
आषाढ़,
तुमने ये क्या किया?
अमलतास के बदन से
पीली मोतियां छीन लीं!
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ज़मीन पर बिखरी
बारिस की बूंदों में लिपटी
धूल में सनी
ये पीली मोतियां
कितनी बेबस दिख रही हैं
.
मेरे अमलतास !
तुम अपने मौसम में
फिर खिलना
अपने यौवन को फिर पाना
.
आषाढ़ नहीं आ सकता
चैत, बैसाख और जेठ में
वरना तुम्हारे यौवन को देख
मचल जाता
.
फिर नहीं आती
पृथ्वी के हिस्से ये बारिस
.
मेरे अमलतास!
मैंने
तुम्हारी अनगिनत पीली मोतियां
अनगिनत प्रेमी जोड़ों के पास
संभाल के रख दी हैं
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तुम्हें मिट्टी होते
ये जोड़े नहीं देख सकते
.
( भानु प्रताप सिंह )