वीर सावरकर के नाम-मनमीत सोनी

हे कुल ऋषि सावरकर!

सबसे पहले उसका प्रणाम स्वीकार कीजिये

जो इस मातृभूमि के लिए

अपना लहू बहा देना चाहता था

लेकिन आप जैसे ऋषियों के कारण

वह कलम की नीली स्याही से लिख रहा है :

वन्दे मातरम!

यही सोचता था मैं

कि नहीं हो सकता कोई दधीचि इस कलियुग में

फिर मैंने जाना तुम्हारे बारे में

और अब मुझे कभी कभी महसूस होता है

कि यह भव्य संसद

कि यह भव्य मंदिर

कि यह भव्य उद्घोष

केवल तुम्हारे कारण संभव हुआ

ओ युग ऋषि!

भूल ही गए थे हम

कि हम कौन हैं

तुमने मछलियों की आंतों से खेलते हुए

उस सतही वैष्णव को बताया :

“चरखे के सूत से नहीं

शरीर के रक्त से मिलेगी स्वतन्त्रता”

भूल ही गए थे हम

कि इन्हीं मंदिरों में

अनुमति थी शूद्र को प्रवेश की

लेकिन हमारे अपवित्र हृदय ने

बाँध दी उनके पाँव में बेड़ियाँ

तुम्हीं ने दी उन्हें मुक्ति

यह अलग बात है

श्रेय कोई और ले गया!

एक हाथ में बंदूक

दूसरे हाथ में लिए कलम लिए

यह तुम ही थे

जिसने नाक में नाथ ली थी

बैलों की जंजीर

जिसने निकाला था

नारियल और सरसों का तेल

लेकिन स्वतंत्र भारत का जश्न उन्होंने मनाया

जिन्हें केवल एक दिन जागना पड़ा मध्य रात्रि तक –

और वे

“ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” कहकर

एक लम्बी पश्चिमी नींद में सो गए!

हे कुलवंत!

यह तुम्हीं थे

जो गटर को साफ़ करने के लिए

गटर में कूद गए थे

यह तुम्हीं थे

कि जिसने दीवारों के चूने से मांजे दाँत

यह तुम्हीं थे

कि जिसकी थाली में

रोटियों और दाल में कंकर थे

वरना तो यह वह समय था

कि बकरी का दूध, एलोवीरा, तुलसी और नीम की पत्तियाँ और हल्दी और न जाने क्या-क्या परोसी हुई सबसे महंगी थाली जीमता था

एक नंगा फ़क़ीर!

कितना मीठा होता है

सुविधा की चारदीवारी में

अपने स्वाद की रक्षा करते हुए

दुश्मनों को कोसना

और उन्हें दोस्त भी कहना!

हे क्रांतिवीर!

दो – दो आजन्म कारावास का दंड लिए

तुम लिखते रहे हमारा इतिहास

करते रहे शोध पर शोध

लिखते रहे गीत पर गीत

किसी ने नहीं संभाला तुम्हें

तुम्हारी ख़ाली आंतों में

तेज़ाब की तरह घुलता रहा

किसी का प्रायोजित अनशन

किसी ने नहीं सुना तुम्हारा सच –

अकेले रहे मृत्यु तक तुम

अकेली ही मृत्यु चुनी तुमने

कि मेरे पास शब्द नहीं है

इस प्रायश्चित के लिए

मैं तोड़ देना चाहता हूँ यह कलम!

हे युगदृष्टा!

अपने इतिहास बोध से रिक्त

यह हिन्दू समाज

नतमस्तक है तुम्हारे आगे

वंदन करता है तुम्हारा

कि जितने भी फूल उछाले गए हैं

पिछले एक दशक में

सब तुम पर गिर रहे हैं

वीर सावरकर!

जिनके कुत्सित प्रयासों से

रक्त में भीगी है

विश्व की सत्तर प्रतिशत भूमि

तुम उनसे

एक जनेऊ

एक तिलक

एक गीता

एक बंदूक के सहारे भिड़ गए –

जो काम

अमेरिका तक नहीं कर सका

वह तुमने अकेले किया

और तुम्हारा मूल्यांकन यह हुआ –

कि तुम एक “माफ़ीवीर” हो!

