या ?
जो होने वाला है
उसका भी क्या ?
ये तनाव खिंचाव, होहल्ला
शोरोगुल, मारधाड़
मेरे कारण तो नहीं है
फिर इनका भी क्या ?
तालियां, गालियां
उलाहने, अपेक्षायें
उम्मीदें, उत्सुकताएं
मेरे कारण हैं भी,
और नहीं भी
लेकिन
इनका भी क्या ?
सब कुछ
जो देखा, मिला, समझा
उसका भी क्या ?
अब
तलाशती है रूह
एक कोना
सुनसान, वीरान
एकाकी, मौन
.
( उमा त्रिलोक )

वह-उमा त्रिलोक

वह
ढूंडा है मैंने उसे
अपने आज में, अपने कल में
रास्तों में, घरों में
पगडंडियों पर
चलते में, रुकते में
वृक्ष पुंजों में
पतझड़ में,  वसंत में
नदियों में, झरनों में
सुनसान में, होहुल्लड़ में
उत्सव में, मातम में
हरियाली में, सूखे में
हंसी में, उदासी में
कहानी में, कविता में
और भी
यहां वहां
ढूंडा है उसे
जिसे मैं जानती नहीं
लेकिन
अगर ढूंढ लेती तो ज़रूर
पहचान लेती
मगर
कहीं ऐसा तो नहीं
कि
वह है ही नहीं
और
बस ढूंडना मात्र ही
एक सत्य है
.
( उमा त्रिलोक )

वर्षा ऋतु को समर्पित-उमा त्रिलोक

वर्षा ऋतु को समर्पित
संदली शाम
सूरज की लाली जब
सांवरी ज़रा भयी
घुमड़ घुमड़ बादल ने
टप टप बूंद बरसाई
छप छप छप छप पानी बरसा
धरती तब बौराई
आंख मूंद ली पत्तों ने, तब
टहनी, पूछ मुझे सकुचाई
आसमान की छत के नीचे
”  बैठी तू क्यों अकेली “
मैंने कहा,
” नहीं
मैं हूं कहां अकेली ?
देख नहीं पाई,
संग संग हैं हम दोनों
बाज रही  स्वर लहरी
बूंदों ने  थाप लगाई
नाच रहे हैं हम दोनों
हम ने  है रास रचाई
वह है मुझ में
मैं हूं उस में
रम गए इक दूजे में
सच मानो, प्रकृति ने
यह संदली शाम
हमरे लिए सजाई
हमरे लिए सजाई “
.
( उमा त्रिलोक )

आहट-उमा त्रिलोक

झील का किनारा
अल्साई लहरें
स्तब्ध खड़ा चांद
सोई हवा मौन
स्थिर पत्ते निश्चल
निर्जन वन
विदा हो चुकीं ख्वाहिशें
दफना दिए गए हादसे
कुछ भी न हो ; और
जो हो
वह भी न हो
रहे तो बस
एक टुकड़ा सन्नाटा
हो जिस में
एक आहट
किसी के पदचाप की
.
( उमा त्रिलोक )

खोल दो खिड़की-उमा त्रिलोक

खोल दो खिड़की
जानती हूं
हवा के साथ साथ
आयेगी विकलता, और बेकसी
किसी मजलूम की
धुआं बन कर
आज
चाहती हूं
फूंक देना उसी धुएं में
एक चिनगारी
जो आग बन कर भभके
जला दे, खाक कर दे
सारे जुल्मों सितम
फिर
उसी खाक से उभरे
एक परिंदा
जो फैलाए पंख
नए दौर में
भरे ऊंची उड़ान
आसमान से छीन लाए
अपने हकूक
होने न दे हावी किसी को
हकपरसती पर
सुना दे फरमान ऐसा, कि
लहराये
परचम इन्कलाब का
खोल दो खिड़की

.

( उमा त्रिलोक )