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बच्चा हुआ है-मनमीत सोनी

कुछ महीनों पहले तक
जब भी कहीं आस-पास थाली बजती थी
माँ दौड़कर जाती थी छत पर
और नीचे आकर हम सबसे कहती थी
“उनके यहाँ बच्चा हुआ है”
माँ की ख़ुशी में
कम से कम मैं तो शरीक़ नहीं होता था
मुझे यही लगता था
“बच्चा ही तो पैदा हुआ है”
अब जब मुहल्ले के
हर दूसरे-तीसरे घर में मातम पसरा है
मैं अकेला छत पर खड़ा रहता हूँ
एक अदद थाली की आवाज़ सुनने के लिए
मैं
थाली की आवाज़ सुनकर
नीचे वाले कमरे में जाना चाहता हूँ
और माँ को बताना चाहता हूँ
“उनके यहाँ बच्चा हुआ है”

मैं कविताएँ क्यों लिखता हूँ-

मैं जानता हूँ श्रीमान
मेरी कविताएँ वैसी नहीं है जैसी हुआ करती हैं
इनमें प्रकृति का चित्रण नहीं
इनमें स्त्रियों का सौंदर्य नहीं
इनमें जीवन का दर्शन नहीं
इनमें वह तैयारी नहीं जैसी मंझे हुए कवि करते हैं
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
मैं जब सुबह सो कर उठता हूँ
तो इस दुनिया को देखकर मेरे दिल में एक हूक-सी उठती है
अगर पाँच हज़ार बरसों में यहीं तक पहुंचना था तो नंगे-असभ्य-निरक्षर भले थे हम
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
सुबह से शाम तक आते-आते
कितनी बुरी तरह थक जाते हैं मेरे आस-पास के लोग
ये मरना चाहते हैं लेकिन सोचते हैं मरने में कष्ट होगा
इससे बेहतर है जिये जाते हैं
मैं इन्हें झिंझोड़ना चाहता हूँ लेकिन मैं होता कौन हूँ
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
इस दुनिया की रात तो अंधेरे से भी काली है
प्रेमियों-स्त्रियों-बुजुर्गों के दुःख कितने भयानक हैं
भूखों के उनसे भी अधिक दारुण और डरवाने
मैं इन सबका साक्षी हूँ श्रीमान
.
तब मैं डायरी उठाकर
उसके पीछे अपना काला मुँह छिपा लेता हूँ
आड़ी-तिरछी लकीरें खींचता हूँ
और उन लकीरों को बिना किसी खास तैयारी के
कविताओं के बहुत बड़े डस्टबिन में बिना किसी अफसोस के फेंक देता हूँ श्रीमान
.
कुछ नहीं हो सकता
कुछ नहीं हो सकेगा
जैसी बातें करते-करते
कब मेरी आँख लग जाती है
मुझे ख़ुद ही पता नहीं चलता श्रीमान
.
फिर सुबह
वही दुनिया वही दुख
वही शाम वही थकन
वही रात और वही काला अंधेरा
कविता मुझ मजबूर की मजबूरी है
जैसे जीवन को घसीटना इस दुनिया की
मैं जानता हूँ श्रीमान
मेरी कविताएँ वैसी नहीं हैं जैसी हुआ करती हैं..!
.
( मनमीत सोनी )

कोरोना-समय में एक मृतक की अनलिखी कविताएँ-मनमीत सोनी

1.

मृतक भी तो चाहता होगा

अंतिम बार देख ले उन्हें

जिन्हें वह हर दिन देखता था!

.

2.

फूंको मत

जलाओ मत-

.

अग्नि दो मुझे!

.

3.

बंद शीशों वाली एम्बुलेंस में

सीधे श्मशान घाट ले गए मुझे!

.

अहा!

.

वह मेरा बरामदा

वह चार कंधों का झूला

वह पुराने बाज़ार का आख़िरी चक्कर

वह रोना जो आज के दिन सिर्फ़ मेरे हिस्से का था

.

अब टीस बनकर रह गया है!

.

4.

जब राख हो जाऊँगा

तब इन्फेक्टेड नहीं कहलाऊंगा-

.

गंगा में बहूँगा

कलमुँही बीमारी को चिढ़ाते हुए!

 

5.

संसारियो!

तुम्हारा मृत्यु-बोध मर चुका था

.

मैंने असमय मर कर

उसे फिर से जीवित कर दिया है..!

.

6.

एक मेला था

जिसमें सब लोग जी रहे थे

नाच रहे थे, खा रहे थे, पी रहे थे-

फिर एक सच्ची अफ़वाह उड़ी

भगदड़ मची और मैं

उसमें कुचलकर मर गया!

.

( मनमीत सोनी )

वबाओ के इस दौर में-हिना आर्य

वबाओ के इस दौर में
बिलखते तड़पते लोगों को कहते रहना
” सब ठीक हो जाएगा”
उनकी आंखों में लगा देना उम्मीद का काजल
और बढ़ा देना उनके जीने की
____________तमाम संभावनाएं ।
.
भूलना मत कुदरत ने तुम्हे बिना मांगे ही सब दे दिया है, देने के इस दौर में बन जाना कभी कभी कोई कर्ण
या
बन जाना दुखों की भट्टी में पक कर पत्थर बनी हुई अहिल्या के राम
संवेदना की पी.पी.ई कीट पहन कर तुम भी बन सकते हो बिना डिग्री के नर्स/डॉक्टर,
बिना स्टेथोस्कॉप के चलेगा मेरी जान❤️
खुदा के वारिस तुम
खुदा सा जायका रखना और
_________कहते रहना “दो बोल जिंदगी के”
.
( हिना आर्य )
वबा – महामारी

होली मुबारक- हिना आर्य

वो कमज़ोर थी,
फिर भी काफी रफ्तार से
सीढियां चढ़ रही थी ।
सांसे फूलने लगी थी।
माथे पर था घाव।

मैंने कहा” रुको, तुम्हारा घाव गहरा है ” ।
वो बोली “ये अब पक चुका है” !!!

वार्ड में ले जाते हुए मैंने देखा,
आंचल के नीचे उभर आया है कोई गुब्बारा।
उसके फल स्वरूप
आंखो में था दर्द और
महीनों का इंतजार ।

सच मुच
उसका घाव पक चुका था ।
मै वार्ड के बाहर ही ठहर गई ।
उसकी चिंखो में
मेरा काजल बह गया ।

जीव से जीव पैदा कर
आंखो में छलक उठा संतोष,
जहां रहता था दर्द और इंतजार ।

घाव से निकला पीला पस ।
बच्चे को दुनिया दिखाते
बह गया लाल खून,
फिर बहने लगी वक्षस्थल से सफेद धार ।
फटी साड़ी में भी उसकी सुंदरता उभर आई,
जैसे बहार आई ।

चंद रुपए हाथों में थमाते हुए
मैंने कहा ” होली मुबारक” ।

__( स्त्री स्वयं रंगो का उत्थान है।)

– हिना आर्य

 

હોળી મુબારક
મેં એને જોઈ ત્યારે
એ કેરવાઈ ગયેલી
તો પણ ખાસ્સી ઝડપથી
માથે પડેલા ઘા સાથે હાંફતી હાંફતી
દાદર ચડી રહી હતી.
મેં કહ્યું,” અલી , થોભ, તારો ઘા તો ઊંડો છે.
ત્યારે એ બોલી,” એ તો હવે પાકીને વકરી ગયો છે.”
એને વોર્ડમાં લઈ જતી વખતે
મારી અનુભવી નજરે
એનાં પાલવે ઢંકાયેલાં પેટનો ઉભાર પારખી લીધો .
જેનાં ફળસ્વરૂપે આંખોમાં દર્દ અને
મહીનાઓનો તલસાટ ડોકાઈ રહ્યો હતો.
સાચેસાચ જ એનો ઘા ફદફદી ગયો હતો.
હું તો વોર્ડની બહાર જ થંભી ગયેલી.
એની ચીસોથી મારાં કાજળની ધારા વહી ગઈ.
એક જિંદગીએ બીજી જિંદગીને જન્મ આપતાં હવે
આંખોનાં દર્દ અને તલસાટની જગ્યા
માતૃત્વના આનંદે લઈ લીધી હતી .
ઘાવમાંથી નીકળ્યું પીળચટ્ટું પરું અને
બચ્ચાંને દુનિયાનું દર્શન કરાવતાં
વહી રહ્યું હતું રાતું લોહી .
તો પયોધરેથી ધવલ અમૃતધારા.
તરડાઈ ગયેલી સાડીમાંથીયે ડોકાઈ રહ્યું હતું એનું સૌંદર્ય.
જાણે વાસંતી દર્શન.
એની હથેળીએ થોડાં રૂપિયા થમાવતાં
મેં કહ્યું ,’હોળી મુબારક ‘
સ્ત્રી પોતે જ મેઘધનુષી રંગોની જનની છે.
.
( હિના આર્ય, ભાવાનુવાદ : બકુલાબેન દેસાઈ ઘાસવાલા )

 

 

 

गर कहोगे कि-सुनीता पवार

 

प्रिय शुभचिंतक,
गर कहोगे कि..
तुम्हारा कद छोटा है
थोड़ी लम्बाई होती तो
अच्छा होता ।
.
गर कहोगे कि..
रंग थोड़ा दबा हुआ है
थोड़ा गोरा होता तो
चमक अधिक होती ।
.
गर कहोगे कि…
आँखे छोटी या बड़ी हैं
ये कोरों पास झुर्रियां न होती तो
सुंदर दिखती ।
.
गर कहोगे कि…
बहुत मोटी या पतली हो
थोड़ा आकार में होती तो
कमाल का व्यक्तित्व होता ।
.
गर कहोगे कि…
आवाज़ भारी या हल्की है
थोड़ी सामान्य होती तो
मधुर बोलती ।
.
तो मैं कहूंगी कि..
प्रिय शुभचिंतक,
मैं शरीर को नहीं बदल सकती
न शारीरक बदलावों को
पर मुझे वो कमी बताना
जिसे मैं बदल सकूँ ।
.
प्रिय शुभचिंतक,
क्या कभी देखते हो तुम?
मेरे हौंसलों का कद
मेरे आत्मविश्वास की चमक
मेरे भावों की सुंदरता
मेरे कमाल से गुण वाला व्यक्तित्व
मेरे विनम्र शब्दों की मधुरता
या देखकर अनदेखा करते हो?
मैं फिर कहूँगी कि
अपनी निपुणता को भी परखना,
फिर मुझे वो कमी बताना
जिसे मैं बदल सकूँ ।
स्त्रीरंग से
.
( सुनीता पवार )

आज से 30 साल बाद-आनंद सरिता

 

सुनो …!❤️
हम मिलेंगे एक बार जरूर
बुढापे में लकड़ी लेकर
आऊंगी मैं तुमसे मिलने…
जानते हो क्यों??
क्योंकि उस समय
कोई बंदिशें नहीं होंगी
ना तुम्हारे ऊपर ,ना मेरे ऊपर
वो दौर भी कैसा होगा ।
कितना सुन्दर कितना खुशहाल,,
ना किसी का डर होगा,
ना कोई दायरे ….
तुम आओगे ना मुझसे मिलने ?
आँखों पर मोटा-सा चश्मा होगा
उस चश्मे से निहरूंगी
तुम्हारे आंखो के शरारत  को……
तुम रख देना सर अपना
हौले से मेरे कंधे पर
मैं संवार दूंगी तुम्हारी जुल्फो को
अपने झुर्री पड़े…कोमल हाथों से..!
मैं छूना नहीं चाहती तुम्हें….
बस हवाओं की हर पुरवाई में
महसूस करना चाहती हूँ
बेहद करीब से…
तुम्हारे सुवास में
अपने अहसास को
ख़ुदा की इबादत की तरह
बोलो ना !!
आओगे ना तुम मुझसे मिलने…?💕
.
( आनंद सरिता )

बेटी-सूफी सुरेंद्र चतुर्वेदी

 

नसीबों को शाख़ों पे खिलती हैं बेटी,
मुक़द्दर भला हो तो मिलती हैं बेटी.
.
कभी बनके मैना, कभी बनके कोयल,
घरों आंगनों में उछलती हैं बेटी.
.
जमा करती सर्दी में, बारिश में बहतीं,
अगर गर्मियां हो पिघलती हैं बेटी.
.
जलें ना जलें, हैं चरागाँ तो बेटे,
मगर हो अँधेरा तो जलती हैं बेटी.
.
नहीं आग पीहर में लगती किसी के,
पति के ही घर में क्यूँ जलती हैं बेटी.
.
ज़मीं छोड़ देती, जड़ें साथ लातीं,
पुरानी ज़मीं जब बदलती हैं बेटी.
.
जो रोया पिता उसको समझाया माँ ने,
कहाँ उम्र भर साथ चलती हैं बेटी.
.
( सूफी सुरेंद्र चतुर्वेदी )

कहीं बीत न जाए वसंत-उमा त्रिलोक

उड़ते परिंदे के हाथ
भेज देना खत
लिख देना वही सब कुछ
जो नहीं कह पाए थे
उस दिन
अपनी नम आंखों से
भेज देना
घोल कर
नदी की कल कल में
वही गीत
जो गाया था तुम ने
उसी नदी के किनारे
मुझे मनाने को
दोहराना वह भी
जो कहते कहते रुक गए थे
उस दिन
जब किसी ने पूछ लिया था
एक अटपटा सा सवाल
हम दोनों के बारे में
भला
क्या कह कर,
समझाया था उसे, तुमने
टटोलना जेबों कोअपनी
पायोगे कुछ पड़े हुए सवाल
जो पूछे थे मैंने बहुत पहले, और
जो रख लिए थे तुमने,
यह कहकर
कि बताऊंगा बाद मे
लिख भेजना उन सबके जवाब
मगर
देखना
कहीं बीत न जाए वसंत
.
( उमा त्रिलोक )

तेरा शहर-उमा त्रिलोक

बहुत भीड़ है
तेरे शहर में
खूब सजे हैं बाज़ार
ठाठ बाठ है बहुत
भरी ऊंची दुकानों में
हो रही है जम कर
खरीददारी
सजी महिलाएं
रौबीले मर्द
हंसते खेलते बच्चे
मस्ती में हैं मस्त
कोई पैदल तो कोई
है स्कूटर पर सवार
लंबी लाइनों में रेंगती हैं
रंग बिरंगी कारें
यूं लगता है
समृद्धि ने अपने
सुनहरी पंख फैलाए हैं
मगर
कोने में एक बूढ़ी औरत
खड़ी है लिए कुछ
बेचने को गुब्बारे
रेड लाइट पर रुकती हैं जब कारें
भूख के हवाले से
बच्चे
पोछतें है शीशे कारों के
मांगते हैं पैसे
फुटपाथ पर बैठा है
बूट पालिश की पेटी लिए ; कोई
रोज़ी रोटी की आस में
ऐसा क्यों है कि
कोई है इतना समृद्ध ; तो कोई
इतना लाचार
प्रश्न चिन्ह
चस्पा है
निजाम के द्वार पर

.

( उमा त्रिलोक )