थूकता हूँ उन पर

जो कहते हैं तुम्हें माफ़ीवीर

यह वही हैं

बचपन में जिनकी पेंट

अपने बाप के डर से गीली हुई

और जवानी में

इन्हें रंडुओं की तरह रुलाया

इनकी प्रेमिकाओं ने!

एयर कंडीशन रूम में बैठकर

स्टेटमेंट देने वाले

सिगरेट की चिंगारी तक से

जिनकी तशरीफ़ फट जाती है

और जो दो पेग के बाद

भूल जाते हैं नौकरानी और बीवी में फ़र्क़ :

अब वे सिखाएंगे हमें?

मातृभूमि के लिए अडिग कैसे रहा जाता है!

हे वंदनीय!

अपनी कलम से लिखता हूँ

अपनी आत्मा के स्टाम्प पेपर पर

कि हिन्दू हूँ, था और रहूँगा!

हस्ताक्षर करता हूँ

अपने ही सूने ललाट पर

कि मैं अपने माता-पिता से पहले

इस मातृभूमि का पुत्र हूँ

लानत भेजता हूँ

उन कमीनों पर

जो गले में लटकाए हैं रुद्राक्ष की माला

लेकिन जिनका लिंग

बचपन में ही छीला जा चुका है

फिर बुलंद करता हूँ

हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान का नारा

आवाज़ देता हूँ

सौ करोड़ लोगों को

कि गर्व से कहो तुम हिन्दू हो

प्रण लेता हूँ

कि नहीं झुकेगी यह कलम

अभी बहुत दूर तक जाएगी

यह नाप लेगी सारे भारत को

यह वह बुझी हुई अलख जगाएगी :

जो हर बार जागती है

लेकिन फिर से सो जाती है!

हे शापित गंधर्व!

मेरे शरीर में

उसी तरह प्रवेश करो

जिस तरह जीण माता करती है प्रवेश

मेरी दादी के शरीर में –

कि मैं ‘मनमीत’

बस एक बार महसूस करना चाहता हूँ

वह गर्म लावा

जिसने बनाया तुम्हें

अखंड ज्योत वाला ज्वालामुखी!

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( मनमीत सोनी )

इन दिनों-सुजाता

अलसाई सी अबोध कच्ची भोर
अपनी झक्क सफेद चादर पर
अचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देख
असहज हो उठी थी
और घबराकर तलाशने लगी थी
वो घाव कि जिससे रिसा होगा वो…

.

‘ये बिन घाव का रिसाव है,
ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’
टुकुर टुकुर आँख फाड़े
देख रही थी तब वो,
पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगाती
बेरुखी और घबराहट से तरबतर
किसी नितांत अजनबी स्वर में बड़बड़ाती
अपनी ही माँ को.
वह बूझ नहीं पाई थी
माँ की एक भी बात.

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फिर तो वही अदृश्य घाव
जब कभी बेवक्त उपस्थिति दर्ज कराता
तब माँ अनायास बिफर पड़ती
‘कमबख्त ,किसी ने देखा तो नहीं न ?’
और जब कभी तय वक्त पर न लगा,
तब माँ की आशंकित नज़रें
बेंध डालती उसका मन
‘कुलमुंही कहां गई थी ?’
सिहर कर काँप उठता अबोध का तन.
समझ नहीं पाती इन सब तानों
और दिन रात कानों में पड़ते
इन लांछनों के मायने.

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विवाह बाद इस अदृश्य घाव ने
जब एक बार तय वक्त पर न रिसकर
बना दिया था उसे नौ महीनों की महारानी,
तब पहली बार उसे बहुत लाड़ आया था
अपना स्त्री होना उस दिन बहुत भाया था
गर्व से मुस्कुराकर वो कच्ची भोर
एकदम चटक दोपहरी सी खिल उठी थी.
स्त्री जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार
वही अदृश्य घाव
उसकी देह में ममता के जिस बीज को
बरसों बरस सींचता रहा
वह घना वृक्ष बन
उसकी गोद में दो फूल रख
उसे हरी कर गया.

