सपनों का जीवन-कविता कृष्णपल्लवी

कुछ भी नहीं होता दो बार।

हर घटना अकेली होती है और हर सपना भी।

दो बार वही प्यार नहीं होता।

पुराना प्यार यदि वापस भी लौटे तो वही नहीं रह जाता ।

वही चुम्बन दुहराया नहीं जाता ।

हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह, वह वही नहीं होती।

हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है ।

हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है।

हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में

वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता

और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर

वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है।

हम जिस देश-काल को जीते हैं वह अगले ही पल इतिहास हो जाता है।

लगातार किसी सपने का पीछा करने में ही जीवन है

धड़कता-थरथराता हुआ अविराम।

.

( कविता कृष्णपल्लवी )

.

|| સ્વપ્નનું જીવન ||

.

કશું પણ બે વાર ન થાય

દરેક ઘટના એકમેવ હોય

અને દરેક સ્વપ્ન પણ

બે વાર એનો એ પ્રેમ ન થાય

જૂનો પ્રેમ જો પાછો ફરે

તો એ એવો જ ન હોય

એક જ ચુંબન દોહરાવી ન શકાય

આપણે જ્યારે ફરી પહોંચીએ કોઈક જૂની જગાએ

એ એની એ ન હોય

દરેક વખતે વિરહ આગવી ઢબનો હોય

દર વખતનો છૂટા પડવાનો તરીકો અને મિજાજ નોખો હોય

દરેક ઉદઘોષ નવા કંઠેથી અભિનવ બની ફેલાય

જે આકાશમાં

એ વીતેલા સમયનું આકાશ નથી હોતું

અને જે ક્રાંતિ પુરાણી ક્રાંતિથી શીખીને ડગ માંડે છે ભૂમિ પર

એ ભૂમિ નવી હોય છે

અને ક્રાંતિને નવું સ્વરૂપ આપે છે

આપણે જે દેશકાળમાં જીવીએ છીએ

એ આગલી જ ક્ષણે ઇતિહાસમાં સમાઈ જાય છે

લગાતાર કોઈક સ્વપ્નનો પીછો કરવો

એ જ જીવન છે

ધબકતું – થરથરતું – અવિરામ..

.

( કવિતા કૃષ્ણપલ્લવી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

इंतज़ार भी अजीब होता है-मालिनी गौतम

इंतज़ार भी अजीब होता है

बिना आहट के दरवाज़े पर बैठा रहता है

न जाने किसके कदमों की आहट में

अपनी धड़कनें गिनता रहता है

सूनी पगडंडी पर उगी घास-सा लहराता है

हवा में झूमते पत्तों-सा

सरसराता है

कुछ दीप अधजले रह जाते हैं

कुछ ख़त अधूरे रह जाते हैं

कुछ बातें होंठों तक आकर ठहर जाती हैं

घड़ी की सुइयाँ चलती रहती हैं

मगर वक़्त वहीं ठहर जाता है

जिसे आना नहीं होता

इंतज़ार उसी का सबसे ज़्यादा होता है।

.

( मालिनी गौतम )

.

ઇંતેજારી પણ અજબ હોય છે

ચુપચાપ દરવાજે બેસી રહે છે

કોણ જાણે કોનાં પગરવની દિશામાં

પોતાના ધબકારા ગણતી રહે છે.

સૂકી પગદંડી પર ઊગેલા ઘાસની જેમ લહેરાય છે

હવામાં ઝૂમતાં પર્ણોની જેમ

ઝૂમે છે

કોઈ પ્રજ્વલિત દીવા અધૂરાં રહી જાય છે

કોઈ પત્રો અધૂરા રહી જાય છે

કોઈ વાત હોઠોં પર આવીને થીજી જાય છે

ઘડિયાળનાં કાંટા ફરતાં રહે છે

પરંતુ સમય ત્યાં જ થંભી ગયો છે

જેને નથી જ આવવું

તેની જ રાહ સૌથી વધારે જોવાય છે.

.

