(आज जब विनोद कुमार शुक्ल हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं, तब यह उपन्यास और भी गहरे अर्थों में हमें स्पर्श करता है। ऐसा लगता है जैसे वे स्वयं किसी दीवार के पार चले गए हों, लेकिन अपने शब्दों की खिड़कियाँ हमारे लिए खुली छोड़ गए हों।
. विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा प्रतिरोध उसका कोमल बने रहना है, और सबसे बड़ा साहस—साधारण होना। उन्होंने हिंदी साहित्य को शोर से नहीं, मौन से समृद्ध किया; गति से नहीं, ठहराव से अर्थ दिया।
. उनकी मृत्यु एक लेखक का जाना नहीं है, बल्कि उस दृष्टि का ओझल होना है, जो दीवारों में भी खिड़कियाँ खोज लेती थी।
. पर साहित्य का यह नियम अटल है—जो लेखक खिड़कियाँ बनाता है, वह कभी पूरी तरह जाता नहीं। विनोद कुमार शुक्ल को नमन।
. उनकी रचनाओं की खिड़कियों से आती रोशनी हमारे समय को देर तक आलोकित करती रहे।)
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कभी-कभी साहित्य में एक ऐसी खिड़की खुल जाती है, जिससे रोशनी केवल बाहर नहीं, भीतर भी गिरती है—मनुष्य के अस्तित्व, उसकी चुप्पियों, उसके छोटे-छोटे सुखों और दुखों पर। ऐसे ही क्षणों में साहित्य केवल पाठ नहीं रहता, वह आत्मानुभूति बन जाता है।
. डॉ. रविभूषण का यह कथन सहज ही स्मरण में आता है कि—“जीवन में दरवाज़ों से ज़्यादा खिड़कियों का महत्व होता है।”
. दरवाज़े भीतर-बाहर के रास्ते दिखाते हैं, पर खिड़कियाँ देखने की दृष्टि देती हैं—बंद कमरों में भी उजाले और हवा का बोध कराती हैं। दरवाज़े स्थूल हैं, खिड़कियाँ सूक्ष्म—वे हमें भीतर से बाहर और बाहर से भीतर देखने का विवेक देती हैं।
. विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ इसी सूक्ष्म दृष्टि का दस्तावेज़ है। यहाँ दीवारें जीवन की सीमाएँ हैं, लेकिन उन्हीं दीवारों में खुली खिड़कियाँ मनुष्य के भीतर बची हुई मानवीय रोशनी की गवाही देती हैं।
. यह उपन्यास किसी पारंपरिक कथा की तरह नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जलते दीपक की तरह फैलता है—न घोषणाओं में, न वैचारिक नारेबाज़ी में, बल्कि उन असंख्य सांसों में जिनसे साधारण मनुष्य अपना दिन काटता है और जीवन रचता है।
. विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कथा-साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि साधारण मनुष्य के जीवन में ही सबसे बड़ा रहस्य और सबसे सुंदर कविता छिपी होती है। उनका यह उपन्यास किसी रहस्य का दरवाज़ा नहीं खोलता, बल्कि एक खिड़की खोलता है—धीरे, निस्पृह, लगभग ध्यान की अवस्था में।
. उपन्यास के केंद्र में हैं रघुवर प्रसाद और सोनसी—निम्न-मध्यवर्गीय दंपति। उनके जीवन में कोई असाधारण घटना नहीं घटती, फिर भी उनका अस्तित्व असाधारण बन जाता है। रघुवर प्रसाद गणित पढ़ाते हैं, लेकिन जीवन के जटिल समीकरणों को हल नहीं कर पाते। सोनसी गृहस्थ जीवन के भीतर वह कोमल ऊर्जा है, जो संसार को चलाती है।
. उनके छोटे से कमरे की दीवार में बनी एक खिड़की केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वप्न और यथार्थ के बीच खुला एक जादुई मार्ग है। उस पार नदी, पहाड़, चिड़ियाँ और पेड़ों की छाँव है—जहाँ जाकर मनुष्य अपने भीतर की थकान उतार देता है। यह खिड़की दरअसल अंतर्जगत का प्रतीक है—जहाँ से मनुष्य अपने भीतर उतरता है और दुनिया को नई दृष्टि से देखना सीखता है।
. ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का शिल्प रैखिक नहीं है; यह क्षणों, स्मृतियों और संवेदनाओं की परतों से निर्मित है। विनोद कुमार शुक्ल पारंपरिक कथा-गठन से आगे बढ़कर एक कवितामय गद्य-संरचना रचते हैं, जहाँ घटनाएँ नहीं, अनुभूतियाँ कथा बनती हैं।
. कॉलेज जाना, साइकिल का गायब होना, साधु का हाथी के साथ गुज़रना—ये सब घटनाएँ कम और प्रतीक अधिक हैं। यह हमारे समय, समाज और व्यक्ति के मनोविज्ञान के सूक्ष्म प्रतिबिंब हैं। उपन्यास का शिल्प एक सुरभित ध्यान की तरह है—जहाँ हर दृश्य धीरे-धीरे खुलता है, हर संवाद का अपना मौन है, और हर मौन के भीतर एक गहरी लय स्पंदित है।
. भाषा यहाँ अलंकारों से नहीं, बल्कि ईमानदारी और पारदर्शिता से चमकती है। घरेलू बोली, आत्मसंवाद, औपचारिक संवाद और निजी बातचीत—इन सभी की भिन्न लयों ने इस उपन्यास को बहुभाषिक यथार्थ का रूप दिया है। यह भाषा बताती है कि साहित्य का सबसे गहरा संगीत उसी में बसता है जो सबसे सादा है।
. दीवार और खिड़की का प्रतीक इस उपन्यास की आत्मा है। दीवार समाज की कठोरता, सीमाओं और ठोस यथार्थ की प्रतीक है, जबकि खिड़की उस दीवार में खुली उम्मीद—एक ऐसी दरार, जिससे प्रेम, स्वप्न और स्वतंत्रता की हवा भीतर आती है।
. रघुवर प्रसाद और सोनसी का प्रेम इस उपन्यास का सबसे मृदुल और मार्मिक पक्ष है। बिना किसी नाटकीयता के, साधारण दिनों के भीतर बहता हुआ प्रेम—साझी थकान, साझा रोटी और साझा नींद में जीवित रहता हुआ। यह प्रेम न शरीर से बचता है, न उसमें डूबता है—वह आँखों और मौन के बीच पनपता है।
गालियों और तालियों में आकंठ डूबे हुए ऐ नए भारत के विश्वकर्मा!
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तुम “डीज़र्व” करते हो “फैन फॉलोइंग” और यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मेरे पास एक बार तुम्हें चूरू में “लाइव” देखने का घमंड है!
यह देश जब एक महान अवसाद में डूबा हुआ था तब तुम आए आशा की किरण बनकर और उस एक किरण से दशकों के अँधेरे के शून्य को भर दिया प्रकाश से
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कितना भव्य स्वागत हुआ तुम्हारा कितना अपमान किया गया तुम्हारा कितनी भीड़ थी हाथ में मालाएं लिए कितने चाकू छुरियां थीं तुम्हें मारने के लिए तुमने मालाएँ ख़ुशी ख़ुशी पहन लीं तुमने चाकुओं और छुरियों को भी सीने में उतर जाने दिया
पिछले पंद्रह बरस से अनाथ नहीं लगता यह यह देश ऐसा लगता है जैसे भारत नाम के बूढ़े बाप की तुमने तन-मन-धन से इतनी सेवा की है कि यह अभी उठकर दौड़ने लगेगा
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कैसे विरोधियों से घिरे हो तुम जो अपने “हिन्दू” होने पर शर्मिंदा हैं जिन्हें अफ़सोस है कि भारत में पैदा हुए जो मुसलमानों को हिन्दुओं से और हिन्दुओं को उनके दलित भाइयों से अलग कर देना चाहते हैं
ग़ालिब ने कहा था :
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“चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारी जेब को अब हाजत ए रफ़ू क्या है”
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तुम्हें देख कर भी ऐसा ही लगता है नरेन्द्र मोदी कि तुम्हारे लहू के गोंद की वजह से ही चिपका हुआ है :
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कश्मीर या बंगाल या केरल हिंदुस्तान के बदन से!
