इन दिनों-सुजाता

अलसाई सी अबोध कच्ची भोर
अपनी झक्क सफेद चादर पर
अचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देख
असहज हो उठी थी
और घबराकर तलाशने लगी थी
वो घाव कि जिससे रिसा होगा वो…

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‘ये बिन घाव का रिसाव है,
ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’
टुकुर टुकुर आँख फाड़े
देख रही थी तब वो,
पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगाती
बेरुखी और घबराहट से तरबतर
किसी नितांत अजनबी स्वर में बड़बड़ाती
अपनी ही माँ को.
वह बूझ नहीं पाई थी
माँ की एक भी बात.

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फिर तो वही अदृश्य घाव
जब कभी बेवक्त उपस्थिति दर्ज कराता
तब माँ अनायास बिफर पड़ती
‘कमबख्त ,किसी ने देखा तो नहीं न ?’
और जब कभी तय वक्त पर न लगा,
तब माँ की आशंकित नज़रें
बेंध डालती उसका मन
‘कुलमुंही कहां गई थी ?’
सिहर कर काँप उठता अबोध का तन.
समझ नहीं पाती इन सब तानों
और दिन रात कानों में पड़ते
इन लांछनों के मायने.

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विवाह बाद इस अदृश्य घाव ने
जब एक बार तय वक्त पर न रिसकर
बना दिया था उसे नौ महीनों की महारानी,
तब पहली बार उसे बहुत लाड़ आया था
अपना स्त्री होना उस दिन बहुत भाया था
गर्व से मुस्कुराकर वो कच्ची भोर
एकदम चटक दोपहरी सी खिल उठी थी.
स्त्री जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार
वही अदृश्य घाव
उसकी देह में ममता के जिस बीज को
बरसों बरस सींचता रहा
वह घना वृक्ष बन
उसकी गोद में दो फूल रख
उसे हरी कर गया.

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समय बीता और दोपहर की साँझ ढलते
ठहर गया था उस अदृश्य घाव का रिसाव,
देह के भीतर हरियाला वृक्ष सूखने लगा था,
सींचने को नेह न बचा होगा.
उसे लगा जैसे उसके साथ ही
उसका वजूद भी सूख गया .
एक अदृश्य घाव जिसके होने से
वो पहचानी गई ,
नए घर में जानी गई
वही घाव तो उसका अपना था,
अब उसका न होना
मानो कोई रीता सपना था ,
उसे पूर्णता प्रदान कर चला गया था,
अब उसकी देह ठूंठ बन
जीवन की दोचारियों से झुलसते
परिवार को ठंडी छाया देने की
जद्दोजहद में लगी रहती है…..
‘वह यूं है तो तुम हो !
तुम हो कि उसे,
अपवित्र कहते हो!’

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मेन्स्ट्रुएशन हाइजीन डे हर साल 28 मई को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य मासिक धर्म यानी पीरियड्स से जुड़ी समाज की विचारधारा को बदलना है।

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मई महीने की 28 तारीख को इसलिए चुना गया, क्योंकि महिलाओं में मासिक घर्म का चक्र 28 दिन का होता है।
आज भी इस चक्र से गुजरने के दौरान महिलाओं को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है।

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आज भी महिलाओं को इन दिनों में अपवित्र समझ कर पूजा,रसोई आदि जैसे स्थानों से दूर रखा जाता है.
आज भी न जाने कितनी ही महिलाओं के लिए हर माह
सैनिटरी पैड मंगवाना या स्वयं खरीद कर लाना और फिर इस्तेमाल के बाद छिपाते हुए फैंकना एक जीने मरने जैसा प्रश्न बना रहता है।

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इस चक्र के दौरान एक महिला के साथ उतना ही सामान्य व्यवहार होना चाहिए जितना अन्य दिनों में !
क्योंकि उन दिनों में तो उसके शरीर में होने वाली पीड़ा और मूड स्विंग्स स्वयं ही उसके लिए परेशानी का सबब
बने रहने के लिए काफी हैं ।

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हर पुरुष से प्रार्थना है कि अपनी बहन, माँ, दोस्त या अन्य किसी महिला को कभी इस चक्र के दौरान किसी भी परिस्थिति में मायूस पाएं तो परेशानी साझा करें उनकी।

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सच में जिस दिन वह अपने पिता, भाई, बेटे से इस विषय पर खुलकर वैसे ही बात सकेगी जैसे मामूली से सिर दर्द में करती है तो समझना आजाद है वो ।

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( सुजाता )

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