( માલિની ગૌતમ, અનુવાદ : બકુલા ઘાસવાલા )

तुम्हारे बारे में सोचते हुए-विनय सौरभ

एक दिन पाया कि

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए हैं

याद करना कुछ ख़ास करने

जैसा नहीं रह गया था

.

यह कोई सहायक क्रिया भी नहीं थी

तुम्हें बताना चाहता हूँ

कि वह शहर पूरी तरह बदल गया था

जो हमारी साँसों में बसता था

.

सारी चीज़ें हमेशा की

तरह बदल रही थीं

हमारे साथ बैठने की वह जगह भी

जो हम स्मृतियों में छोड़ आए!

.

मैंने दरबान से पूछा कि

यहाँ एक गुलमोहर भी हुआ करता था

जवाब में उसने कहा कि

आपको मिलना किससे है?

.

साइकिलें नहीं थीं!

वे मुझे बेहद शिद्दत से याद आईं

जो हॉस्टल की बाहरी दीवारों पर टिकी रहती थीं

बहुत तेज़ भागता प्रेम था यहाँ

.

और थोड़ा आक्रामक दिखता-सा,

असहजता बीते दिनों का क़िस्सा थी

क्या इत्मीनान से भरे थे हमारे दिन?

क्या हमारी यादों में उन दिनों की आशंकाएँ दर्ज हैं!

.

और क्या दुख की इबारतों के क़िस्से भी मिलेंगे वहाँ?

कहाँ जाएँ कि शक्लें

अब बदल चुकी हैं

और अच्छा हुआ कि

.

हम अपनी पुरानी डायरियाँ

भी कहीं रखकर भूल गए हैं..

.

( विनय सौरभ )

.

|| તારા વિષે વિચારતાં ||

.

તારા વિષે વિચારતાં

એક દિવસ ખબર પડી

કે એમ કરતાં વર્ષો વીતી ગયાં

એમ કરવામાં કશું ખાસ કરતો હોઉં એવું લાગતું પણ નહોતું

એ કોઈ મદદકારક પ્રક્રિયા પણ નહોતી

તને જણાવવા ઇચ્છું છું

કે એ શહેર પૂરેપૂરું બદલાઈ ગયું હતું

જે આપણા શ્વાસમાં વસતું

બધી ચીજો બદલાઈ રહી હતી

આપણે સાથે બેસતા એ જગા પણ

જે આપણે સ્મૃતિઓમાં છોડી આવ્યા

મેં ચોકીદારને પૂછ્યું કે

અહીં એક ગુલમહોરનું વૃક્ષ પણ હતું

જવાબમાં એણે કહ્યું કે

તમારે મળવું કોને છે ?

સાઈકલો નહોતી !

એ મને તીવ્રતાથી યાદ આવી

એ હોસ્ટેલ બહારની દિવાલના ટેકે પડી રહેતી

ત્યાં પ્રેમ ઝડપથી વિકસતો

અને થોડોક આક્રમક પણ લાગતો

અસહજતા વીતેલા દિવસોનો કિસ્સો હતી

શું નિરાંતના દિવસો હતા એ ?

શું આપણી સ્મૃતિઓમાં

એ દિવસોની આશંકાઓ દર્જ છે ?

અને શું દુઃખની લખાવટના કિસ્સા પણ હશે ત્યાં ?

ક્યાં જઈએ

કે આપણા રૂપરંગ બદલાઈ ચૂક્યા છે હવે

એટલું સારું

કે આપણી જૂની ડાયરીઓ પણ

ક્યાંક મુકાઈને

ભૂલાઈ ચૂકી છે !

.

( વિનય સૌરભ, હિન્દી પરથી ભાવાનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

माँ पद्मिनी : मनमीत के दस शब्द चित्र

1.

रत्नसिंह

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

तोता

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

अलाउद्दीन तक

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

लेकिन स्वरा भास्कर!

तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था!

.

2.

अलाउद्दीन!

पहचान सके

तो इन राख की ढेरियों में पहचान..

पद्मिनी की राख कौनसी है?

और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है?

.

3.

