नज़्म-उमा त्रिलोक

बिन कहे जो कह सको

तो कहो

बिन पूछे ही, वह बात, बता सको

तो बताओ

जो किए ही नहीं तुम ने , वह वादे, हो सके

तो निभाओ

न हो यक़ी मेरा, मेरी बात का, तो चलो

आज़मा लो

कोई होगी मजबूरी उसकी, यूँ ही सोच, दिल

को समझा लो

बन गई हूँ पत्थरों में पत्थर, आओ, इक बार

आके रुला दो

खता थी वह मेरी कि मजबूरी, जो भी, हो सके

तो भुला दो

भुला कर नाफरमानियाँ मेरी ,जो लगा सको

तो गले लगा लो

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( उमा त्रिलोक )

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