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  • वीर सावरकर के नाम-मनमीत सोनी

    हे कुल ऋषि सावरकर! सबसे पहले उसका प्रणाम स्वीकार कीजिये जो इस मातृभूमि के लिए अपना लहू बहा देना चाहता था लेकिन आप जैसे ऋषियों के कारण वह कलम की नीली स्याही से लिख रहा है : वन्दे मातरम! — यही सोचता था मैं कि नहीं हो सकता कोई दधीचि इस कलियुग में फिर मैंने…

  • सावरकर तुम वीर हो

    सावरकर तुम वीर हो,कालापानी के अंधकार में ध्रुव तारे-से प्रज्वलित थे।ज़ंजीरें तुम्हें बाँध न सकीं,अग्निमय हृदय रुकना जानता न था। .सागर की लहरों ने सुना तुम्हारा गीत,मातृभूमि के लिए जीवन था अर्पित।असह्य यातनाएँ, फिर भी शीश न झुका,देशभक्तों के इतिहास में तुम अमर और अक्षय हो। .कारागार की हर दीवार जानती है,कितने स्वप्न तुमने हृदय…

  • इन दिनों-सुजाता

    अलसाई सी अबोध कच्ची भोरअपनी झक्क सफेद चादर परअचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देखअसहज हो उठी थीऔर घबराकर तलाशने लगी थीवो घाव कि जिससे रिसा होगा वो… . ‘ये बिन घाव का रिसाव है,ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’टुकुर टुकुर आँख फाड़ेदेख रही थी तब वो,पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगातीबेरुखी और घबराहट…

  • नज़्म-उमा त्रिलोक

    बिन कहे जो कह सको तो कहो बिन पूछे ही, वह बात, बता सको तो बताओ जो किए ही नहीं तुम ने , वह वादे, हो सके तो निभाओ न हो यक़ी मेरा, मेरी बात का, तो चलो आज़मा लो कोई होगी मजबूरी उसकी, यूँ ही सोच, दिल को समझा लो बन गई हूँ पत्थरों…

  • कुछ दिन-रश्मि भारद्वाज

    कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं जब मेरी आँखों में तैर जाते हैं कामना के नीले रेशे लाल रक्त दौड़ता है दिमाग से लेकर पैरों के अँगूठे तक एक अनियन्त्रित ज्वार लावे-सा पिघल-पिघल कर बहता रहता है देह के जमे शिलाखण्ड से मैं उतार कर अपनी केंचुली समा देना चाहती हूँ ख़ुद को सख़्त चट्टानों…

  • मैं जो बोलती हूँ-मनीषा लक्ष्मीकांत जोशी

    मैं जो बोलती हूँ वह नहीं है मेरी भाषा क्योंकि वह हो सकती थी किसी और की जैसे कि कोई और बोल रहा है मेरी भाषा अभी कहीं किसी दूरदराज के शहर में। . जन्म के वक़्त मैं रोई थी किस भाषा में अब याद नहीं पर वही थी शायद मेरी भाषा। . प्रथम रुदन…

  • पेट्रोल, गैस और कामरेड-मनमीत सोनी

    आज सुबह बहुत ख़ुश था कामरेड . कह रहा था : . “युद्ध हो रहा है भाईसाहब युद्ध!” . मैंने कहा : . “तो”? . तो हँसी को दबाकरआवाज़ में गंभीरता का अभिनय करते हुए बोला : . “अब तो गया साला मोदी!” . मैंने पूछा : . “कैसे गया मोदी?” . तो उसने बातों…

  • જે ડરાવે છે-મંગલેશ ડબરાલ

    જે આપણને ડરાવે છે એ હંમેશા એમ કહેતો હોય ડરવા જેવી કોઈ વાત નથી હું કોઈને ડરાવતો નથી . જે આપણને ડરાવે છે એ હવામાં આંગળી ઊંચી કરીને કહે છે કોઈએ ડરવાની જરૂર નથી એ પોતાની મુઠ્ઠી ભીડીને હવામાં ઉલાળે છે અને પૂછે છે તમે ડરતા તો નથી ને . જે આપણને ડરાવે છે એ…

  • મિત્ર-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

    || મિત્ર || એ મિત્ર હતો એકનો એક પહેલી જાસુસી ચોપડી પહેલી સિગરેટ પહેલો ઝઘડો પહેલો પ્રેમ અમારું બધું સહિયારું હતું . હું વહેંચતો મારા દુઃખ એની સાથે કશું બોલ્યા વિના અને કશું બોલ્યા વિના સમજી પણ જતો એનો મૂંઝારો અને એનાં સપના . એની પાસેથી ઉછીના લીધેલા પૈસા ક્યારેય ભારરૂપ ન લાગતા દિલને અને…

  • કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

    કઈ હતી મારી માતૃભાષા ? ફળિયાની કોરે ઉગેલા ટમેટાંના લીલા છોડમાં અચાનક એક લાલ ટમેટું જોઈ હું બોલી ઊઠેલો પહેલીવાર ” અરે ! “ જે તોતડી ભાષામાં એ ? . અથવા પછી બધાં સપના જોયાં જે ભાષામાં એ અલ્લડ અને બાલિશ ઉંમરમાં એ ? . કે પછી જે ભાષામાં રમતાં રમતાં લડી પડતાં અમે નાના…

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