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समय बीता और दोपहर की साँझ ढलते
ठहर गया था उस अदृश्य घाव का रिसाव,
देह के भीतर हरियाला वृक्ष सूखने लगा था,
सींचने को नेह न बचा होगा.
उसे लगा जैसे उसके साथ ही
उसका वजूद भी सूख गया .
एक अदृश्य घाव जिसके होने से
वो पहचानी गई ,
नए घर में जानी गई
वही घाव तो उसका अपना था,
अब उसका न होना
मानो कोई रीता सपना था ,
उसे पूर्णता प्रदान कर चला गया था,
अब उसकी देह ठूंठ बन
जीवन की दोचारियों से झुलसते
परिवार को ठंडी छाया देने की
जद्दोजहद में लगी रहती है…..
‘वह यूं है तो तुम हो !
तुम हो कि उसे,
अपवित्र कहते हो!’

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मेन्स्ट्रुएशन हाइजीन डे हर साल 28 मई को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य मासिक धर्म यानी पीरियड्स से जुड़ी समाज की विचारधारा को बदलना है।

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मई महीने की 28 तारीख को इसलिए चुना गया, क्योंकि महिलाओं में मासिक घर्म का चक्र 28 दिन का होता है।
आज भी इस चक्र से गुजरने के दौरान महिलाओं को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है।

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आज भी महिलाओं को इन दिनों में अपवित्र समझ कर पूजा,रसोई आदि जैसे स्थानों से दूर रखा जाता है.
आज भी न जाने कितनी ही महिलाओं के लिए हर माह
सैनिटरी पैड मंगवाना या स्वयं खरीद कर लाना और फिर इस्तेमाल के बाद छिपाते हुए फैंकना एक जीने मरने जैसा प्रश्न बना रहता है।

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इस चक्र के दौरान एक महिला के साथ उतना ही सामान्य व्यवहार होना चाहिए जितना अन्य दिनों में !
क्योंकि उन दिनों में तो उसके शरीर में होने वाली पीड़ा और मूड स्विंग्स स्वयं ही उसके लिए परेशानी का सबब
बने रहने के लिए काफी हैं ।

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हर पुरुष से प्रार्थना है कि अपनी बहन, माँ, दोस्त या अन्य किसी महिला को कभी इस चक्र के दौरान किसी भी परिस्थिति में मायूस पाएं तो परेशानी साझा करें उनकी।

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सच में जिस दिन वह अपने पिता, भाई, बेटे से इस विषय पर खुलकर वैसे ही बात सकेगी जैसे मामूली से सिर दर्द में करती है तो समझना आजाद है वो ।

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( सुजाता )

मैं जो बोलती हूँ-मनीषा लक्ष्मीकांत जोशी

मैं जो बोलती हूँ

वह नहीं है मेरी भाषा

क्योंकि वह हो सकती थी किसी और की

जैसे कि कोई और बोल रहा है मेरी भाषा अभी

कहीं किसी दूरदराज के शहर में।

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जन्म के वक़्त

मैं रोई थी किस भाषा में

अब याद नहीं

पर वही थी शायद मेरी भाषा।

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प्रथम रुदन की भाषा से अलग होकर

जीती रही हूँ मैं हमेशा से

पर अब मुझे डर है

अचानक किसी सुबह उठकर

मैं बोलने लगूँगी वह अनजान भाषा

किसी ऐसे देश की

जिसकी भूमि पर

मैंने कभी नहीं रखे हैं पाँव।

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मेरे घर के पालतू पक्षी को

कुछ नए शब्द सिखाते हुए

अक्सर मैं भूल जाती हूँ मेरी अपनी भाषा

और वह अब बोलने लगा है

अपने ही किसी और जन्म की भाषा।

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मेरे घर में बोलता रहता है एक पक्षी

कभी किसी वन्य प्राणी की भाषा

तो कभी किसी समुद्री जीव की भाषा।

मैं सुन रही हूँ

उसका प्रथम रुदन।

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( मनीषा लक्ष्मीकांत जोशी )

॥ मेमनों से कोई नहीं करता प्यार ॥-राजेश्वर वशिष्ठ

ठिठुरती रात में

लकड़ी और पुआल से बने घर में

जब चरवाहा ओढ़ कर सोता है

गरम ऊन का कम्बल;

ठंड में काँपती हैं

बाहर बाड़े में बंद बत्तीस मेमनों की आत्माएँ।

मेमने ज़िंदगी भर बँधे रहते हैं

अपनी क़ैद की गंध से।

मेमनों के सपनों में

कोई नहीं आता मुहब्बत लुटाने;

वे रोज़ देखते हैं एक बड़ी-सी कैंची

और अपनी उधड़ती हुई पीठ।

सुबह की धूप उन्हें ओढ़ाती है

चाँदी का कुनमुना दुशाला।

जब भूख नोचने लगती है पेट की आँतें;

वे पंक्तिबद्ध होकर हरी घास की खोज में

नरम-नरम क़दमों से

जा पहुँचते हैं किसी बुग्याल तक!