मैं नहीं जानता कि तुम ख़ुद हट जाओगे या लोग ही तुम्हें हटा देंगे लेकिन याद बहुत आओगे नरेन्द्र मोदी जब चले जाओगे :
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एक चिड़िया के उड़ जाने से भी सूना हो जाता है आकाश
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एक फूल के मुरझा जाने से भी मरणधर्मा हो जाती है सारी हरियाली
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फिर तुम तो हमारी आशा हो हम किसकी ओर देखेंगे तुम्हारे बाद?
आएँगे हज़ारों देशभक्त हमारे पिटारे में अभी हज़ारों नरेन्द्र मोदी हैं लेकिन तुम-सा नहीं आएगा कोई और कोई कहेगा भी कि वह दूसरा नरेन्द्र मोदी है तो हमें हँसी आएगी उस पर!
मुझ युवा कवि को यदि सत्ता का दलाल कहा जाए तो मुझे कोई परवाह नहीं
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मैं चीन या पाकिस्तान या तुरकिये का दलाल होने से कहीं कहीं बेहतर अपने चुने हुए प्रधानमंत्री की जूठी हुई प्लेट उठाना समझता हूँ!
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क्या करूँगा कविताओं का जब देश ही नहीं बचेगा
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छाती पर खड़े लाखों-करोड़ों गद्दारों के बीच वैसे भी मेरी कविताओं का मूल्यांकन नहीं होगा!
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वे क्या पढ़ेंगे मेरी कविताएं मैं स्वयं अपनी कविताओं को उनकी आँखों के नीचे से दरी की तरह खींचता हूँ!
2014 से पहले डरता था अपनी बात कहने से पहले कि हमारी कोई नहीं सुनता था न फेसबुक हमारा था न फेसबुक के बाहर की दुनिया और अब हालात यह हैं कि लोग लाइन लगा कर खड़े हैं
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“क्या मनमीत की नई कविता आई”
ट्रोल होने से नहीं डरता अब फेसबुक की फ़ेक आइडियों से भी नहीं दस-पंद्रह-बीस-तीस हज़ार के फॉलोवर्स वाले हवाई चुनाव-विश्लेषकों से भी नहीं..
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डरता हूँ तो सिर्फ़ इस बात से कि मुझ कवि ने जिस राजनेता को इतना प्यार किया कहीं वह अपने पीछे इतना बड़ा शून्य न छोड़ जाए कि हमें डर लगने लगे :
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हमारे बच्चों का क्या होगा?
जिनकी तलवारें इस इंतज़ार में हैं कि तुम मरो तो म्यान से बाहर निकलें
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जिनकी बंदूकें इस मौके की तलाश में हैं कि तुम मरो तो छुपाई हुई गोलियाँ निकालें
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जिनके बारूद इस फिराक़ में हैं कि तुम मरो तो पूरे देश को एक झटके में उड़ा दिया जाए
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मैं एक मामूली-सा कवि इन सबके सामने छाती तान कर खड़ा हूँ!
तुम नहीं जानते कि तुमने इस भारत महान को कम से कम हज़ार वर्षों के लिए बचा लिया
लिखते चले जाने का कोई अंत तो है नहीं मोदी जी कि हम तो भोले बावले हैं कि जिससे कर बैठे प्यार उसी पर लुटा बैठे आँख के आँसू कलम की स्याही
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इतने बदनाम हैं तुम्हें प्यार करने वाले कि तुम्हारी जान को ही नहीं हमारी जान को भी ख़तरा है नरेन्द्र मोदी!
