सपनों का जीवन-कविता कृष्णपल्लवी

कुछ भी नहीं होता दो बार।

हर घटना अकेली होती है और हर सपना भी।

दो बार वही प्यार नहीं होता।

पुराना प्यार यदि वापस भी लौटे तो वही नहीं रह जाता ।

वही चुम्बन दुहराया नहीं जाता ।

हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह, वह वही नहीं होती।

हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है ।

हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है।

हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में

वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता

और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर

वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है।

हम जिस देश-काल को जीते हैं वह अगले ही पल इतिहास हो जाता है।

लगातार किसी सपने का पीछा करने में ही जीवन है

धड़कता-थरथराता हुआ अविराम।

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( कविता कृष्णपल्लवी )

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|| સ્વપ્નનું જીવન ||

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કશું પણ બે વાર ન થાય

દરેક ઘટના એકમેવ હોય

અને દરેક સ્વપ્ન પણ

બે વાર એનો એ પ્રેમ ન થાય

જૂનો પ્રેમ જો પાછો ફરે

તો એ એવો જ ન હોય

એક જ ચુંબન દોહરાવી ન શકાય

આપણે જ્યારે ફરી પહોંચીએ કોઈક જૂની જગાએ

એ એની એ ન હોય

દરેક વખતે વિરહ આગવી ઢબનો હોય

દર વખતનો છૂટા પડવાનો તરીકો અને મિજાજ નોખો હોય

દરેક ઉદઘોષ નવા કંઠેથી અભિનવ બની ફેલાય

જે આકાશમાં

એ વીતેલા સમયનું આકાશ નથી હોતું

અને જે ક્રાંતિ પુરાણી ક્રાંતિથી શીખીને ડગ માંડે છે ભૂમિ પર

એ ભૂમિ નવી હોય છે

અને ક્રાંતિને નવું સ્વરૂપ આપે છે

આપણે જે દેશકાળમાં જીવીએ છીએ

એ આગલી જ ક્ષણે ઇતિહાસમાં સમાઈ જાય છે

લગાતાર કોઈક સ્વપ્નનો પીછો કરવો

એ જ જીવન છે

ધબકતું – થરથરતું – અવિરામ..

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( કવિતા કૃષ્ણપલ્લવી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

तुम्हारे बारे में सोचते हुए-विनय सौरभ

एक दिन पाया कि

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए हैं

याद करना कुछ ख़ास करने

जैसा नहीं रह गया था

.

यह कोई सहायक क्रिया भी नहीं थी

तुम्हें बताना चाहता हूँ

कि वह शहर पूरी तरह बदल गया था

जो हमारी साँसों में बसता था

.

सारी चीज़ें हमेशा की

तरह बदल रही थीं

हमारे साथ बैठने की वह जगह भी

जो हम स्मृतियों में छोड़ आए!

.

मैंने दरबान से पूछा कि

यहाँ एक गुलमोहर भी हुआ करता था

जवाब में उसने कहा कि

आपको मिलना किससे है?

.

साइकिलें नहीं थीं!

वे मुझे बेहद शिद्दत से याद आईं

जो हॉस्टल की बाहरी दीवारों पर टिकी रहती थीं

बहुत तेज़ भागता प्रेम था यहाँ

.

और थोड़ा आक्रामक दिखता-सा,

असहजता बीते दिनों का क़िस्सा थी

क्या इत्मीनान से भरे थे हमारे दिन?

क्या हमारी यादों में उन दिनों की आशंकाएँ दर्ज हैं!

.

और क्या दुख की इबारतों के क़िस्से भी मिलेंगे वहाँ?

कहाँ जाएँ कि शक्लें

अब बदल चुकी हैं

और अच्छा हुआ कि

.

हम अपनी पुरानी डायरियाँ

भी कहीं रखकर भूल गए हैं..

.

( विनय सौरभ )

.

|| તારા વિષે વિચારતાં ||

.

તારા વિષે વિચારતાં

એક દિવસ ખબર પડી

કે એમ કરતાં વર્ષો વીતી ગયાં

એમ કરવામાં કશું ખાસ કરતો હોઉં એવું લાગતું પણ નહોતું

એ કોઈ મદદકારક પ્રક્રિયા પણ નહોતી

તને જણાવવા ઇચ્છું છું

કે એ શહેર પૂરેપૂરું બદલાઈ ગયું હતું

જે આપણા શ્વાસમાં વસતું

બધી ચીજો બદલાઈ રહી હતી

આપણે સાથે બેસતા એ જગા પણ

જે આપણે સ્મૃતિઓમાં છોડી આવ્યા

મેં ચોકીદારને પૂછ્યું કે

અહીં એક ગુલમહોરનું વૃક્ષ પણ હતું

જવાબમાં એણે કહ્યું કે

તમારે મળવું કોને છે ?

સાઈકલો નહોતી !

એ મને તીવ્રતાથી યાદ આવી

એ હોસ્ટેલ બહારની દિવાલના ટેકે પડી રહેતી

ત્યાં પ્રેમ ઝડપથી વિકસતો

અને થોડોક આક્રમક પણ લાગતો

અસહજતા વીતેલા દિવસોનો કિસ્સો હતી

શું નિરાંતના દિવસો હતા એ ?

શું આપણી સ્મૃતિઓમાં

એ દિવસોની આશંકાઓ દર્જ છે ?

અને શું દુઃખની લખાવટના કિસ્સા પણ હશે ત્યાં ?

ક્યાં જઈએ

કે આપણા રૂપરંગ બદલાઈ ચૂક્યા છે હવે

એટલું સારું

કે આપણી જૂની ડાયરીઓ પણ

ક્યાંક મુકાઈને

ભૂલાઈ ચૂકી છે !

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( વિનય સૌરભ, હિન્દી પરથી ભાવાનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

माँ पद्मिनी : मनमीत के दस शब्द चित्र

1.

रत्नसिंह

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

तोता

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

अलाउद्दीन तक

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

लेकिन स्वरा भास्कर!

तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था!

.

2.

अलाउद्दीन!

पहचान सके

तो इन राख की ढेरियों में पहचान..

पद्मिनी की राख कौनसी है?

और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है?

.

3.

पद्मिनी

पानी से नहीं

आग से मुँह धोती थी

उसके होंठों पर

किसी लिपस्टिक का नहीं

बल्कि किसी लाल पत्थर का रंग था

वह रात के काले धागे से

अपना जूड़ा बाँधती थी

सूरज की बिंदिया

दमकती थी उसके माथे पर

चाँद उसका मांगटीका था

सितारे

उसकी पलकों के हिण्डोले में झूलते थे..

हिंजड़ों के साथ सोने वाला अलाउद्दीन –

पद्मिनी नाम की देवी के

पैरों की धूल के लायक़ भी नहीं था!

.

4.

अलाउद्दीन!

तू चित्तौड़ जीत सकता है

तू चित्तौड़ की स्त्रियों को नहीं जीत सकता!

.

5.

भगवान करे

कि पद्मिनी एक कल्पना का ही नाम हो –

इस भारत में

जो कहने को हमारा है –

यह देखा नहीं जाता

कि 1303 में जल चुकी एक औरत को

हर थोड़े बरसों में

फिर से जलाया जाता है!

.

6.

हे ईश्वर!

चिता में राख होऊं

तो माँ पद्मिनी की तरह राख होऊं..

और

शत्रुओं के चेहरों को

काला करने के काम आऊं!

.

7.

रत्नसिंह –

महाराजा था

महाराजा है

महाराजा ही रहेगा!

पद्मिनी –

महारानी थी

महारानी है

महारानी ही रहेगी!

अलाउद्दीन –

ग़ुलाम था

ग़ुलाम है

ग़ुलाम ही रहेगा!

.

8.

राख के घूंघट से

झाँक रही है

माँ पद्मिनी की कहानी

जिन आँखों में

आँसू हैं

और

दिल में दर्द

सिर्फ़ वही देख सकते हैं :

थोड़ा-सा घूंघट उठाकर!

.

9.

ओ मेरी पत्नी!

अगर कभी कोई दुश्मन मुझे जान से मार दे और तुम्हें गुलाम बनाना चाहे तो पद्मिनी की तरह आग में जल जाना मगर अपने बदन को छूने मत देना जिसे सिर्फ़ मैंने छुआ है!

लोग बहुत समझाएँगे

लोग बहुत भड़काएँगे

लेकिन कुछ भी मत समझना

लेकिन बिलकुल मत भड़कना

मरने के बाद

हम दोनों

मेरे दिल की उस आग के फूलों से महकते कमरे में

ज़रूर मिलेंगे –

जो हमारे प्यार की रगड़क से पैदा हुई थी!

ओ मेरी पत्नी!

.

10.

मरने के बाद

अलाउद्दीन

बहत्तर हूरों के पास गया या नहीं गया..

नहीं पता!

लेकिन चित्तौड़ के

उस पद्मिनी महल में

जो एक तालाब के बीचों-बीच बना है

पर्यटकों की दुआएँ

रत्नसिंह को दूल्हा बनाकर

रोज़ अपनी पद्मिनी के पास भेजती हैं…

इतिहास!

होना क्या होता है

और

बनाना क्या होता है…

यह बात कोई राजपूतों से सीखे!

.

( मनमीत सोनी )

इन दिनों-सुजाता

अलसाई सी अबोध कच्ची भोर
अपनी झक्क सफेद चादर पर
अचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देख
असहज हो उठी थी
और घबराकर तलाशने लगी थी
वो घाव कि जिससे रिसा होगा वो…

.

‘ये बिन घाव का रिसाव है,
ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’
टुकुर टुकुर आँख फाड़े
देख रही थी तब वो,
पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगाती
बेरुखी और घबराहट से तरबतर
किसी नितांत अजनबी स्वर में बड़बड़ाती
अपनी ही माँ को.
वह बूझ नहीं पाई थी
माँ की एक भी बात.

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फिर तो वही अदृश्य घाव
जब कभी बेवक्त उपस्थिति दर्ज कराता
तब माँ अनायास बिफर पड़ती
‘कमबख्त ,किसी ने देखा तो नहीं न ?’
और जब कभी तय वक्त पर न लगा,
तब माँ की आशंकित नज़रें
बेंध डालती उसका मन
‘कुलमुंही कहां गई थी ?’
सिहर कर काँप उठता अबोध का तन.
समझ नहीं पाती इन सब तानों
और दिन रात कानों में पड़ते
इन लांछनों के मायने.

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विवाह बाद इस अदृश्य घाव ने
जब एक बार तय वक्त पर न रिसकर
बना दिया था उसे नौ महीनों की महारानी,
तब पहली बार उसे बहुत लाड़ आया था
अपना स्त्री होना उस दिन बहुत भाया था
गर्व से मुस्कुराकर वो कच्ची भोर
एकदम चटक दोपहरी सी खिल उठी थी.
स्त्री जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार
वही अदृश्य घाव
उसकी देह में ममता के जिस बीज को
बरसों बरस सींचता रहा
वह घना वृक्ष बन
उसकी गोद में दो फूल रख
उसे हरी कर गया.

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समय बीता और दोपहर की साँझ ढलते
ठहर गया था उस अदृश्य घाव का रिसाव,
देह के भीतर हरियाला वृक्ष सूखने लगा था,
सींचने को नेह न बचा होगा.
उसे लगा जैसे उसके साथ ही
उसका वजूद भी सूख गया .
एक अदृश्य घाव जिसके होने से
वो पहचानी गई ,
नए घर में जानी गई
वही घाव तो उसका अपना था,
अब उसका न होना
मानो कोई रीता सपना था ,
उसे पूर्णता प्रदान कर चला गया था,
अब उसकी देह ठूंठ बन
जीवन की दोचारियों से झुलसते
परिवार को ठंडी छाया देने की
जद्दोजहद में लगी रहती है…..
‘वह यूं है तो तुम हो !
तुम हो कि उसे,
अपवित्र कहते हो!’

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मेन्स्ट्रुएशन हाइजीन डे हर साल 28 मई को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य मासिक धर्म यानी पीरियड्स से जुड़ी समाज की विचारधारा को बदलना है।

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मई महीने की 28 तारीख को इसलिए चुना गया, क्योंकि महिलाओं में मासिक घर्म का चक्र 28 दिन का होता है।
आज भी इस चक्र से गुजरने के दौरान महिलाओं को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है।

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आज भी महिलाओं को इन दिनों में अपवित्र समझ कर पूजा,रसोई आदि जैसे स्थानों से दूर रखा जाता है.
आज भी न जाने कितनी ही महिलाओं के लिए हर माह
सैनिटरी पैड मंगवाना या स्वयं खरीद कर लाना और फिर इस्तेमाल के बाद छिपाते हुए फैंकना एक जीने मरने जैसा प्रश्न बना रहता है।

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इस चक्र के दौरान एक महिला के साथ उतना ही सामान्य व्यवहार होना चाहिए जितना अन्य दिनों में !
क्योंकि उन दिनों में तो उसके शरीर में होने वाली पीड़ा और मूड स्विंग्स स्वयं ही उसके लिए परेशानी का सबब
बने रहने के लिए काफी हैं ।

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हर पुरुष से प्रार्थना है कि अपनी बहन, माँ, दोस्त या अन्य किसी महिला को कभी इस चक्र के दौरान किसी भी परिस्थिति में मायूस पाएं तो परेशानी साझा करें उनकी।

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सच में जिस दिन वह अपने पिता, भाई, बेटे से इस विषय पर खुलकर वैसे ही बात सकेगी जैसे मामूली से सिर दर्द में करती है तो समझना आजाद है वो ।

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( सुजाता )

नज़्म-उमा त्रिलोक

बिन कहे जो कह सको

तो कहो

बिन पूछे ही, वह बात, बता सको

तो बताओ

जो किए ही नहीं तुम ने , वह वादे, हो सके

तो निभाओ

न हो यक़ी मेरा, मेरी बात का, तो चलो

आज़मा लो

कोई होगी मजबूरी उसकी, यूँ ही सोच, दिल

को समझा लो

बन गई हूँ पत्थरों में पत्थर, आओ, इक बार

आके रुला दो

खता थी वह मेरी कि मजबूरी, जो भी, हो सके

तो भुला दो

भुला कर नाफरमानियाँ मेरी ,जो लगा सको

तो गले लगा लो

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( उमा त्रिलोक )

कुछ दिन-रश्मि भारद्वाज

कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं

जब मेरी आँखों में तैर जाते हैं कामना के नीले रेशे

लाल रक्त दौड़ता है दिमाग से लेकर

पैरों के अँगूठे तक

एक अनियन्त्रित ज्वार

लावे-सा पिघल-पिघल कर बहता रहता है

देह के जमे शिलाखण्ड से

मैं उतार कर अपनी केंचुली

समा देना चाहती हूँ ख़ुद को

सख़्त चट्टानों के बीच

इतने क़रीब कि वह सोख ले मेरा उद्दाम ज्वर

मेरा सारा अवसाद

मेरी सारी लालसा

और मैं समेट लूँ ख़ुद में उसका सारा पथरीलापन

ताकि खिल सके नरम फूल और किलकती कोमल दूब

कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं

जब भूल कर और सब कुछ

मैं बन जाती हूँ सिर्फ़ एक औरत

अपनी देह से बँधी

अपनी देह से निकलने को आतुर

चाहना के उस बन्द द्वार पर दस्तक देती

जहाँ मेरे लिए अपनी मर्ज़ी से प्रवेश वर्जित है ..

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( रश्मि भारद्वाज )

|| અમુક દિવસ ||

કેટલાંક દિવસ ખૂબ આકરા હોય

જ્યારે મારી આંખોમાં ઉભરી આવે લાલસાના ભૂરા રેસા

લાલ રક્ત દોડે મગજથી માંડી

પગના અંગૂઠા લગી

એક વણથંભ્યુ પૂર જાણે લાવા જેમ પીગળી – પીગળીને વહેતું રહે

દેહના થીજેલ શિલાખંડમાં

હું મારી કાંચળી ઉતારી

સ્વયંને સમાવી દેવા ઇચ્છું છું

કાળમીંઢ શિલાઓ મધ્યે

એટલું ઊંડે કે એ શોષી લે

મારો સમગ્ર અવસાદ

મારી સંપૂર્ણ લાલસા

અને હું સ્વયંમાં સમેટી લઉ

એની સમગ્ર પાષાણતા

જેથી ખીલી શકે મુલાયમ પુષ્પ

અને ઉદ્દામ નરમ ઘાસ

અમુક દિવસો ખૂબ આકરાં હોય

જ્યારે બીજું બધું વિસરીને

હું બની જાઉં છું માત્ર એક સ્ત્રી

પોતાના દેહ સંગે બંધાયેલી

પોતાના દેહમાંથી ભાગી છૂટવા આતુર

ચાહનાના એ બંધ દ્વારે ટકોરા દેતી

જ્યાં મારા માટે

મારી મરજી મુજબ

પ્રવેશ વર્જ્ય છે…

( રશ્મિ ભારદ્વાજ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

पेट्रोल, गैस और कामरेड-मनमीत सोनी

आज सुबह बहुत ख़ुश था कामरेड

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कह रहा था :

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“युद्ध हो रहा है भाईसाहब युद्ध!”

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मैंने कहा :

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“तो”?

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तो हँसी को दबाकर
आवाज़ में गंभीरता का अभिनय करते हुए बोला :

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“अब तो गया साला मोदी!”

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मैंने पूछा :

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“कैसे गया मोदी?”

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तो उसने बातों की रेलगाड़ी ही चला दी :

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“अब पेट्रोल महंगा हो जाएगा”
“अब गैस महंगी हो जाएगी”
“अब लम्बी लम्बी लाइन लगेगी”
“अब लोग ब्लैक मार्केटिंग करेंगे”
“अब मारा-पीटी छीना-झपटी होगी”
“अब धारा एक सौ चौवालीस लगेगी”
“अब राहुल गाँधी का महत्व समझ आएगा”
“अब कांग्रेस मज़बूत बनकर उठेगी”
“अब इतना संकट होगा कि मध्यावधि चुनाव होंगे”
“अब चुनाव में मोदी हारेगा”
“अब मोदी पर केस होंगे”
“अब मोदी जेल जाएगा”
“अब मोदी वाले सपोर्टर रोयेंगे”
“अब अल्पसंख्यक मज़बूत होंगे”
“अब असली लोकतंत्र की स्थापना होगी”
“अब भारत नेहरू का भारत बनेगा”
“अब भारत गाँधी का भारत बनेगा”

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इतना कहते कहते
हांफने लगा कामरेड

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और
ज़मीन पर उकडू बैठ गया!

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मैंने कामरेड को उठाया
थोड़ा-सा पानी पिलाया
यू ट्यूब पर “आज तक” लगाया
भारत सरकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिखाई
और फिर धीरे से बताया :

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होरमुज़ स्ट्रेट में
भारतीय जहाज़ों को अनुमति मिल गई है कामरेड!

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कामरेड के चेहरे का तो
रंग ही उड़ गया

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उसने कहा
इण्डिया टीवी लगाओ

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उसने कहा
एबीपी न्यूज़ लगाओ

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उसने कहा
आर. भारत लगाओ

.

उसने कहा
Ndtv लगाओ

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उसने कहा
सब के सब झूठे हैं

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जल्दी से देखो
क्या रवीश कुमार की कोई वीडियो आई है
क्या पुण्य प्रसून वाजपेई की कोई वीडियो आई है
क्या अभिसार शर्मा की कोई वीडियो आई है
क्या ध्रुव राठी की कोई वीडियो आई है

.

_

मैं समझ गया था
अगर कामरेड को थोड़ा और पानी नहीं पिलाया
तो इसका राम नाम सत्य हो जाएगा

.

हालांकि किसी भी भारतीय कामरेड का
“राम नाम सत्य” कभी नहीं होता
एक सच्चे भारतीय कामरेड का
हमेशा ही “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” होता है

.

मैंने कामरेड को
गाड़ी में बिठाया
गाड़ी स्टार्ट की
गाड़ी पेट्रोल पम्प तक पहुंची ही थी

.
कि कामरेड चीख़ उठा :

.

“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”

.

लेकिन कामरेड को फिर झटका लगा
जब मैंने गाड़ी की टंकी फुल करवाई

.

_

कामरेड को ड्रिप लगी
कामरेड को ORS पिलाया गया
कामरेड को विटामिन b12 और d3 की सुईयां लगीं
तब जाकर कुछ नॉर्मल हुआ कामरेड


हॉस्पिटल से छुट्टी मिली
तो लंगड़ाते हुए बाहर आया कामरेड
जुबान पर जैसे लकवा पड़ गया था

.

कामरेड बुदबुदा रहा था :

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“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”


दोस्तो!

.

बहुत मुमकिन है
कि महंगा हो गया हो पेट्रोल
कि महंगी हो गई हो गैस

.

लेकिन कितना सस्ता हो गया है
हमारा कामरेड

.


दोस्तो!

.

मेरे मन में तो हँसी के फव्वारे छूट रहे हैं
इसलिए कामरेड को फोन नहीं कर सकता
लेकिन आप ज़रूर कर सकते हैं
कृपया आप तो पूछिए
क्या कामरेड ठीक है या नहीं

.

कहीं ऐसा तो नहीं
कि सड़कों पर पैदल निकल गया हो कामरेड

.

गैस एजेंसी के सामने
भीड़ नहीं पाकर
और ज़्यादा बावला हो गया हो

.

_

दोस्तो!

.

पता तो करो…

.

कामरेड कहाँ है?
कामरेड कैसा है?
कामरेड क्या कर रहा है?

.

दोस्तो!

.

पेट्रोल से भी
ड्राइक्लीन नहीं होते
कामरेड की गद्दारी के दाग़ धब्बे!

.

आप क्या कहते हैं???

.

( मनमीत सोनी )

જે ડરાવે છે-મંગલેશ ડબરાલ

જે આપણને ડરાવે છે

એ હંમેશા એમ કહેતો હોય

ડરવા જેવી કોઈ વાત નથી

હું કોઈને ડરાવતો નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ હવામાં આંગળી ઊંચી કરીને કહે છે

કોઈએ ડરવાની જરૂર નથી

એ પોતાની મુઠ્ઠી ભીડીને હવામાં ઉલાળે છે

અને પૂછે છે

તમે ડરતા તો નથી ને

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ પોતાની તીક્ષ્ણ ઠંડી આંખોથી આપણને ઘુરે છે

અને નીરખે છે – કોણ કોણ ડરી રહ્યાં છે

.

લોકો જ્યારે ડરવા લાગે છે, એ રાજી થાય છે

અને હસતાં હસતાં કહે છે

ડરવાનું કોઈ કારણ નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ ત્યારે સ્વયં ડરી જાય છે

જ્યારે એ જુએ છે

કે કોઈ એનાથી ડરી નથી રહ્યું.

.

( મંગલેશ ડબરાલ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

.

जो डराता है

.

जो हमें डराता है

वह कहता है डरने की कोई बात नहीं है

मैं किसी को डरा नहीं रहा हूँ

जो हमें डराता है

वह हवा में अपनी अंगुली तान कर कहता है

किसी को डरने की जरूरत नहीं है

वह अपनी मुट्ठियाँ भींच कर हवा में उछालता है

और पूछता है तुम डर तो नहीं रहे हो

.

जो हमें डराता है

वह अपनी तीखी ठंढी आँखों से हमें घूरता है

और देखता है कौन-कौन डर रहा है

लोग जब डरने लगते हैं वह खुश होने लगता है

और हँसते हुए कहता है डरने की कोई वजह नहीं है

वह खुद डर जाता है

जब वह देखता है कि कोई डर नहीं रहा है।

जो हमें डराता है

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( मंगलेश डबराल )

મિત્ર-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

|| મિત્ર ||

એ મિત્ર હતો

એકનો એક

પહેલી જાસુસી ચોપડી

પહેલી સિગરેટ

પહેલો ઝઘડો

પહેલો પ્રેમ

અમારું બધું સહિયારું હતું

.

હું વહેંચતો

મારા દુઃખ એની સાથે

કશું બોલ્યા વિના

અને કશું બોલ્યા વિના સમજી પણ જતો

એનો મૂંઝારો અને એનાં સપના

.

એની પાસેથી ઉછીના લીધેલા પૈસા ક્યારેય ભારરૂપ ન લાગતા દિલને

અને આપતો તો કશું જ નહીં એને

.

કેવળ એ એક જ હતો

જેની સામે રડી શકતો હું

એટલે એ જ્યારે મર્યો

તો રડ્યો નહીં હું

.

જ્યારે સમાચાર મળ્યા એના મૃત્યુના

અર્ધ ચંદ્ર આકાશમાં હતો

પછી આકાશમાંથી ચંદ્ર ગાયબ થયો અને હું એકલો ઊભો હતો બાલ્કનીમાં

.

રાત્રિમાં

આકાશમાં

દુનિયામાં

હું સાવ એકલો હતો..

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( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?

ફળિયાની કોરે ઉગેલા

ટમેટાંના લીલા છોડમાં

અચાનક એક લાલ ટમેટું જોઈ હું બોલી ઊઠેલો

પહેલીવાર ” અરે ! “

જે તોતડી ભાષામાં

એ ?

.

અથવા પછી

બધાં સપના જોયાં જે ભાષામાં

એ અલ્લડ અને બાલિશ ઉંમરમાં

એ ?

.

કે પછી

જે ભાષામાં રમતાં રમતાં લડી પડતાં

અમે નાના નાના ભેરુઓ

અથવા

જે ભાષામાં લખી કવિતાઓ

અને પ્રેમના કાચા પાકા સંદેશા

એ ?

.

પરંતુ ના ,

ખરેખર તો મારી માતૃભાષા એ હતી

જેમાં મારી બા રડતી

ક્યારેક ક્યારેક

ચુપચાપ

એકલાં – એકલાં…

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( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

( મૂળ કવિતા કવિના સંગ્રહ आसान सी बातें માંથી )

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कौन-सी थी मेरी मातृभाषा

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कौन-सी थी मेरी मातृभाषा?

आंगन के किनारे

उगे टमाटर के हरे पौधों में अचानक

एक लाल टमाटर देख मैंने कहा पहली बार

‘अरे!’ जिस तोतली भाषा में वह?

या फिर सारे सपने देखे जिस भाषा में

एक अल्हड़ और मूर्ख-सी उम्र में, वह?

या जिस भाषा में लिखी कविताएं

और लिखे प्रेम के कच्चे-पक्के संदेशे, वह?

पर सच में तो

मेरी मातृभाषा वह थी

जिसमें मेरी मां रोती थी कभी-कभी

चुपचाप अकेले में!