मेमनों की दुनिया एक-सी रहती है सदा;

पहाड़ी चरवाहे का बाड़ा हो या

दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र,

श्रम हो या मुलायम क़ीमती पश्मीना

मज़दूर और भेड़ के लिए

उसका कोई अर्थ नहीं।

सुनेत्रा,

रक्तिम आकाश के नीचे

वे मेमने अब भी भटक रहे हैं

किसी स्नेहिल स्पर्श के लिए;

वे नहीं जानते हमारी दुनिया में,

मेमनों से कोई नहीं करता प्यार!

( राजेश्वर वशिष्ठ )

.

|| ઘેટાં ||

હાડ ઠુંઠવતી રાત્રિમાં
ડાંખળી અને તણખલાંથી બનેલ ઝૂંપડીમાં
જ્યારે ગોવાળ ઓઢીને સુએ છે
ગરમ ઊનનો ધાબળો
બહાર વાડામાં કેદ બત્રીસ ઘેટાંનો આત્મા
ઠંડીથી થરથર કંપે છે

ઘેટાં જીવનભર બંધાયેલા રહે છે
પોતાની વાડાની ગંધ સંગે
એમના સપનામાં
કોઈ નથી આવતું પ્રેમ વહેંચવા
એ રોજ જુએ એક મોટી કાતર
અને પોતાની ઉતરડાઈ રહેલી પીઠ

સવારનો તડકો
એમને ઓઢાડે
ચમકતી મુલાયમ ચાદર
જ્યારે ભૂખથી વલોવાય એમના આંતરડાં
એ બધાં કતારબંધ
કૂણા ઘાસની તલાશમાં
હળવા પગલે
જઈ પહોંચે કોઈક ચરિયાણ લગી

ઘેટાંની દુનિયા એકસરખી જ રહે સદાય
પહાડી ગોવાળનો વાડો હોય કે
દુનિયાનું સૌથી મોટું લોકતંત્ર
શ્રમ હો કે મુલાયમ મૂલ્યવાન ઊન
મજૂર કે ઘેટા માટે એનો કોઈ અર્થ નથી

સુનેત્રા,
રક્તિમ આભ હેઠળ
જે ઘેટાં હજુ પણ ભટકે છે
કોઈ સ્નેહાળ સ્પર્શ માટે
એમને ખબર નથી

આપણી દુનિયામાં
ઘેટાંને નથી ચાહતું કોઈ…

.

( રાજેશ્વર વશિષ્ઠ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

छठ पर्व : मनमीत के नौ शब्द चित्र

1.

अगले जन्म में

बिहारी बनाना प्रभु

अपनी मातृभूमि से दूर कमाने भेजना

ट्रेन में लद कर

बस में फंस कर

घर लौटने देना प्रभु

इतना पैसा मत देना

कि दिल्ली से उडूं

और पटना उतर जाऊं!

.

2.

सूरज और पानी की दोस्ती का यह पर्व

मुझे बहुत अपना लगता है –

सीने में

दर्द का एक सूरज लिए

आँखों में आए आंसुओं को बुझाने का

पुराना खिलाड़ी रहा हूँ मैं!

.

3.

आज जब पूर्वांचल की एक सुहागिन को

ठेठ मांग से लेकर

नाक तक केसरिया सिंदूर में देखा

तो मैंने अपनी पत्नी से कहा :

मत लगाया करो यह लिक्विड सिंदूर…

लाओ!

पिछली होली का ग़ुलाल बचा होगा

मैं तुम्हें मांग भरना सिखाता हूँ…

.

4.

चाहे राजस्थान की सीमा मिश्रा हो

या आसाम का ज़ुबिन गर्ग

या बिहार की शारदा सिन्हा :

गीत वही हैं

बस कंठ बदल जाते हैं!

.

5.

मैं

पानी में जब भी कमर तक डूबा

आत्महत्या की इच्छा सर उठाने लगी –

अगर बिहारियों को

पानी में कमर तक डूबकर

सूरज को अर्घ्य देते नहीं देखता

तो आत्महत्या की इस इच्छा में..