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बचकर रहना नरेन्द्र मोदी शिवाजी की तरह बदलते रहना क़िले महाराणा प्रताप की तरह बदलते रहने जंगल झांसी की रानी की तरह इस भारत को अपनी कमर से बांध कर करते रहना तलवारबाज़ी
गूँज रही हैं कैफ़ी आज़मी की पंक्तियाँ मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में :
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“ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने की रुत रोज़ आती नहीं”
ઘેટાંની દુનિયા એકસરખી જ રહે સદાય પહાડી ગોવાળનો વાડો હોય કે દુનિયાનું સૌથી મોટું લોકતંત્ર શ્રમ હો કે મુલાયમ મૂલ્યવાન ઊન મજૂર કે ઘેટા માટે એનો કોઈ અર્થ નથી
સુનેત્રા, રક્તિમ આભ હેઠળ જે ઘેટાં હજુ પણ ભટકે છે કોઈ સ્નેહાળ સ્પર્શ માટે એમને ખબર નથી
बचपन में घर में दवाई का कोई डिब्बा नहीं था बस एक फूँक थी जरा भी दर्द होता एकदम उनके मुँह से निकलती बिन सोचे समझे।
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मैं नाजुक सी थी चलते, उठते, बैठते रोज चोट खाती बाबा कहते अरे देख तो कीड़ी मार दी मुझे उसके मरने का अफ़सोस होता बाबा फूटे घुटने पर तब फूँक मारते और मैं भूल जाती सबकुछ।
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माँ चुन्नी पर भफारा भर मेरी आँख सेंकती थी एक-दो-तीन-चार कर कहती देख वे आए तेरे मामा के मोर सब रड़क भूल मैं आसमान निहारती थी। माँ की फूँक गर्माहट से भर देती थी मुझे।
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फूँक कभी फूटी कोहनी पर लगती मरहम सी कभी भाई की टोक पर झाड़ा बन कभी चूल्हा सुलगाती कभी दीवा बुझाती कभी मोमबत्ती की लौ के बाहर-बाहर घूमती थी कोई सूल भी चुभती तो बहनें फूँक ही मारती थी जले हाथ पर भी फूँक बर्फ का काम करती रही।
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मेरे आस-पास कितनी फूँक थी।
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माँ! मन जलाए बैठी हूँ कुछ दिन से नया जमाना है शायद कोई फूँक असर करे तुम करो ना कुछ।
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( सुनीता करोथवाल )
|| દાઝ્યા મન પર એક ફૂંક ||
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નાનપણમાં ઘરે કોઈ દવાનો ડબ્બો નહોતો બસ એક ફૂંક હતી સ્હેજ પણ દુઃખાવો હોય અનાયાસ માબાપના મોઢેથી નીકળતી કશું વિચાર્યા વિના
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હું નાજુક હતી ચાલતાં, ઊઠતાં, બેસતાં વાગતું રહેતું બાપુ કહેતા, ” અરે જો કીડી મરી ગઈ “ મને કીડી મરી જવાનો અફસોસ થતો બાપુ ઇજા પામેલા ઘૂંટણ પર ફૂંક મારતા અને હું ભૂલી જતી બધી પીડા
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બા પાલવમાં ફુંક ભરી મારી આંખને શેક કરતી ‘ એક બે ત્રણ ચાર ‘ બોલી કહેતી જો, આવ્યા તારા મામાના મોર હું રડવું ભૂલી આકાશ તરફ જોતી માની ફૂંક ગરમાવાથી ભરી દેતી મને
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ફૂંક ક્યારેક ઇજાગ્રસ્ત કોણી પર મલમનું કામ કરતી ક્યારેક ભાઈને નજર લાગે ત્યારે ઝાડફૂંકનું ક્યારેક એ ચૂલો સળગાવતી ક્યારેક દીવો ઓલવતી ક્યારેક મીણબત્તીની શિખાની આસપાસ ઘુમરાતી કોઈ શૂળ જેવું ભોંકાતું તો પણ બહેનો ફૂંક જ મારતી દાઝ્યા હાથ પર પણ ફૂંક બરફનું કામ કરતી
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મારી આસપાસ કેટલી બધી ફૂંક હતી
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મા ! મન દઝાડી બેઠી છું થોડાક દિવસથી નવો જમાનો છે કદાચ કોઈક ફૂંક અસર કરે તું કર ને કશુંક…
कभी आ भी जाना बस वैसे ही जैसे परिंदे आते हैं आंगन में या अचानक आ जाता है कोई झोंका ठंडी हवा का जैसे कभी आती है सुगंध पड़ोसी की रसोई से
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आना जैसे बच्चा आ जाता है बगीचे में गेंद लेने या आती है गिलहरी पूरे हक़ से मुंडेर पर
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जब आओ तो दरवाजे पर घंटी मत बजाना पुकारना मुझे नाम लेकर मुझसे समय लेकर भी मत आना हाँ , अपना समय साथ लाना फिर दोनों समय को जोड़ बनाएंगे एक झूला अतीत और भविष्य के बीच उस झूले पर जब बतियाएंगे तो शब्द वैसे ही उतरेंगे जैसे कागज़ पर उतरते हैं कविता बन