पद्मिनी

पानी से नहीं

आग से मुँह धोती थी

उसके होंठों पर

किसी लिपस्टिक का नहीं

बल्कि किसी लाल पत्थर का रंग था

वह रात के काले धागे से

अपना जूड़ा बाँधती थी

सूरज की बिंदिया

दमकती थी उसके माथे पर

चाँद उसका मांगटीका था

सितारे

उसकी पलकों के हिण्डोले में झूलते थे..

हिंजड़ों के साथ सोने वाला अलाउद्दीन –

पद्मिनी नाम की देवी के

पैरों की धूल के लायक़ भी नहीं था!

.

4.

अलाउद्दीन!

तू चित्तौड़ जीत सकता है

तू चित्तौड़ की स्त्रियों को नहीं जीत सकता!

.

5.

भगवान करे

कि पद्मिनी एक कल्पना का ही नाम हो –

इस भारत में

जो कहने को हमारा है –

यह देखा नहीं जाता

कि 1303 में जल चुकी एक औरत को

हर थोड़े बरसों में

फिर से जलाया जाता है!

.

6.

हे ईश्वर!

चिता में राख होऊं

तो माँ पद्मिनी की तरह राख होऊं..

और

शत्रुओं के चेहरों को

काला करने के काम आऊं!

.

7.

रत्नसिंह –

महाराजा था

महाराजा है

महाराजा ही रहेगा!

पद्मिनी –

महारानी थी

महारानी है

महारानी ही रहेगी!

अलाउद्दीन –

ग़ुलाम था

ग़ुलाम है

ग़ुलाम ही रहेगा!

.

8.

राख के घूंघट से

झाँक रही है

माँ पद्मिनी की कहानी

जिन आँखों में

आँसू हैं

और

दिल में दर्द

सिर्फ़ वही देख सकते हैं :

थोड़ा-सा घूंघट उठाकर!

.

9.

ओ मेरी पत्नी!

अगर कभी कोई दुश्मन मुझे जान से मार दे और तुम्हें गुलाम बनाना चाहे तो पद्मिनी की तरह आग में जल जाना मगर अपने बदन को छूने मत देना जिसे सिर्फ़ मैंने छुआ है!

लोग बहुत समझाएँगे

लोग बहुत भड़काएँगे

लेकिन कुछ भी मत समझना

लेकिन बिलकुल मत भड़कना

मरने के बाद

हम दोनों

मेरे दिल की उस आग के फूलों से महकते कमरे में

ज़रूर मिलेंगे –

जो हमारे प्यार की रगड़क से पैदा हुई थी!

ओ मेरी पत्नी!

.

10.

मरने के बाद

अलाउद्दीन

बहत्तर हूरों के पास गया या नहीं गया..

नहीं पता!

लेकिन चित्तौड़ के

उस पद्मिनी महल में

जो एक तालाब के बीचों-बीच बना है

पर्यटकों की दुआएँ

रत्नसिंह को दूल्हा बनाकर

रोज़ अपनी पद्मिनी के पास भेजती हैं…

इतिहास!

होना क्या होता है

और

बनाना क्या होता है…

यह बात कोई राजपूतों से सीखे!

.

( मनमीत सोनी )

जिस तट पर-बुद्धिसेन शर्मा

जिस तट पर प्यास बुझाने से

अपमान प्यास का होता हो‚

उस तट पर प्यास बुझाने से

प्यासा मर जाना बेहतर है।

.

जब आंधी‚ नाव डुबो देने की

अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚

हर एक लहर जब नागिन बनकर

डसने को फन फैलाए‚

ऐसे में भीख किनारों की

मांगना धार से ठीक नहीं‚

पागल तूफानों को बढ़कर

आवाज लगाना बेहतर है।

.

कांटे तो अपनी आदत के

अनुसार नुकीले होते हैं‚

कुछ फूल मगर कांटों से भी

ज्यादा जहरीले होते हैं‚

जिनको माली आंखें मीचे‚

मधु के बदले विष से सींचे‚

ऐसी डाली पर खिलने से

पहले मुरझाना बेहतर है।

.

