
सावरकर तुम वीर हो,
कालापानी के अंधकार में ध्रुव तारे-से प्रज्वलित थे।
ज़ंजीरें तुम्हें बाँध न सकीं,
अग्निमय हृदय रुकना जानता न था।
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सागर की लहरों ने सुना तुम्हारा गीत,
मातृभूमि के लिए जीवन था अर्पित।
असह्य यातनाएँ, फिर भी शीश न झुका,
देशभक्तों के इतिहास में तुम अमर और अक्षय हो।
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कारागार की हर दीवार जानती है,
कितने स्वप्न तुमने हृदय में संजोए थे।
कालापानी की वह एकाकी रात,
आज भी जगाती है स्वतंत्रता की प्रभात।
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त्याग, तपस्या और संघर्ष का दीप,
आज भी जलता है तुम्हारी अमर सृष्टि का नीरव दीप।
हे स्वातंत्र्यवीर, तुम्हारा वह आह्वान—
आज भी जागृत करता है भारतभूमि की आत्मा।
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तुम्हारी जन्मजयंती पर शत-शत प्रणाम,
जिसने असंख्य कष्टों में भी कभी मस्तक नहीं झुकाया,
उस अग्निपुरुष को कोटि-कोटि नमन।”
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( अज्ञात )