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और जब लौटो तो थोड़ा मुझे ले जाना साथ थोड़ा खुद को छोड़े जाना फिर वापस आने के लिए खुद को एक-दूसरे से पाने के लिए।
.( गुलज़ार )
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ક્યારેક એવી રીતે પણ આવ જેમ પંખી આવે ફળિયામાં અથવા જેમ અચાનક આવે કોઈ ઠંડી હવાની લ્હેરખી જેમ ક્યારેક આવે પડોશમાંથી રસોઈની સોડમ
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આવ એ રીતે જેમ બાળક દોડતું આવે બગીચામાં દડો લેવા અથવા આવે ખિસકોલી સંપૂર્ણ અધિકારપૂર્વક ઘરની પાળીએ
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જ્યારે આવ ત્યારે દરવાજે બેલ વગાડીશ નહીં પોકારજે મારું નામ સમય નક્કી કરીને પણ ન આવીશ હા પોતાનો સમય સાથે લાવજે પછી બંનેનો સમય જોડીને બનાવીશું એક હિંચકો અતીત અને ભવિષ્યની વચ્ચે એ હીંચકા પર બેસી જ્યારે ગપાટા મારીશું ત્યારે શબ્દો એમ ઉતરી આવશે જાણે કવિતા
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અને જ્યારે પાછો ફર તો થોડોક મને લઈ જજે સાથે થોડોક સ્વયંને છોડી જજે અહીં ફરી પાછા ફરવા માટે
ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू वीरांगनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर ‘जौहर’ बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था।
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पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी।
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पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है।
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रतनसिंह ने खून-खराबा टालने के लिए यह बात मान ली। एक दर्पण में रानी पद्मिनी का चेहरा अलाउद्दीन को दिखाया गया। वापसी पर रतनसिंह उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा।
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यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी।
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अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े।
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कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया।
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रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। ‘जय हर-जय हर’ का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं।
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चारित्र्य, त्याग, वीरता और अभूतपूर्व शौर्य के प्रतीक रानी पद्मिनी जी के जौहर दिवस पर उन्हें शतशः नमन।
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आत्मसम्मान की रक्षा के लिए 16000 वीरांगनाओं के साथ रानी पद्मिनी जी ने जलते हुए अंगारों के अग्निकुड में स्वयं को आहूत कर लिया था।
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अपूर्व शौर्य के प्रतीक जौहर दिवस पर रानी पद्मिनी जी सहित 16000 वीरांगनाओं को सादर नमन करते हैं।
યોગ-ઉપવાસમાં જરાય ન માનતા આ સચ્ચિદાનંદ સ્વામીજી ૯૩ વર્ષે પણ એનર્જીથી તરબતર છે !
જાણીએ, શું કહેવું છે તેમને પોતાની સદાબહાર તંદુરસ્તી વિશે.
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કુદરતી જીવન જીવો:
હું વીસ-બાવીસ વર્ષનો હતો ત્યારે રામદેવ બાબા કરાવે છે એવી યૌગિક ક્રિયાઓ કરતો હતો, પણ જ્યારે મને સમજાયું કે આમાંનું ઘણું કુદરત વિરોધી છે, ત્યારે એ બધું મેં છોડી દીધું.
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નેતી, ધોતી, બસ્તી, કુંજલ, નૌલી જેવી યૌગીક ક્રિયાઓ અને વધુપડતો પ્રાણાયામ કુદરત વિરોધી છે.
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આખી જિંદગી યોગ કરતા કેટલાય યોગીઓને મેં ભૂંડી રીતે મરતા જોયા છે.
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યોગીઓએ બતાવેલી આ બધી ક્રિયાઓ આરોગ્યને બરબાદ કરી દે છે. લોકોને પ્રભાવિત કરવા હોય તો આ બધું બરાબર છે, પણ એ કરાય નહીં. ત્યાગી લોકો મરતાં બહુ રિબાય છે.
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એક ત્યાગી યોગી એટલું રિબાયા હતા કે મરતાં પહેલાં તેમણે એકરાર કર્યો હતો કે તેમણે જે કર્યું એ નહોતું કરવું જોઈતું.
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મારી સાથે કનખલમાં રહેતા એક યોગી મર્યા ત્યારે તેમના શરીરમંથી એટલી દુર્ગંધ આવતી હતી કે સારવાર માટે તેમને અમેરિકા લઈ જવામાં આવ્યા હતા તોઅમેરિકન સરકારે પણ તેમને તડીપાર કર્યા હતા.
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આ બધા અનનૅચરલ જીવન જીવે છે, ગુફાઓમાં બેસે તો શરીરને ઑક્સિજન ન મળે અને પલાંઠી વાળીને બેસી રહે તેથી શરીરની હલનચલન ન થાય તેથી તે ડલ થઈ જાય.
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મહેનત-મજૂરી કરનારા અને સહજ જીવન જીવતા લોકો જ સ્વસ્થ રહે છે અને તેમને સહજ મૃત્યુ મળે છે.
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મારી આવી તતૂડી ભલે કોઈ ન સાંભળે, પણ એ હકીકત છે.
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શરીરને સાચવવા હું કાંઈ નથી કરતો. તે એની મેળે જ સચવાય છે.યોગીઓ જે ધ્યાન કરે છે તે કુદરતી નથી, જીવન માટે જરૂરી પણ નથી. તમે જે કામ કરો એ ધ્યાનથી કરો, એમાં મન પરોવીને કરો તો એ તમારું ધ્યાન જ છે.
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સોયમાં તમે દોરો પરોવો ત્યારે એ ધ્યાન જ છે.
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ઘરનું કામ છોડી ધ્યાન કરવા બેસો તો જેવી આંખો બંધ કરો એવું અંદરથી મન કૂદાકૂદ કરવા લાગશે.
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યોગ અને ધ્યાને લોકોને ઊંધા રસ્તે વાળી દીધા છે. યોગી થવા કરતાં ઉપયોગી થાઓ, લોકોને ઉપયોગી બનો. સેવા પ્રવૃત્તિ કરો. લોકોનું ભલું થાય એવાં કામ કરો એ સૌથી મોટી સાધના છે.
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ગીતામાં પણ કહ્યું છે કે યોગ: કર્મસુ કૌશલમ.
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મારો નિત્યક્રમ:
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– હું રોજ સવારે ૪ વાગ્યે ઊઠી જાઉં છું.
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– નહાઈ-ધોઈ જાપ તથા પ્રાર્થના કરું.
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– સાંજે સાડા છ વાગ્યે મંદિરમાં આરતી વગેરે પતે પછી મારી રૂમમાં જઈ થોડી વાર ટીવી જોઉં, જેમાં સમાચાર ખાસ જોઉં અને રાત્રે સાડાઆઠ વાગ્યે સૂઈ જાઉં છું.
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રોજ સવારે ૧૦ વાગ્યે અને સાંજે ૪ વાગ્યે જમી લઉં છું.
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હવે ઉંમરના હિસાબે ઊંઘ જલદી ઊડી જાય છે તેથી રાત્રે ૧૨ વાગે જાગીને લખવા બેસી જાઉં ને પાછું મન થાકે ત્યારે સૂઈ જાઉં.
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૧૯૯૪માં મદ્રાસમાં બાયપાસનું ઑપરેશન થયું હતું. જોકે એ કર્યા પછી મને સમજાયું કે એની જરૂર નહોતી.ડૉક્ટરોના દબાણને કારણે વળી એ થયું.
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હાર્ટ માટે ડૉક્ટરે આપેલી એક ગોળી સિવાયની અત્યારે હું કોઈ દવા નથી લેતો.
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કોઈ વાર તાવ જેવું લાગે તો સુદર્શનની ગોળી લઈ લઉં.
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શરીરને કોઈ તકલીફ થાય તો આયુર્વેદિક દવા લઈ શકાય.
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બાકી .. શરીર આપમેળે સારું થઈ જતું હોય છે.
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સ્વાદિષ્ટ ખાઓ:
હું પહેલાં ખાવામાં ગાંધીજીના અસ્વાદના રવાડે ચઢ્યો હતો.
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અસ્વાદ એટલે મીઠું, મરચું, ખાંડ, તેલ, મસાલા વગેરે ન ખાવા.
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એમાં મારું શરીર બગડી ગયું તેથી મેં એ બધું છોડી દીધું.
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લગભગ ૩૦-૩૫ વર્ષથી બધું ખાઉં છું તો શરીર સારું રહે છે. મસાલા દવાઓ છે.
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પશ્ચિમના દેશોના રવાડે ચઢી આપણે મસાલાનો ત્યાગ કરવા લાગ્યા એ ખોટી વાત છે.
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આપણા મસાલા લેવા માટે તો વાસ્કો દી ગામા ભારત આવ્યો હતો.
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ખાવાનું હંમેશાં સ્વાદિષ્ટ ખાઓ તો એ પચશે.
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કોળિયો મોઢામાં આવે ત્યારે ભરપૂર લાળ છૂટવી જોઈએ, એવું એ સ્વાદિષ્ટ હોવું જોઈએ.
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હું રોજ બે જ ચીજો ખાઉં છું.
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દાળ-રોટલી
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અથવા તો શાક-રોટલી.
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થાળી ભરેલી હોય એવું મને ન જોઈએ, પણ જે હોય એ સ્વાદિષ્ટ હોવું જોઈએ. રોટલી બરાબર શેકાયેલી અને દાળ કે શાક સ્વાદમાં સરસ હોવાં જોઈએ.
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રસોઈ ખાવાની પ્રેરણા થાય એવી સરસ એ બનેલી હોવી જોઈએ. હું બધું જ ખાઉં છું, કોઈ વસ્તુની ઍલર્જી નથી. કાંદા-લસણ પણ ખાઉં છું.એટલું જ નહીં, આશ્રમમાં બધાને એ ભરપૂર ખાવા કહું છું.
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ખાવાનું પ્રમાણસર ખાવું જોઈએ. મસાલામાં કે ખાવામાં અતિરેક ન થવો જોઈએ એમ હું માનું છું.
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મનની પ્રસન્નતા મહત્વની છે, હસો, રમો, ટોન્ટ-ટૂચકા કરો, ખાઓ, જૉબ કરો, હરો-ફરો, જેનાથી મન પ્રસન્ન થાય એ બધું જ કરો, બસ મન મુકીને જિંદગી જીવો. મનની પ્રસન્નતા જ સૌથી મોટો યોગ છે. જે કામ કરો એ મન પરોવીને અને ખુશીથી કરો. જે કરવાથી મન ખુશ રહે એવાં કામ કરો.
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મને જૂનાં ફિલ્મી ગીતો સાંભળવાં બહુ ગમે છે. એ હું જ્યારે મન થાય ત્યારે સાંભળું છું.
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સંગીતકાર શંકર-જયકિશનવાળા જયકિશને જે ધૂનો બનાવી છે… લાજવાબ…!!!
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થોડા સમય પહેલાં દસ લાખ રૂપિયાના ખર્ચે મેં વાંસદા ગામમાં જયકિશનનું સ્ટૅચ્યુ મુકાવ્યું છે, જે પહેલી વાર બન્યું છે કે કોઈ ફિલ્મ સંગીતકારનું સ્ટૅચ્યુ મુકાયું હોય!
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જયકિશન વાંસદાનો મિસ્ત્રી હતો એની એના ગામના લોકોને પણ નહોતી ખબર!
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બસ… એક પ્રોફેસર અને એક સંત એમ બન્નેના સ્વાદિષ્ટ અને વિવિધતાસભર ખોરાક વિષેના વિચારોથી આજ સાંજથી જ તમારા દૈનિક ભોજનમાં પરિવર્તન લાવી દેજો. આ ખવાય, આ ન ખવાય તેના રવાડે ચડતા નહી.
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દિલ જે માગે તેને સંતોષજો. અને પછી જુઓ જિંદગીના પાટા કેવા બદલાઈ જાય છે. ચારે તરફ ખૂશી અને પ્રસન્ન્તા છવાઈ ગઈ હશે અને તમારો પીછો નહી છોડે….