जो दिया उजाला दे न सके

तम के चरणों का दास रहे

अंधियारी रातोमें सोये

दिन में सूरज के पास रहे

जो केवल धुआं उगलता हो

सूरज पर कालिख मलता हो

ऐसे दीपक का जलने से पहले

बुझ जाना बेहतर है।

.

( बुद्धिसेन शर्मा )

वीर सावरकर के नाम-मनमीत सोनी

हे कुल ऋषि सावरकर!

सबसे पहले उसका प्रणाम स्वीकार कीजिये

जो इस मातृभूमि के लिए

अपना लहू बहा देना चाहता था

लेकिन आप जैसे ऋषियों के कारण

वह कलम की नीली स्याही से लिख रहा है :

वन्दे मातरम!

—

यही सोचता था मैं

कि नहीं हो सकता कोई दधीचि इस कलियुग में

फिर मैंने जाना तुम्हारे बारे में

और अब मुझे कभी कभी महसूस होता है

कि यह भव्य संसद

कि यह भव्य मंदिर

कि यह भव्य उद्घोष

केवल तुम्हारे कारण संभव हुआ

ओ युग ऋषि!

—

भूल ही गए थे हम

कि हम कौन हैं

तुमने मछलियों की आंतों से खेलते हुए

उस सतही वैष्णव को बताया :

“चरखे के सूत से नहीं

शरीर के रक्त से मिलेगी स्वतन्त्रता”

भूल ही गए थे हम

कि इन्हीं मंदिरों में

अनुमति थी शूद्र को प्रवेश की

लेकिन हमारे अपवित्र हृदय ने

बाँध दी उनके पाँव में बेड़ियाँ

तुम्हीं ने दी उन्हें मुक्ति

यह अलग बात है

श्रेय कोई और ले गया!

—

एक हाथ में बंदूक

दूसरे हाथ में लिए कलम लिए

यह तुम ही थे

जिसने नाक में नाथ ली थी

बैलों की जंजीर

जिसने निकाला था

नारियल और सरसों का तेल

लेकिन स्वतंत्र भारत का जश्न उन्होंने मनाया

जिन्हें केवल एक दिन जागना पड़ा मध्य रात्रि तक –

और वे

“ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” कहकर

एक लम्बी पश्चिमी नींद में सो गए!

—

हे कुलवंत!

यह तुम्हीं थे

जो गटर को साफ़ करने के लिए

गटर में कूद गए थे

यह तुम्हीं थे

कि जिसने दीवारों के चूने से मांजे दाँत

यह तुम्हीं थे

कि जिसकी थाली में

रोटियों और दाल में कंकर थे

वरना तो यह वह समय था

कि बकरी का दूध, एलोवीरा, तुलसी और नीम की पत्तियाँ और हल्दी और न जाने क्या-क्या परोसी हुई सबसे महंगी थाली जीमता था

एक नंगा फ़क़ीर!

—

कितना मीठा होता है

सुविधा की चारदीवारी में

अपने स्वाद की रक्षा करते हुए

दुश्मनों को कोसना

और उन्हें दोस्त भी कहना!

—

हे क्रांतिवीर!

दो – दो आजन्म कारावास का दंड लिए

तुम लिखते रहे हमारा इतिहास

करते रहे शोध पर शोध

लिखते रहे गीत पर गीत

किसी ने नहीं संभाला तुम्हें

तुम्हारी ख़ाली आंतों में

तेज़ाब की तरह घुलता रहा

किसी का प्रायोजित अनशन

किसी ने नहीं सुना तुम्हारा सच –

अकेले रहे मृत्यु तक तुम

अकेली ही मृत्यु चुनी तुमने

कि मेरे पास शब्द नहीं है

इस प्रायश्चित के लिए

मैं तोड़ देना चाहता हूँ यह कलम!

—

हे युगदृष्टा!

अपने इतिहास बोध से रिक्त

यह हिन्दू समाज

नतमस्तक है तुम्हारे आगे

वंदन करता है तुम्हारा

कि जितने भी फूल उछाले गए हैं

पिछले एक दशक में

सब तुम पर गिर रहे हैं

वीर सावरकर!

—

जिनके कुत्सित प्रयासों से

रक्त में भीगी है

विश्व की सत्तर प्रतिशत भूमि

तुम उनसे

एक जनेऊ

एक तिलक

एक गीता

एक बंदूक के सहारे भिड़ गए –

जो काम

अमेरिका तक नहीं कर सका

वह तुमने अकेले किया

और तुम्हारा मूल्यांकन यह हुआ –

कि तुम एक “माफ़ीवीर” हो!

—

थूकता हूँ उन पर

जो कहते हैं तुम्हें माफ़ीवीर

यह वही हैं

बचपन में जिनकी पेंट

अपने बाप के डर से गीली हुई

और जवानी में

इन्हें रंडुओं की तरह रुलाया

इनकी प्रेमिकाओं ने!

एयर कंडीशन रूम में बैठकर

स्टेटमेंट देने वाले

सिगरेट की चिंगारी तक से

जिनकी तशरीफ़ फट जाती है

और जो दो पेग के बाद

भूल जाते हैं नौकरानी और बीवी में फ़र्क़ :

अब वे सिखाएंगे हमें?

मातृभूमि के लिए अडिग कैसे रहा जाता है!

—

हे वंदनीय!

अपनी कलम से लिखता हूँ

अपनी आत्मा के स्टाम्प पेपर पर

कि हिन्दू हूँ, था और रहूँगा!

हस्ताक्षर करता हूँ

अपने ही सूने ललाट पर

कि मैं अपने माता-पिता से पहले

इस मातृभूमि का पुत्र हूँ

लानत भेजता हूँ

उन कमीनों पर

जो गले में लटकाए हैं रुद्राक्ष की माला

लेकिन जिनका लिंग

बचपन में ही छीला जा चुका है

फिर बुलंद करता हूँ

हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान का नारा

आवाज़ देता हूँ

सौ करोड़ लोगों को

कि गर्व से कहो तुम हिन्दू हो

प्रण लेता हूँ

कि नहीं झुकेगी यह कलम

अभी बहुत दूर तक जाएगी

यह नाप लेगी सारे भारत को

यह वह बुझी हुई अलख जगाएगी :

जो हर बार जागती है

लेकिन फिर से सो जाती है!

—

हे शापित गंधर्व!

मेरे शरीर में

उसी तरह प्रवेश करो

जिस तरह जीण माता करती है प्रवेश

मेरी दादी के शरीर में –

कि मैं ‘मनमीत’

बस एक बार महसूस करना चाहता हूँ

वह गर्म लावा

जिसने बनाया तुम्हें

अखंड ज्योत वाला ज्वालामुखी!

.

( मनमीत सोनी )

सावरकर तुम वीर हो

सावरकर तुम वीर हो,
कालापानी के अंधकार में ध्रुव तारे-से प्रज्वलित थे।
ज़ंजीरें तुम्हें बाँध न सकीं,
अग्निमय हृदय रुकना जानता न था।

.
सागर की लहरों ने सुना तुम्हारा गीत,
मातृभूमि के लिए जीवन था अर्पित।
असह्य यातनाएँ, फिर भी शीश न झुका,
देशभक्तों के इतिहास में तुम अमर और अक्षय हो।

.
कारागार की हर दीवार जानती है,
कितने स्वप्न तुमने हृदय में संजोए थे।
कालापानी की वह एकाकी रात,
आज भी जगाती है स्वतंत्रता की प्रभात।

.
त्याग, तपस्या और संघर्ष का दीप,
आज भी जलता है तुम्हारी अमर सृष्टि का नीरव दीप।
हे स्वातंत्र्यवीर, तुम्हारा वह आह्वान—
आज भी जागृत करता है भारतभूमि की आत्मा।

.
तुम्हारी जन्मजयंती पर शत-शत प्रणाम,
जिसने असंख्य कष्टों में भी कभी मस्तक नहीं झुकाया,
उस अग्निपुरुष को कोटि-कोटि नमन।”

.

( अज्ञात )

इन दिनों-सुजाता

अलसाई सी अबोध कच्ची भोर
अपनी झक्क सफेद चादर पर
अचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देख
असहज हो उठी थी
और घबराकर तलाशने लगी थी
वो घाव कि जिससे रिसा होगा वो…

.

‘ये बिन घाव का रिसाव है,
ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’
टुकुर टुकुर आँख फाड़े
देख रही थी तब वो,
पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगाती
बेरुखी और घबराहट से तरबतर
किसी नितांत अजनबी स्वर में बड़बड़ाती
अपनी ही माँ को.
वह बूझ नहीं पाई थी
माँ की एक भी बात.

.

फिर तो वही अदृश्य घाव
जब कभी बेवक्त उपस्थिति दर्ज कराता
तब माँ अनायास बिफर पड़ती
‘कमबख्त ,किसी ने देखा तो नहीं न ?’
और जब कभी तय वक्त पर न लगा,
तब माँ की आशंकित नज़रें
बेंध डालती उसका मन
‘कुलमुंही कहां गई थी ?’
सिहर कर काँप उठता अबोध का तन.
समझ नहीं पाती इन सब तानों
और दिन रात कानों में पड़ते
इन लांछनों के मायने.

.

विवाह बाद इस अदृश्य घाव ने
जब एक बार तय वक्त पर न रिसकर
बना दिया था उसे नौ महीनों की महारानी,
तब पहली बार उसे बहुत लाड़ आया था
अपना स्त्री होना उस दिन बहुत भाया था
गर्व से मुस्कुराकर वो कच्ची भोर
एकदम चटक दोपहरी सी खिल उठी थी.
स्त्री जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार
वही अदृश्य घाव
उसकी देह में ममता के जिस बीज को
बरसों बरस सींचता रहा
वह घना वृक्ष बन
उसकी गोद में दो फूल रख
उसे हरी कर गया.

.

समय बीता और दोपहर की साँझ ढलते
ठहर गया था उस अदृश्य घाव का रिसाव,
देह के भीतर हरियाला वृक्ष सूखने लगा था,
सींचने को नेह न बचा होगा.
उसे लगा जैसे उसके साथ ही
उसका वजूद भी सूख गया .
एक अदृश्य घाव जिसके होने से
वो पहचानी गई ,
नए घर में जानी गई
वही घाव तो उसका अपना था,
अब उसका न होना
मानो कोई रीता सपना था ,
उसे पूर्णता प्रदान कर चला गया था,
अब उसकी देह ठूंठ बन
जीवन की दोचारियों से झुलसते
परिवार को ठंडी छाया देने की
जद्दोजहद में लगी रहती है…..
‘वह यूं है तो तुम हो !
तुम हो कि उसे,
अपवित्र कहते हो!’

.

मेन्स्ट्रुएशन हाइजीन डे हर साल 28 मई को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य मासिक धर्म यानी पीरियड्स से जुड़ी समाज की विचारधारा को बदलना है।

.
मई महीने की 28 तारीख को इसलिए चुना गया, क्योंकि महिलाओं में मासिक घर्म का चक्र 28 दिन का होता है।
आज भी इस चक्र से गुजरने के दौरान महिलाओं को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है।

.

आज भी महिलाओं को इन दिनों में अपवित्र समझ कर पूजा,रसोई आदि जैसे स्थानों से दूर रखा जाता है.
आज भी न जाने कितनी ही महिलाओं के लिए हर माह
सैनिटरी पैड मंगवाना या स्वयं खरीद कर लाना और फिर इस्तेमाल के बाद छिपाते हुए फैंकना एक जीने मरने जैसा प्रश्न बना रहता है।

.

इस चक्र के दौरान एक महिला के साथ उतना ही सामान्य व्यवहार होना चाहिए जितना अन्य दिनों में !
क्योंकि उन दिनों में तो उसके शरीर में होने वाली पीड़ा और मूड स्विंग्स स्वयं ही उसके लिए परेशानी का सबब
बने रहने के लिए काफी हैं ।

.