नाक तक डूब जाता!

.

6.

“खरना” हो चाहे “परना” हो..

हे छठी मैया हमें तेरा सरणा हो!

.

7.

आप दुनियादार लोग हैं

आप सूरज की पूजा करते हैं –

मैं एक कवि मन हूँ

मैं चाँद की पूजा करता हूँ –

रौशनी का आधा पुल

धूप से बनता है

और आधा चांदनी से!

.

8.

एक घाट है

उस पर स्त्रियां हैं

फलों की टोकरियां हैं

सूरज है

पानी में उसकी किरणेँ हैं

अगरबत्तियों और दीपकों का धुआं है

गीत हैं

कंठ हैं

आभार है

भावुकता है

केवल यह भी बचा रहे

तो पूर्वांचल वाले

धरती पर प्रलय के बाद

नई सृष्टि बसा सकते हैं!

.

9.

बिहारियों को देखता हूँ

तो ऐसा लगता है

इन्होंने अपनी जड़ों को सींचकर

यह आकाश कमाया है

लेकिन

इतना कमज़ोर क्यों समझ लिया गया

जड़ों को सींचने वाले

इन महान धरती पुत्रों को?

कि इन्हें

घास बना दिया गया

जिस पर सौ-दो सौ रुपये दिहाड़ी चढ़ा कर

साला कोई मसल देना चाहता है!

.

( मनमीत सोनी )

आविष्कार-कुमार सुरेश

एक छोटी बच्ची को

नहलाकर यूनिफार्म पहनाना

बनाकर विद्यार्थी स्कूल भेजना

आविष्कार है

मेधा के नए पुंज का

किसी शब्द को

अर्थ के नए वस्त्र पहनाना

कविता का रूप देना

आविष्कार है

शब्द के

नए

सामर्थ्य का

जो सब कह रहे हों

क्योंकि कह रहा है

कोई ख़ास एक

से हटकर अलग

वह कहना

जो अंतरात्मा की आवाज़ हो

आविष्कार है

नए सत्य का

इस बात पर

अटूट विश्वास करना

कि सब कुछ कभी ख़त्म नहीं होगा

आविष्कार है

अपने ही नए अस्तित्व का

ये सभी आविष्कार मैं

रोज करना चाहता हूँ

.

( कुमार सुरेश )

.

|| આવિષ્કાર ||

.

એક નાનકડી બાળકીને

નવડાવી, યુનિફોર્મ પહેરાવી, વિદ્યાર્થીની બનાવી સ્કૂલે મોકલવી

એ આવિષ્કાર છે

મેધાના નવા પુંજનો

.

કોઈક શબ્દને

અર્થના નવા વાઘા પહેરાવી

કવિતાનું સ્વરૂપ આપવું

એ આવિષ્કાર છે

શબ્દના નવા સામર્થ્યનો

.

જે બધા કહી રહ્યા હોય –

કેમ કે કોઈ એક ખાસ વ્યક્તિ કહે છે –

એનાથી હટીને એવી વાત કહેવી

જે અંતરાત્માનો અવાજ હોય

એ આવિષ્કાર છે

નવા સત્યનો

.

એ વાત પર

અતૂટ વિશ્વાસ હોવો

કે બધું ક્યારેય ખતમ નહીં થાય

એ આવિષ્કાર છે

પોતાના જ નવા અસ્તિત્વનો

.

હું આ બધાં આવિષ્કાર

દરરોજ

કરવા

ચાહું છું…

.

( કુમાર સુરેશ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

घर-देवेन्द्र आर्य

लौटूंगा

बार बार लौटूंगा

लौटने के लिए ही होता है घर

घर न हो तो लौटना कहाँ?

लौटना न हो तो जाना कहाँ?

एक घर ही तो है

जहाँ से जाया जा सकता है कहीं

जहाँ लौटा जा सकता है

कहीं से भी

कभी भी

घर है तो इंतज़ार है

इंतज़ार ही घर है

.

( देवेन्द्र आर्य )

.

|| ઘ ર ||

.

પાછો ફરીશ
વારંવાર પાછો ફરીશ

પાછા ફરવા માટે જ તો હોય છે ઘર
ઘર ન હો તો પાછા ફરવું ક્યાં ?

એક ઘર જ તો છે
જ્યાંથી કશે પણ જઈ શકાય
જ્યાં પાછા ફરી શકાય
ક્યાંયથી પણ
ક્યારેય પણ

ઘર છે તો પ્રતીક્ષા છે

પ્રતીક્ષા એ જ ઘર છે..

.

( દેવેન્દ્ર આર્ય )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

खिड़की वाली सीट-मोनिका कुमार

जीवन में ख़ुशी के लिए कम ही चाहिए होता है,

वह कम कई बार बस इतना होता है

हमें जब बसों, गाड़ियों और जहाज़ों में यात्रा करनी हो,

तो हम इतने भाग्यशाली हों,

कि हमें खिड़की वाली सीट मिल जाए,

हम टिकट लेकर

बग़ैर सहयात्रियों से उलझे,

सामान सुरक्षित रखने के बाद,

आसानी से अपनी खोह में जा सकें।

घर से निर्जन के बीच ऐसी जगहें बमुश्किल होती हैं

जहाँ हम फूल जैसी हल्की नींद ले सकें

सैकड़ों पेड़ झुलाए नींद को,

या बादलों की सफ़ेदी ले जाए निर्वात की ओर।

इस छोटी-सी नींद से जगना चमत्कार जैसा है,

यह नींद हमारे छीजे हुए मन को सिल देती है

इस नींद से जग कर,

जैसे हम इस हैसियत में लौट सकें,

और ख़ुद से एक बार फिर पूछें,

कि हम कौन हैं,

भले इस प्रश्न के उत्तर में,

हम फूट-फूट कर रो पड़ें।

.

( मोनिका कुमार )

.

|| વિન્ડો સીટ ||

.

જીવનમાં સુખ માટે

બહુ ઓછું જોઈએ

આ ઓછું ક્યારેક તો બસ એટલું

કે બસ, ટ્રેન કે જહાજમાં મુસાફરી કરતા હોઈએ

ત્યારે એવા ભાગ્યશાળી હોઈએ

કે આપણને બારીવાળી સીટ મળે

આપણે આપણી ટિકિટ લઈ

સહયાત્રીઓ સાથે જીભાજોડી વિના

સામાન ગોઠવી

સહેલાઈથી આપણી કંદરામાં છુપાઈ જઈએ

ઘરથી માંડી રણ લગી આવી જગા મુશ્કેલીથી મળે

જ્યાં આપણે ફૂલ – શી હળવી નીંદર માણીએ

સેંકડો વૃક્ષ એ નીંદરને ઝુલાવે

અથવા વાદળની ધવલતા લઈ જાય શૂન્ય તરફ

એ સંક્ષિપ્ત ઊંઘમાંથી જાગવું ચમત્કાર જેવું લાગે

એ ઊંઘ આપણા ફાટેલા મનને સીવી દે જાણે

એ ઊંઘમાંથી જાગી

જાણે આપણે મૂળ હસ્તીમાં પાછા ફરીએ

અને સ્વયંને એક વાર ફરી પૂછીએ

‘ કોણ છું હું ? ‘

ભલે એ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં

આપણે ધ્રુસ્કે – ધ્રુસ્કે રડી પડીએ..

.

( મોનિકા કુમાર )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार-निर्मला पुतुल

यह कविता नहीं

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार है

यहीं आकर सुस्ताती हूँ मैं

टिकाती हूँ यहीं अपना सिर

ज़िंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर

जब लौटती हूँ यहाँ

आहिस्ता से खुलता है

इसके भीतर एक द्वार

जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं

तलाशती हूँ अपना निजी एकांत

यहीं मैं वह होती हूँ

जिसे होने के लिए मुझे

कोई प्रयास नहीं करना पड़ता

पूरी दुनिया से छिटककर

अपनी नाभि से जुड़ती हूँ यहीं!

मेरे एकांत में देवता नहीं होते

न ही उनके लिए

कोई प्रार्थना होती है मेरे पास

दूर तक पसरी रेत

जीवन की बाधाएँ

कुछ स्वप्न और

प्राचीन कथाएँ होती हैं

होती है—

एक धुँधली-सी धुन

हर देश-काल में जिसे

अपनी-अपनी तरह से पकड़ती

स्त्रियाँ बाहर आती हैं अपने आपसे

मैं कविता नहीं

शब्दों में ख़ुद को रचते देखती हूँ

अपनी काया से बाहर खड़ी होकर

अपना होना!

.

( निर्मला पुतुल )

.

|| મારા એકાંતનું પ્રવેશ દ્વાર ||

.

આ કવિતા નથી

મારા એકાંતનું પ્રવેશ દ્વાર છે

અહીં આવીને લંબાવું છું હું

અહીં જ ટેકવું છું મારું માથું

જીવનની ભાગદોડથી થાકી – હારી

જ્યારે પાછી ફરું છું અહીં

ધીમેકથી ઊઘડે છે

એની અંદર એક દ્વાર

જેમાં હળવેથી પ્રવેશી

હું શોધું છું મારું અંગત એકાંત

અહીં જ

હું

એ હોઉં છું

જે હોવા માટે

મારે કોઈ પ્રયત્ન નથી કરવો પડતો

આખી દુનિયાથી છટકીને

પોતાની નાભિનાળ સંગે જોડાઉં છું અહીં

મારા એકાંતમાં

દેવી – દેવતા નથી હોતા

ન તો એમના માટે

કોઈ પ્રાર્થના હોય મારી પાસે

હોય છે દૂર લગી પ્રસરેલો રેત – સાગર

જીવનની અડચણો

થોડાંક સપના

અને પ્રાચીન કથાઓ

હોય છે

એક અસ્પષ્ટ તરજ

પ્રત્યેક યુગમાં જેને

પોતપોતાની રીતે ઝીલતાં

સ્ત્રીઓ જાતમાંથી બહાર આવે છે

હું કવિતા નહીં

શબ્દોમાં સ્વયંને રચતી

જોઉં છું

પોતાના શરીરથી બહાર ઊભી – ઊભી

પોતાનું અસ્તિત્વ…

.

( નિર્મલા પુતુલ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

कभी आ भी जाना-गुलज़ार

कभी आ भी जाना
बस वैसे ही जैसे
परिंदे आते हैं आंगन में
या अचानक आ जाता है
कोई झोंका ठंडी हवा का
जैसे कभी आती है सुगंध
पड़ोसी की रसोई से

.

आना जैसे बच्चा आ जाता
है बगीचे में गेंद लेने
या आती है गिलहरी पूरे
हक़ से मुंडेर पर

..

जब आओ तो दरवाजे
पर घंटी मत बजाना
पुकारना मुझे नाम लेकर
मुझसे समय लेकर भी मत आना
हाँ , अपना समय साथ लाना
फिर दोनों समय को जोड़
बनाएंगे एक झूला
अतीत और भविष्य के बीच
उस झूले पर जब बतियाएंगे
तो शब्द वैसे ही उतरेंगे
जैसे कागज़ पर उतरते हैं
कविता बन

.

और जब लौटो तो थोड़ा
मुझे ले जाना साथ
थोड़ा खुद को छोड़े जाना
फिर वापस आने के लिए
खुद को एक-दूसरे से पाने
के लिए।

.( गुलज़ार )

.

ક્યારેક એવી રીતે પણ આવ
જેમ
પંખી આવે ફળિયામાં
અથવા
જેમ અચાનક આવે
કોઈ ઠંડી હવાની લ્હેરખી
જેમ ક્યારેક આવે
પડોશમાંથી રસોઈની સોડમ

.

આવ એ રીતે
જેમ બાળક દોડતું આવે
બગીચામાં દડો લેવા
અથવા આવે ખિસકોલી
સંપૂર્ણ અધિકારપૂર્વક
ઘરની પાળીએ

.

જ્યારે આવ ત્યારે
દરવાજે બેલ વગાડીશ નહીં
પોકારજે મારું નામ
સમય નક્કી કરીને પણ ન આવીશ
હા
પોતાનો સમય સાથે લાવજે
પછી બંનેનો સમય જોડીને
બનાવીશું એક હિંચકો
અતીત અને ભવિષ્યની વચ્ચે
એ હીંચકા પર બેસી જ્યારે ગપાટા મારીશું
ત્યારે શબ્દો એમ ઉતરી આવશે
જાણે કવિતા

.

અને જ્યારે પાછો ફર
તો થોડોક મને લઈ જજે સાથે
થોડોક સ્વયંને છોડી જજે અહીં
ફરી પાછા ફરવા માટે

.

અને સ્વયંને એકમેક થકી પામવા માટે..

.

( ગુલઝાર )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )