कहीं बीत न जाए वसंत-उमा त्रिलोक

उड़ते परिंदे के हाथ
भेज देना खत
लिख देना वही सब कुछ
जो नहीं कह पाए थे
उस दिन
अपनी नम आंखों से
भेज देना
घोल कर
नदी की कल कल में
वही गीत
जो गाया था तुम ने
उसी नदी के किनारे
मुझे मनाने को
दोहराना वह भी
जो कहते कहते रुक गए थे
उस दिन
जब किसी ने पूछ लिया था
एक अटपटा सा सवाल
हम दोनों के बारे में
भला
क्या कह कर,
समझाया था उसे, तुमने
टटोलना जेबों कोअपनी
पायोगे कुछ पड़े हुए सवाल
जो पूछे थे मैंने बहुत पहले, और
जो रख लिए थे तुमने,
यह कहकर
कि बताऊंगा बाद मे
लिख भेजना उन सबके जवाब
मगर
देखना
कहीं बीत न जाए वसंत
.
( उमा त्रिलोक )

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