हर पुरुष से प्रार्थना है कि अपनी बहन, माँ, दोस्त या अन्य किसी महिला को कभी इस चक्र के दौरान किसी भी परिस्थिति में मायूस पाएं तो परेशानी साझा करें उनकी।

.

सच में जिस दिन वह अपने पिता, भाई, बेटे से इस विषय पर खुलकर वैसे ही बात सकेगी जैसे मामूली से सिर दर्द में करती है तो समझना आजाद है वो ।

.

( सुजाता )

नज़्म-उमा त्रिलोक

बिन कहे जो कह सको

तो कहो

बिन पूछे ही, वह बात, बता सको

तो बताओ

जो किए ही नहीं तुम ने , वह वादे, हो सके

तो निभाओ

न हो यक़ी मेरा, मेरी बात का, तो चलो

आज़मा लो

कोई होगी मजबूरी उसकी, यूँ ही सोच, दिल

को समझा लो

बन गई हूँ पत्थरों में पत्थर, आओ, इक बार

आके रुला दो

खता थी वह मेरी कि मजबूरी, जो भी, हो सके

तो भुला दो

भुला कर नाफरमानियाँ मेरी ,जो लगा सको

तो गले लगा लो

.

( उमा त्रिलोक )

कुछ दिन-रश्मि भारद्वाज

कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं

जब मेरी आँखों में तैर जाते हैं कामना के नीले रेशे

लाल रक्त दौड़ता है दिमाग से लेकर

पैरों के अँगूठे तक

एक अनियन्त्रित ज्वार

लावे-सा पिघल-पिघल कर बहता रहता है

देह के जमे शिलाखण्ड से

मैं उतार कर अपनी केंचुली

समा देना चाहती हूँ ख़ुद को

सख़्त चट्टानों के बीच

इतने क़रीब कि वह सोख ले मेरा उद्दाम ज्वर

मेरा सारा अवसाद

मेरी सारी लालसा

और मैं समेट लूँ ख़ुद में उसका सारा पथरीलापन

ताकि खिल सके नरम फूल और किलकती कोमल दूब

कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं

जब भूल कर और सब कुछ

मैं बन जाती हूँ सिर्फ़ एक औरत

अपनी देह से बँधी

अपनी देह से निकलने को आतुर

चाहना के उस बन्द द्वार पर दस्तक देती

जहाँ मेरे लिए अपनी मर्ज़ी से प्रवेश वर्जित है ..

.

( रश्मि भारद्वाज )

|| અમુક દિવસ ||

કેટલાંક દિવસ ખૂબ આકરા હોય

જ્યારે મારી આંખોમાં ઉભરી આવે લાલસાના ભૂરા રેસા

લાલ રક્ત દોડે મગજથી માંડી

પગના અંગૂઠા લગી

એક વણથંભ્યુ પૂર જાણે લાવા જેમ પીગળી – પીગળીને વહેતું રહે

દેહના થીજેલ શિલાખંડમાં

હું મારી કાંચળી ઉતારી

સ્વયંને સમાવી દેવા ઇચ્છું છું

કાળમીંઢ શિલાઓ મધ્યે

એટલું ઊંડે કે એ શોષી લે

મારો સમગ્ર અવસાદ

મારી સંપૂર્ણ લાલસા

અને હું સ્વયંમાં સમેટી લઉ

એની સમગ્ર પાષાણતા

જેથી ખીલી શકે મુલાયમ પુષ્પ

અને ઉદ્દામ નરમ ઘાસ

અમુક દિવસો ખૂબ આકરાં હોય

જ્યારે બીજું બધું વિસરીને

હું બની જાઉં છું માત્ર એક સ્ત્રી

પોતાના દેહ સંગે બંધાયેલી

પોતાના દેહમાંથી ભાગી છૂટવા આતુર

ચાહનાના એ બંધ દ્વારે ટકોરા દેતી

જ્યાં મારા માટે

મારી મરજી મુજબ

પ્રવેશ વર્જ્ય છે…

( રશ્મિ ભારદ્વાજ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )