वीर सावरकर के नाम-मनमीत सोनी

हे कुल ऋषि सावरकर!

सबसे पहले उसका प्रणाम स्वीकार कीजिये

जो इस मातृभूमि के लिए

अपना लहू बहा देना चाहता था

लेकिन आप जैसे ऋषियों के कारण

वह कलम की नीली स्याही से लिख रहा है :

वन्दे मातरम!

यही सोचता था मैं

कि नहीं हो सकता कोई दधीचि इस कलियुग में

फिर मैंने जाना तुम्हारे बारे में

और अब मुझे कभी कभी महसूस होता है

कि यह भव्य संसद

कि यह भव्य मंदिर

कि यह भव्य उद्घोष

केवल तुम्हारे कारण संभव हुआ

ओ युग ऋषि!

भूल ही गए थे हम

कि हम कौन हैं

तुमने मछलियों की आंतों से खेलते हुए

उस सतही वैष्णव को बताया :

“चरखे के सूत से नहीं

शरीर के रक्त से मिलेगी स्वतन्त्रता”

भूल ही गए थे हम

कि इन्हीं मंदिरों में

अनुमति थी शूद्र को प्रवेश की

लेकिन हमारे अपवित्र हृदय ने

बाँध दी उनके पाँव में बेड़ियाँ

तुम्हीं ने दी उन्हें मुक्ति

यह अलग बात है

श्रेय कोई और ले गया!

एक हाथ में बंदूक

दूसरे हाथ में लिए कलम लिए

यह तुम ही थे

जिसने नाक में नाथ ली थी

बैलों की जंजीर

जिसने निकाला था

नारियल और सरसों का तेल

लेकिन स्वतंत्र भारत का जश्न उन्होंने मनाया

जिन्हें केवल एक दिन जागना पड़ा मध्य रात्रि तक –

और वे

“ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” कहकर

एक लम्बी पश्चिमी नींद में सो गए!

हे कुलवंत!

यह तुम्हीं थे

जो गटर को साफ़ करने के लिए

गटर में कूद गए थे

यह तुम्हीं थे

कि जिसने दीवारों के चूने से मांजे दाँत

यह तुम्हीं थे

कि जिसकी थाली में

रोटियों और दाल में कंकर थे

वरना तो यह वह समय था

कि बकरी का दूध, एलोवीरा, तुलसी और नीम की पत्तियाँ और हल्दी और न जाने क्या-क्या परोसी हुई सबसे महंगी थाली जीमता था

एक नंगा फ़क़ीर!

कितना मीठा होता है

सुविधा की चारदीवारी में

अपने स्वाद की रक्षा करते हुए

दुश्मनों को कोसना

और उन्हें दोस्त भी कहना!

हे क्रांतिवीर!

दो – दो आजन्म कारावास का दंड लिए

तुम लिखते रहे हमारा इतिहास

करते रहे शोध पर शोध

लिखते रहे गीत पर गीत

किसी ने नहीं संभाला तुम्हें

तुम्हारी ख़ाली आंतों में

तेज़ाब की तरह घुलता रहा

किसी का प्रायोजित अनशन

किसी ने नहीं सुना तुम्हारा सच –

अकेले रहे मृत्यु तक तुम

अकेली ही मृत्यु चुनी तुमने

कि मेरे पास शब्द नहीं है

इस प्रायश्चित के लिए

मैं तोड़ देना चाहता हूँ यह कलम!

हे युगदृष्टा!

अपने इतिहास बोध से रिक्त

यह हिन्दू समाज

नतमस्तक है तुम्हारे आगे

वंदन करता है तुम्हारा

कि जितने भी फूल उछाले गए हैं

पिछले एक दशक में

सब तुम पर गिर रहे हैं

वीर सावरकर!

जिनके कुत्सित प्रयासों से

रक्त में भीगी है

विश्व की सत्तर प्रतिशत भूमि

तुम उनसे

एक जनेऊ

एक तिलक

एक गीता

एक बंदूक के सहारे भिड़ गए –

जो काम

अमेरिका तक नहीं कर सका

वह तुमने अकेले किया

और तुम्हारा मूल्यांकन यह हुआ –

कि तुम एक “माफ़ीवीर” हो!

थूकता हूँ उन पर

जो कहते हैं तुम्हें माफ़ीवीर

यह वही हैं

बचपन में जिनकी पेंट

अपने बाप के डर से गीली हुई

और जवानी में

इन्हें रंडुओं की तरह रुलाया

इनकी प्रेमिकाओं ने!

एयर कंडीशन रूम में बैठकर

स्टेटमेंट देने वाले

सिगरेट की चिंगारी तक से

जिनकी तशरीफ़ फट जाती है

और जो दो पेग के बाद

भूल जाते हैं नौकरानी और बीवी में फ़र्क़ :

अब वे सिखाएंगे हमें?

मातृभूमि के लिए अडिग कैसे रहा जाता है!

हे वंदनीय!

अपनी कलम से लिखता हूँ

अपनी आत्मा के स्टाम्प पेपर पर

कि हिन्दू हूँ, था और रहूँगा!

हस्ताक्षर करता हूँ

अपने ही सूने ललाट पर

कि मैं अपने माता-पिता से पहले

इस मातृभूमि का पुत्र हूँ

लानत भेजता हूँ

उन कमीनों पर

जो गले में लटकाए हैं रुद्राक्ष की माला

लेकिन जिनका लिंग

बचपन में ही छीला जा चुका है

फिर बुलंद करता हूँ

हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान का नारा

आवाज़ देता हूँ

सौ करोड़ लोगों को

कि गर्व से कहो तुम हिन्दू हो

प्रण लेता हूँ

कि नहीं झुकेगी यह कलम

अभी बहुत दूर तक जाएगी

यह नाप लेगी सारे भारत को

यह वह बुझी हुई अलख जगाएगी :

जो हर बार जागती है

लेकिन फिर से सो जाती है!

हे शापित गंधर्व!

मेरे शरीर में

उसी तरह प्रवेश करो

जिस तरह जीण माता करती है प्रवेश

मेरी दादी के शरीर में –

कि मैं ‘मनमीत’

बस एक बार महसूस करना चाहता हूँ

वह गर्म लावा

जिसने बनाया तुम्हें

अखंड ज्योत वाला ज्वालामुखी!

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( मनमीत सोनी )

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